मोबाइल फोन अब जीवन का जरूरी हिस्सा है। बातचीत, भुगतान, पढ़ाई और मनोरंजन तक अधिकतर काम इसी पर होते हैं। इसी बढ़ते इस्तेमाल के साथ एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या मोबाइल रेडिएशन सेहत के लिए खतरनाक है? क्या लंबे समय तक फोन पर बात करने से सिरदर्द, नींद की परेशानी या कैंसर हो सकता है? पुराने अध्ययनों, विशेषज्ञों की चेतावनी और हाल की वैज्ञानिक समीक्षा को साथ रखकर ही इसका सही उत्तर मिल सकता है।
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हाल में भारत में मोबाइल नेटवर्क के लिए विद्युत चुंबकीय क्षेत्र यानी ईएमएफ की सीमा को वैश्विक मानकों के बराबर किए जाने की खबर सामने आई है। इसके बाद मोबाइल और 5जी रेडिएशन को लेकर चर्चा फिर तेज हो सकती है। वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि मोबाइल से निकलने वाली रेडियो फ्रीक्वेंसी एक्स-रे जैसी आयनीकरण विकिरण नहीं होती। फिर भी लंबे इस्तेमाल और शरीर के बहुत पास फोन रखने को लेकर अध्ययन जारी हैं।
मोबाइल रेडिएशन क्या है?
मोबाइल फोन नेटवर्क से जुड़ने के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी तरंगों का इस्तेमाल करता है। यह गैर-आयनीकरण विकिरण है। इसमें एक्स-रे या गामा किरणों की तरह सीधे डीएनए को नुकसान पहुंचाने जितनी ऊर्जा नहीं होती।
मानव शरीर इस ऊर्जा का कुछ हिस्सा सोखता है। इसे स्पेसिफिक एब्जॉर्प्शन रेट यानी SAR से मापा जाता है। SAR बताती है कि फोन इस्तेमाल करते समय शरीर के ऊतक कितनी रेडियो फ्रीक्वेंसी ऊर्जा ग्रहण कर सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रीय कैंसर संस्थान के मुताबिक सामान्य लोगों में मोबाइल रेडियो फ्रीक्वेंसी का लगातार पहचाना गया जैविक प्रभाव फोन के संपर्क वाली जगह पर मामूली गर्मी है। उपलब्ध प्रमाण अब तक मोबाइल फोन को मनुष्यों में मस्तिष्क या अन्य कैंसर का कारण नहीं बताते।
प्रो. गिरीश कुमार ने किन समस्याओं का उल्लेख किया?
मोबाइल रेडिएशन पर कई शोध पत्र तैयार कर चुके आईआईटी बॉम्बे के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. गिरीश कुमार लंबे समय से इसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों पर चिंता जताते रहे हैं। उनके अनुसार अधिक संपर्क से सिरदर्द, सिर में झनझनाहट, लगातार थकान, चक्कर, अवसाद, नींद न आना, आंखों में सूखापन, काम में ध्यान न लगना, कान बजना, सुनने और याददाश्त में कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
उन्होंने पाचन में गड़बड़ी, अनियमित धड़कन और जोड़ों के दर्द जैसी शिकायतों का भी उल्लेख किया है। हालांकि इन लक्षणों के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं। किसी व्यक्ति में ऐसी परेशानी होने से यह अपने आप प्रमाणित नहीं होता कि उसका कारण मोबाइल रेडिएशन ही है। लगातार समस्या होने पर चिकित्सकीय जांच जरूरी है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि वर्ष 2014 में आईआईटी बॉम्बे ने मोबाइल टावर पर प्रो. गिरीश कुमार के विचारों को उनका व्यक्तिगत मत बताया था। इसलिए उनकी चेतावनियों को व्यापक वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ पढ़ना उचित होगा।
क्या दिन में केवल 24 मिनट मोबाइल इस्तेमाल करना सुरक्षित है?
