वन्दे माँ नर्मदे: माँ नर्मदा की महिमा, इतिहास और भारतीय संस्कृति को समर्पित महत्वपूर्ण कृति

'वन्दे माँ नर्मदे' पुस्तक माँ नर्मदा की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महिमा को समर्पित एक महत्वपूर्ण कृति है। नई दिल्ली में हुए लोकार्पण समारोह ने भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा के संरक्षण की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।
नई दिल्ली में वन्दे माँ नर्मदे पुस्तक के लोकार्पण समारोह में संत, विद्वान और अतिथि

भारत की नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं हैं। वे हमारी सभ्यता, संस्कृति, लोकजीवन और आध्यात्मिक चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं। इन्हीं मूल्यों को केंद्र में रखकर लिखी गई पुस्तक ‘वन्दे माँ नर्मदे’ भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की उस विरासत को सामने लाती है, जिसमें प्रकृति और श्रद्धा एक-दूसरे के पूरक हैं।

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इसी कृति का लोकार्पण नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) में गरिमामय वातावरण में हुआ। समारोह में संत, शिक्षाविद, साहित्यकार, जनप्रतिनिधि और विभिन्न क्षेत्रों के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। यह आयोजन केवल एक पुस्तक विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर व्यापक विमर्श का अवसर भी बना।

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माँ नर्मदा क्यों मानी जाती हैं भारतीय संस्कृति की जीवनदायिनी?

भारतीय परंपरा में माँ नर्मदा को मोक्षदायिनी और पुण्यदायिनी नदी माना गया है। नर्मदा परिक्रमा की परंपरा सदियों से चली आ रही है। देशभर से श्रद्धालु इस यात्रा को आध्यात्मिक साधना का माध्यम मानते हैं। धार्मिक ग्रंथों में भी नर्मदा के महत्व का विस्तृत उल्लेख मिलता है।

‘वन्दे माँ नर्मदे’ पुस्तक इसी सांस्कृतिक विरासत, इतिहास और आध्यात्मिक चेतना को सरल भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।

संतों के सान्निध्य में हुआ लोकार्पण

इस पुस्तक के लेखक आचार्य शुभेश शर्मन हैं। पुस्तक का लोकार्पण परम पूज्य महामण्डलेश्वर आचार्य डॉ. स्वामी कैलाशानन्द गिरि जी महाराज के पावन सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता परम पूज्य महामण्डलेश्वर स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती जी महाराज ने की।

उपस्थित संतों ने कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा उसकी नदियों, तीर्थों और आध्यात्मिक परंपराओं में बसती है। इन विषयों पर लिखे जाने वाले साहित्य से नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है।

केंद्रीय मंत्री ने बताया सांस्कृतिक धरोहर का आधार

समारोह की मुख्य अतिथि भारत सरकार में महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर ने कहा कि भारत की नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और सभ्यता की आधारशिला हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत पर आधारित साहित्य समाज में सकारात्मक चेतना पैदा करता है और युवा पीढ़ी को अपनी परंपराओं को समझने की प्रेरणा देता है।

विद्वानों ने बताया नई पीढ़ी के लिए उपयोगी ग्रंथ

विशिष्ट अतिथि डॉ. अनिल अग्रवाल, दिल्ली प्रांत प्रचारक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा प्रो. बलराम पाणी, डीन, दिल्ली विश्वविद्यालय ने पुस्तक की विषयवस्तु की सराहना की।

दोनों वक्ताओं ने कहा कि ऐसे ग्रंथ भारतीय इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज के समय में जब सांस्कृतिक विषयों पर प्रमाणिक साहित्य की आवश्यकता बढ़ रही है, तब इस प्रकार की पुस्तकों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

लेखक ने बताया पुस्तक लिखने का उद्देश्य

लेखक आचार्य शुभेश शर्मन ने अपने संबोधन में कहा कि ‘वन्दे माँ नर्मदे’ माँ नर्मदा की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महिमा को जन-जन तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक पाठकों को भारतीय संस्कृति, प्रकृति संरक्षण और सनातन परंपराओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाएगी।

संरक्षण और सांस्कृतिक चेतना पर रहा विशेष जोर

कार्यक्रम के दौरान संतों और वक्ताओं ने माँ नर्मदा के संरक्षण, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन तथा आध्यात्मिक साहित्य के व्यापक प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया।

उपस्थित साहित्यकारों, शिक्षाविदों और श्रद्धालुओं ने इस कृति का स्वागत करते हुए इसे भारतीय सांस्कृतिक विरासत पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक बताया।

समारोह का संचालन प्रसिद्ध लेखक डॉ. अमित राय जैन ने किया। इस अवसर पर विश्व हिंदू परिषद के संगठन मंत्री श्री सुबोध चंद्रा तथा श्री रूपक शर्मा सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का आयोजन किताबवाले, नई दिल्ली द्वारा किया गया। अंत में प्रशांत जैन ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और मीडिया प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त किया।

‘वन्दे माँ नर्मदे’ क्यों है महत्वपूर्ण?

यह पुस्तक केवल माँ नर्मदा के धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है। इसमें भारतीय संस्कृति, इतिहास, पर्यावरण, लोकआस्था और आध्यात्मिक परंपरा को एक साथ समझने का प्रयास किया गया है। ऐसे साहित्य से समाज में सांस्कृतिक चेतना मजबूत होती है और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव भी विकसित होता है।

इसी कारण ‘वन्दे माँ नर्मदे’ को भारतीय सांस्कृतिक साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल किया जा सकता है।

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