आज के दौर में स्मार्टफोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई से लेकर नौकरी, कारोबार और व्यक्तिगत जीवन तक हर जगह एआई का उपयोग बढ़ रहा है। ऐसे समय में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या एआई मनुष्य की सोच, विवेक और संवेदनाओं की जगह ले सकता है?
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इसी विषय पर गायत्री शक्तिपीठ में आयोजित व्यक्तित्व परिष्कार सत्र में वरिष्ठ वक्ता डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने युवाओं से संवाद करते हुए तकनीक और आध्यात्म के संतुलन पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि एआई का उपयोग मानव कल्याण के लिए होना चाहिए, लेकिन यह मनुष्य के विवेक और आत्मचेतना का विकल्प नहीं बन सकता।
संयुक्त राष्ट्र में भी चर्चा का विषय बना AI
डॉ. जायसवाल ने बताया कि 5 से 10 जुलाई तक स्विट्जरलैंड के जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन आयोजित हो रहा है, जिसका विषय “AI for Good” है। इसमें अखिल विश्व गायत्री परिवार के डॉ. चिन्मय पांड्या भी भाग ले रहे हैं।
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उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भारतीय संस्कृति सदैव मानवता और लोककल्याण की बात करती है, उसी प्रकार दुनिया भी अब यह विचार कर रही है कि एआई का इस्तेमाल समाज और मानव जीवन के हित में कैसे किया जाए।
एआई सुविधा देता है, लेकिन सोचने की क्षमता कम नहीं होनी चाहिए
अपने संबोधन में उन्होंने विभिन्न विशेषज्ञों के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि तकनीक ने हमेशा मानव श्रम को आसान बनाया है, लेकिन पहली बार ऐसा दौर आया है जब तकनीक मनुष्य की मौलिक सोचने की क्षमता को प्रभावित करने लगी है।
उन्होंने कहा कि यदि हर प्रश्न का उत्तर एआई से ही लिया जाएगा तो व्यक्ति की जिज्ञासा, विश्लेषण और स्वतंत्र चिंतन धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकते हैं।
तकनीक के साथ संतुलन जरूरी
डॉ. जायसवाल ने कहा कि तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि उसका संतुलित उपयोग आवश्यक है।
उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि
- सक्रिय याददाश्त का अभ्यास करें।
- किसी भी जानकारी को एक से अधिक स्रोतों से सत्यापित करें।
- डिजिटल उपकरणों के बिना भी कुछ समय बिताएं।
- पुस्तकें पढ़ें, पहेलियां हल करें, नई भाषा सीखें और संगीत का अभ्यास करें।
- एक समय में एक ही कार्य करने की आदत विकसित करें।
उनका कहना था कि इससे दिमाग अधिक सक्रिय रहता है और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है।
एआई बुद्धि की नकल कर सकता है, हृदय की नहीं
डॉ. जायसवाल ने कहा कि एआई मूल रूप से एक डेटा प्रोसेसिंग सिस्टम है। यह उपलब्ध जानकारी के आधार पर उत्तर तैयार करता है। यह मनुष्य के मस्तिष्क की कुछ कार्यप्रणाली की नकल कर सकता है, लेकिन भावनाएं, करुणा, संवेदना और आत्मबोध पैदा नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के सभी गहरे अनुभव हृदय और चेतना से जुड़े होते हैं। इन्हें किसी एल्गोरिद्म में नहीं बदला जा सकता।
गीता का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक
उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के 42वें श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि शरीर से श्रेष्ठ इंद्रियां हैं, इंद्रियों से श्रेष्ठ मन, मन से श्रेष्ठ बुद्धि और बुद्धि से भी श्रेष्ठ आत्मा है। उन्होंने कहा कि ज्ञान केवल सूचना का संग्रह नहीं है। ज्ञान तब प्राप्त होता है जब श्रद्धा, विवेक और आत्मचिंतन का समन्वय होता है।
गीता के “श्रद्धावान लभते ज्ञानम्” और “ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे…” जैसे संदेश बताते हैं कि चेतना का वास्तविक केंद्र हृदय है, केवल बुद्धि नहीं।
एआई में चतुराई है, विवेक नहीं
डॉ. जायसवाल ने कहा कि एआई को जितना डेटा दिया जाता है, वह उसी के आधार पर उत्तर देता है। उसमें सही और गलत का नैतिक निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रतिभा और प्रज्ञा में अंतर है। एआई प्रतिभा की तरह काम कर सकता है, लेकिन प्रज्ञा अर्थात विवेक विकसित नहीं कर सकता।
उनका कहना था कि मनुष्य को ऐसी स्थिति नहीं आने देनी चाहिए जहां वह स्वयं सोचना छोड़ दे और हर निर्णय एआई पर छोड़ दे।
श्री अरविंद के विचारों का उल्लेख
डॉ. जायसवाल ने श्री अरविंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि अतिमानव वह नहीं जो सबसे अधिक शक्तिशाली हो, बल्कि वह है जो अधिक संवेदनशील हो और जिसकी चेतना परमात्मा के निकट पहुंच रही हो।
उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति तभी सार्थक है जब उसके साथ नैतिकता, संवेदना और आध्यात्मिक दृष्टि भी विकसित हो।
युवाओं से किया जागरूक रहने का आह्वान
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने युवाओं से कहा कि एआई से सीखना और उसका उपयोग करना गलत नहीं है, लेकिन एआई के माध्यम से अपनी सोच को नियंत्रित होने देना उचित नहीं है।
उन्होंने संदेश दिया कि “एआई के साथ सोचें, सीखें, लेकिन एआई के द्वारा सोचना स्वीकार न करें।”
कार्यक्रम में ये लोग रहे उपस्थित
इस अवसर पर भूतपूर्व रॉ अधिकारी राकेश कुमार, इंजीनियर रंजीत जी, प्रकाश ठाकुर, आलोक जी सहित बड़ी संख्या में गायत्री परिवार के सदस्य एवं युवा उपस्थित रहे।
निष्कर्ष
तकनीक मानव जीवन को सरल बना सकती है, लेकिन जीवन का मार्गदर्शन विवेक, संवेदना और आत्मचिंतन ही करते हैं। गायत्री शक्तिपीठ में दिया गया यह संदेश आज के डिजिटल युग में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि एआई जितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है, उतनी ही आवश्यकता मनुष्य के भीतर नैतिक चेतना और स्वतंत्र सोच को मजबूत करने की भी है।