प्रो. गिरीश कुमार ने एहतियात के रूप में मोबाइल पर बातचीत को प्रतिदिन लगभग 18 से 24 मिनट तक सीमित रखने का सुझाव दिया है। यह गणना SAR सीमा और सुरक्षा अंतर के उनके आकलन पर आधारित बताई जाती है।
लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन, भारत सरकार या किसी प्रमुख चिकित्सा संस्था ने 24 मिनट को सभी लोगों के लिए प्रमाणित सुरक्षित सीमा घोषित नहीं किया है। इसलिए इसे सरकारी या सार्वभौमिक चिकित्सा मानक नहीं कहा जा सकता।
फोन पर लंबी बातचीत करनी हो तो स्पीकर मोड, तार वाले इयरफोन या लैंडलाइन का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे फोन और सिर की दूरी बढ़ जाती है। दूरी बढ़ने पर रेडियो फ्रीक्वेंसी का संपर्क तेजी से कम होता है। प्रोलंबी बातचीत में कॉर्डलेस फोन भी रेडियो फ्रीक्वेंसी इस्तेमाल कर सकता है, इसलिए सामान्य तार वाला लैंडलाइन बेहतर विकल्प हो सकता है।
2010 की इंटरफोन स्टडी ने वास्तव में क्या पाया?
वर्ष 2010 की इंटरफोन स्टडी को अक्सर इस दावे के साथ पेश किया जाता है कि मोबाइल फोन से कैंसर का खतरा सिद्ध हो गया। इस अध्ययन का वास्तविक निष्कर्ष इससे अधिक संतुलित था।
इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर द्वारा समन्वित इस अध्ययन में सामान्य मोबाइल उपयोगकर्ताओं में ग्लायोमा और मेनिन्जियोमा नामक ब्रेन ट्यूमर का जोखिम बढ़ा हुआ नहीं मिला। सबसे अधिक मोबाइल इस्तेमाल करने वाले समूह में ग्लायोमा के बढ़े जोखिम का संकेत जरूर मिला था। अध्ययनकर्ताओं ने यह भी कहा था कि आंकड़ों में संभावित त्रुटि और पक्षपात के कारण इससे कारण और परिणाम का पक्का संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता।
वर्ष 2011 में रेडियो फ्रीक्वेंसी विद्युत चुंबकीय क्षेत्र को IARC ने समूह 2B यानी मनुष्यों के लिए “संभवतः कैंसरकारी” श्रेणी में रखा था। इसका अर्थ खतरे का प्रमाण मिल जाना नहीं है। इसका मतलब है कि उपलब्ध सीमित प्रमाण के कारण संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सका।
नई समीक्षा कैंसर के बारे में क्या कहती है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराई गई एक बड़ी वैज्ञानिक समीक्षा 2024 में प्रकाशित हुई। इसमें 1994 से 2022 तक के 63 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया। समीक्षा में मोबाइल फोन के इस्तेमाल और मस्तिष्क, सिर या गर्दन के कैंसर का संबंध नहीं मिला।
दस वर्ष से अधिक समय तक मोबाइल इस्तेमाल करने और अधिक देर फोन पर बात करने वालों में भी कैंसर का जोखिम बढ़ा हुआ नहीं पाया गया। मोबाइल फोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ने के बावजूद जनसंख्या में ब्रेन कैंसर के मामलों में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं देखी गई।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर संभावित स्वास्थ्य प्रभाव पर शोध समाप्त हो गया है। तकनीक बदल रही है और लंबे समय के प्रभावों पर अध्ययन जारी रहना चाहिए। लेकिन वर्तमान प्रमाणों के अनुसार यह कहना सही नहीं होगा कि मोबाइल फोन से कैंसर होना सिद्ध हो चुका है।
प्रजनन क्षमता, मधुमक्खियों और गौरैया वाले दावे
हंगरी में हुए कुछ पुराने अध्ययनों में अधिक मोबाइल इस्तेमाल करने वाले युवकों में शुक्राणुओं की संख्या कम होने का संकेत दिया गया। प्रयोगशाला और पर्यवेक्षण आधारित कई अध्ययनों में पुरुष प्रजनन क्षमता पर संभावित असर की चर्चा हुई है। इनके नतीजे एक जैसे नहीं रहे और जीवनशैली, गर्मी, धूम्रपान, मोटापा तथा फोन रखने की जगह जैसे दूसरे कारणों को अलग करना कठिन रहा है।
