दिनभर मोबाइल, काम और जिम्मेदारियों में उलझे रहने के बाद भी मन शांत क्यों नहीं होता? बाहरी सफलता मिलने के बावजूद भीतर खालीपन क्यों महसूस होता है? आंतरिक शांति कैसे पाएं, यह सवाल आज लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़ चुका है।
राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज जी का कहना है कि शांति कहीं बाहर से मिलने वाली वस्तु नहीं है। इसके लिए मनुष्य को अपने भीतर झांकना और अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानना होगा। अपने विचारों को समझकर ही मन में सकारात्मकता और संतुलन लाया जा सकता है।
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उन्होंने ये विचार मुंबई में अपनी पुस्तक ‘Echoes of the Soul – Reflections for a Conscious Life’ के लोकार्पण के अवसर पर रखे। यह आयोजन एमवीआईआरडीसी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मुंबई में किया गया।
बाहरी सफलता के बाद भी मन अशांत क्यों रहता है?
आज इंसान बाहरी दुनिया से पहले के मुकाबले कहीं अधिक जुड़ा है। सोशल मीडिया, मोबाइल और इंटरनेट ने सूचनाओं की दूरी मिटा दी है। इसके बावजूद बहुत से लोग स्वयं से कटते जा रहे हैं।
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राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज जी ने कहा कि वास्तविक प्रगति को बाहरी उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता। हमारे विचार कैसे हैं, रिश्तों में कितना अपनापन है और मन की स्थिति कैसी है, ये बातें भी जीवन की सफलता तय करती हैं।
यदि व्यक्ति बाहर से सफल दिखाई देता है, लेकिन उसके मन में तनाव, भय या असंतोष बना रहता है, तो उसकी उपलब्धियां भी उसे पूरी खुशी नहीं दे पातीं। इसलिए आत्मचिंतन को रोजमर्रा की जिंदगी में स्थान देना जरूरी है।
मन को शांत रखने में कैसे मदद करता है राजयोग?
राजयोग मन को दबाने के बजाय उसे समझने की प्रेरणा देता है। इसमें व्यक्ति अपने विचारों को देखने, नकारात्मक भावनाओं को पहचानने और मन को सकारात्मक दिशा देने का अभ्यास करता है।
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राजयोगी निकुंज जी की पुस्तक आध्यात्मिक ज्ञान को आसान और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करती है। इसका उद्देश्य पाठकों को आत्म-जागरूकता, सकारात्मकता और संतुलन को अपने दैनिक जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित करना है।
इस संदेश को तीन आसान बातों में समझा जा सकता है:
- कुछ समय शांत बैठकर अपने विचारों को पहचानें
- प्रतिक्रिया देने से पहले मन की स्थिति को समझें
- बाहरी उपलब्धियों के साथ रिश्तों और मानसिक शांति को भी महत्व दें
‘आरम्भ’ ने दिया नई शुरुआत का संदेश
पुस्तक लोकार्पण के साथ ‘आरम्भ – जीवन में कभी देर नहीं होती’ नाम से कला प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। यह प्रदर्शनी राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी डॉ. नलिनी दीदी जी, जिन्हें दीदी माँ के नाम से जाना जाता है, की रचनात्मक यात्रा को समर्पित थी।
प्रदर्शनी में उनके रेखाचित्र और दूसरी रचनात्मक अभिव्यक्तियां प्रदर्शित की गईं। इन कलाकृतियों के जरिए यह बताया गया कि उम्र जीवन में कुछ नया शुरू करने की सीमा तय नहीं कर सकती।
राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी शाकु दीदी जी ने कहा कि ‘आरम्भ’ का संदेश बिल्कुल साफ है। मनुष्य किसी भी उम्र में अपनी नई यात्रा शुरू कर सकता है। दीदी माँ की रचनात्मक यात्रा बताती है कि उत्साह, संकल्प और अभिव्यक्ति की इच्छा के सामने उम्र बाधा नहीं बनती।
उनके मुताबिक कला और आध्यात्मिकता का मेल व्यक्ति को अपनी छिपी हुई क्षमता पहचानने में मदद करता है।
भारतीय आध्यात्मिक विरासत की सराहना
कार्यक्रम में बेलारूस गणराज्य के मुंबई स्थित महावाणिज्यदूत अलेक्ज़ेंडर मात्सुकोव भी उपस्थित रहे। उन्होंने भारत की संस्कृति, परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत की सराहना की।
उन्होंने भारत और बेलारूस के सांस्कृतिक सहयोग तथा दोनों देशों के नागरिकों में आपसी समझ को आगे ले जाने की जरूरत बताई। उन्होंने बेलारूस में मौजूद ब्रह्माकुमारीज़ के केंद्रों का भी उल्लेख किया।
श्रीलंका के मुंबई स्थित महावाणिज्य दूतावास की वाणिज्यिक मंत्री शिरानी अरियारत्ने ने ब्रह्माकुमारीज़ के प्रेम, शांति और सद्भाव के संदेश की सराहना की। उन्होंने बताया कि श्रीलंका में ब्रह्माकुमारीज़ के 22 केंद्र आध्यात्मिक जागरूकता और आंतरिक कल्याण के लिए काम कर रहे हैं।
कला और आध्यात्मिकता का एक साझा संदेश
एमवीआईआरडीसी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मुंबई और ऑल इंडिया एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष डॉ. विजय कालंत्री ने कहा कि ब्रह्माकुमारीज़ विनम्रता, आत्मचिंतन और सकारात्मक जीवन का संदेश देती रही हैं।
उनके अनुसार निकुंज जी की पुस्तक वर्षों के अनुभव और ज्ञान का सार प्रस्तुत करती है। वहीं दीदी माँ की कलाकृतियां उनकी आध्यात्मिकता, समर्पण और रचनात्मकता की अभिव्यक्ति हैं।
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मुंबई की वरिष्ठ निदेशक, व्यापार, निवेश एवं अंतरराष्ट्रीय संबंध प्रिया पंसारे ने कहा कि ‘आरम्भ’ और ‘Echoes of the Soul’ जीवन में नई शुरुआत, सकारात्मकता, स्पष्टता और संतुलन का महत्वपूर्ण संदेश देते हैं।
मन की शांति के लिए रोज क्या किया जा सकता है?
आत्मचिंतन के लिए लंबी प्रक्रिया या किसी विशेष स्थान की जरूरत नहीं है। दिन में कुछ मिनट शांत बैठना भी इसकी शुरुआत हो सकता है। इस दौरान मोबाइल को अलग रखकर अपने विचारों पर ध्यान दिया जा सकता है।
व्यक्ति खुद से पूछ सकता है कि उसे किस बात ने परेशान किया, उसकी प्रतिक्रिया उचित थी या नहीं और अगले दिन वह क्या बेहतर कर सकता है। यह छोटा अभ्यास मन में चल रही उलझनों को पहचानने में मदद कर सकता है।
‘आरम्भ’ और ‘Echoes of the Soul’ का साझा संदेश भी यही है कि सार्थक जीवन, रचनात्मकता और आत्मचिंतन शुरू करने के लिए कोई तय उम्र या समय नहीं होता। नई शुरुआत आज और अभी से की जा सकती है।













