दिल्ली साइबर क्राइम के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस को एक नई केंद्रीय व्यवस्था मिल गई है। इसका नाम Delhi Cyber Crime Coordination Centre यानी D4C है। इसे राजधानी में साइबर अपराध की जांच, शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई और अलग-अलग पुलिस इकाइयों के तालमेल के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया है।
नई व्यवस्था 24 घंटे काम करेगी। ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी, रैनसमवेयर, फर्जी बम धमकी वाले ईमेल और महिलाओं व बच्चों के खिलाफ होने वाले ऑनलाइन अपराध इसकी प्राथमिकताओं में शामिल होंगे। दिल्ली के सभी 15 साइबर पुलिस थानों को भी इसके निर्देशों से जोड़ा जाएगा।
D4C क्या है?
D4C का पूरा नाम Delhi Cyber Crime Coordination Centre है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसकी स्थापना को अगस्त 2026 में मंजूरी मिली। इसका मुख्य कमांड सेंटर दिल्ली पुलिस मुख्यालय, जय सिंह रोड के टावर-2 में बनाया जा रहा है।
यह भी पढ़ेंः I4C साइबर अपराध पर कैसे भारी पड़ रहा है? जानिए पुलिस और आम लोगों के लिए कैसे काम करता है यह सिस्टम
D4C दिल्ली पुलिस आयुक्त के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करेगा। इसका नेतृत्व संयुक्त पुलिस आयुक्त स्तर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी करेंगे। एक पुलिस उपायुक्त और अन्य अधिकारी संचालन में उनकी सहायता करेंगे।
अभी दिल्ली में जिला साइबर पुलिस थाने, IFSO, 1930 हेल्पलाइन और दूसरी इकाइयां साइबर अपराध से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालती हैं। D4C इन सभी के बीच सूचनाओं और कार्रवाई का बेहतर तालमेल बनाने का काम करेगा।
D4C में कौन सी चार विंग होंगी?
D4C को चार प्रमुख हिस्सों में बांटने की योजना है।
1. प्रशासनिक विंग
यह विंग कर्मचारियों की तैनाती, संसाधन, प्रशिक्षण और दूसरी प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालेगी। अलग-अलग इकाइयों से मिलने वाली जानकारी का रिकॉर्ड भी इसी व्यवस्था के तहत रखा जा सकता है।
यह भी पढ़ेंः अभय चैटबॉटः डिजिटल अरेस्ट से बचा सकता है सीबीआई का यह AI टूल
2. साइबर जांच विंग
दिल्ली साइबर क्राइम से जुड़े गंभीर, संगठित और कई पीड़ितों वाले मामलों की जांच इस विंग को सौंपी जाएगी। फर्जी कॉल सेंटर, म्यूल बैंक खाते, संदिग्ध ऐप और बड़े ऑनलाइन ठगी नेटवर्क इसके निशाने पर रहेंगे।
म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खातों को कहा जाता है जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम प्राप्त करने या उसे आगे भेजने के लिए किया जाता है। कई मामलों में खाताधारक कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता अपराधियों को उपलब्ध करा देते हैं।
3. ऑपरेशन विंग
इस विंग के तहत 1930 साइबर हेल्पलाइन और Fraud Mitigation Centre को जोड़ा जाएगा। ऑनलाइन ठगी की शिकायत मिलते ही बैंक, वॉलेट कंपनी और संबंधित वित्तीय संस्थानों से संपर्क कर संदिग्ध रकम को रोकने का प्रयास किया जाएगा।
हालांकि, शिकायत करने मात्र से रकम वापस मिलने की गारंटी नहीं होती। ठगी के तुरंत बाद शिकायत करने से पैसा आगे भेजे जाने से पहले रोकने की संभावना बढ़ जाती है।
4. महिलाओं और बच्चों के ऑनलाइन अपराध की विंग
यह विंग साइबर स्टॉकिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न, आपत्तिजनक सामग्री, फर्जी प्रोफाइल, ब्लैकमेल और तकनीक की मदद से महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ किए गए अपराधों पर काम करेगी।
सोशल मीडिया पर नजर रखने, खुले डिजिटल स्रोतों से जानकारी जुटाने, आपत्तिजनक सामग्री हटवाने और पीड़ित की सहायता के लिए D4C का तालमेल I4C, SPUWAC, सोशल मीडिया कंपनियों और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं से रहेगा।
फर्जी बम धमकी वाले ईमेल की भी होगी जांच
दिल्ली के स्कूलों, अदालतों और सरकारी संस्थानों को भेजे जाने वाले फर्जी बम धमकी ईमेल पुलिस के लिए बड़ी समस्या बन चुके हैं। कई बार ईमेल भेजने वाला अपनी पहचान छिपाने के लिए VPN, फर्जी ईमेल पते और दूसरे तकनीकी तरीकों का इस्तेमाल करता है।
D4C में प्रस्तावित Hoax Bomb E-mail Investigation Cell ऐसे मामलों की जांच करेगा। सेल ईमेल का डिजिटल सुराग, आईपी एड्रेस, इस्तेमाल किए गए उपकरण और दूसरे तकनीकी प्रमाण खोजने का प्रयास करेगा।
दिल्ली में साइबर ठगी होने पर क्या करें?
अगर आपके बैंक खाते, यूपीआई, क्रेडिट कार्ड या डिजिटल वॉलेट से ठगी हुई है तो इन कदमों को तुरंत उठाएं:
- राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें।
- cybercrime.gov.in पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करें।
- शिकायत में रकम, समय, बैंक खाता और ट्रांजैक्शन नंबर सही भरें।
- ठग का मोबाइल नंबर, यूपीआई आईडी, बैंक विवरण और चैट के स्क्रीनशॉट सुरक्षित रखें।
- अपने बैंक को कॉल करके खाता या कार्ड सुरक्षित कराएं।
- गंभीर मामले में नजदीकी साइबर पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दें।
ठग से हुई बातचीत, ईमेल और भुगतान की रसीद को मोबाइल से मिटाएं नहीं। ये चीजें जांच में डिजिटल प्रमाण बन सकती हैं।
आम नागरिक को क्या लाभ मिल सकता है?
D4C से सबसे बड़ा लाभ शिकायत और जांच के बीच लगने वाला समय कम होने के रूप में मिल सकता है। अभी कई साइबर मामलों में बैंक, जिला पुलिस, डिजिटल कंपनी और दूसरी एजेंसियों से अलग-अलग संपर्क करना पड़ता है।
एक केंद्रीय व्यवस्था बनने से ठगी के बैंक खाते पहचानने, संदिग्ध रकम रोकने, मोबाइल और क्लाउड से प्रमाण जुटाने तथा अलग-अलग मामलों में जुड़े एक ही गिरोह का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
नई व्यवस्था कितनी असरदार होगी, यह शिकायतों पर कार्रवाई की गति, प्रशिक्षित कर्मचारियों, तकनीकी संसाधनों और बैंकों के सहयोग पर निर्भर करेगा।