जर्मनी के एक पुराने अध्ययन में मोबाइल ट्रांसमीटर के 400 मीटर के दायरे में रहने वाले लोगों में कैंसर की आशंका बढ़ने का दावा किया गया। इसे सभी आबादी पर लागू होने वाला निर्णायक प्रमाण नहीं माना गया। मोबाइल टावर और कान से सटाकर इस्तेमाल किए जाने वाले फोन से मिलने वाला संपर्क भी एक जैसा नहीं होता।
केरल के एक प्रयोग में सेल फोन टावर के संपर्क से मधुमक्खियों की व्यावसायिक आबादी में 60 प्रतिशत तक गिरावट की बात कही गई थी। गौरैया के अंडों से बच्चे न निकलने संबंधी प्रयोगों का भी उल्लेख होता रहा है। इन छोटे अध्ययनों से पर्यावरण संबंधी महत्वपूर्ण प्रश्न उठे, लेकिन मधुमक्खियों और गौरैया की आबादी पर कीटनाशक, भोजन की कमी, आवास में बदलाव, प्रदूषण और जलवायु जैसे कई कारण असर डालते हैं। इसलिए रेडिएशन को अकेला प्रमाणित कारण बताने के लिए बड़े और दोहराए जा सकने वाले अध्ययन जरूरी हैं।
कम सिग्नल में मोबाइल अधिक रेडिएशन क्यों छोड़ सकता है?
नेटवर्क कमजोर होने पर फोन टावर से संपर्क बनाए रखने के लिए अपनी प्रसारण शक्ति बढ़ा सकता है। इससे सिर या शरीर के पास रेडियो फ्रीक्वेंसी का संपर्क बढ़ सकता है। बहुत कमजोर सिग्नल में लंबी बातचीत से बचना एक सरल एहतियात है।
खिड़की, दरवाजे या खुले स्थान पर बेहतर सिग्नल मिलने से फोन को कम प्रसारण शक्ति की जरूरत पड़ सकती है। इसे तरंगों को बाहर निकलने का रास्ता मिलने के बजाय बेहतर नेटवर्क संपर्क के रूप में समझना अधिक वैज्ञानिक होगा।
मोबाइल रेडिएशन का संपर्क कैसे कम करें?
फोन से डरने या कथित एंटी-रेडिएशन स्टिकर खरीदने की जरूरत नहीं है। कुछ आसान आदतें पर्याप्त हैं।
लंबी कॉल के लिए स्पीकर या तार वाला इयरफोन इस्तेमाल करें। कमजोर नेटवर्क में अनावश्यक लंबी कॉल न करें। बातचीत न हो रही हो तो फोन को लगातार शरीर से चिपकाकर रखने से बचें। बच्चों को जरूरत के अनुसार फोन दें और उनकी स्क्रीन अवधि भी नियंत्रित रखें। सोते समय फोन को सिरहाने या तकिए के नीचे रखने के बजाय कुछ दूरी पर रखें।
तकिए के नीचे फोन रखने से गर्मी, बैटरी और नींद में बाधा जैसी समस्याएं रेडिएशन की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष चिंता हैं। गाड़ी चलाते समय फोन का इस्तेमाल न करना सबसे जरूरी सुरक्षा उपाय है। मोबाइल से जुड़ा प्रमाणित बड़ा खतरा ध्यान भटकने के कारण होने वाली सड़क दुर्घटना है।
तो क्या मोबाइल रेडिएशन खतरनाक है?
वर्तमान वैज्ञानिक प्रमाण सामान्य और निर्धारित मानकों के भीतर मोबाइल इस्तेमाल से कैंसर होने की पुष्टि नहीं करते। दूसरी ओर, पुराने अध्ययनों में उठे सवालों और लंबे समय के संपर्क को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
सही रास्ता भय और लापरवाही, दोनों से बचना है। मोबाइल का जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करें, लंबी कॉल में दूरी रखें और कमजोर सिग्नल में बातचीत कम करें। सिरदर्द, अनिद्रा, चक्कर या धड़कन की परेशानी को सीधे रेडिएशन से जोड़ने के बजाय चिकित्सक से उसके वास्तविक कारण की जांच कराएं।
चिकित्सकीय सूचना: यह लेख स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। किसी लक्षण के निदान या उपचार के लिए योग्य चिकित्सक से सलाह लें।










