भारत में उच्च शिक्षा की समस्याएं: महंगी फीस कैसे निगल रही मध्यम वर्ग के सपने

IIT, IIM और निजी मेडिकल कॉलेजों की बढ़ती फीस ने उच्च शिक्षा को मध्यम वर्ग की पहुंच से दूर कर दिया है। वी.के. बहुगुणा बता रहे हैं कि शिक्षा ऋण, NRI कोटा और महंगी सीटें भारत के युवाओं को किस तरह प्रभावित कर रही हैं।
वी.के. बहुगुणा के साथ भारत में महंगी उच्च शिक्षा, एजुकेशन लोन और परेशान विद्यार्थी को दिखाती फीचर इमेज

भारत में उच्च शिक्षा की समस्याएं अब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं हैं। इनका असर उन लाखों मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है, जो अपनी जमा पूंजी लगाकर बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर या प्रबंधन विशेषज्ञ बनाना चाहते हैं। प्रश्नपत्र लीक, महंगी फीस, शिक्षा ऋण और पैसे के सहारे मिलने वाली सीटों ने इस भरोसे को चोट पहुंचाई है कि मेहनत और प्रतिभा के बल पर कोई भी विद्यार्थी आगे बढ़ सकता है।

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हाल में जंतर-मंतर, झारखंड और कई राज्यों में प्रश्नपत्र लीक के विरोध में हुए आंदोलनों ने विद्यार्थियों की नाराजगी सामने ला दी। लेखक का मानना है कि विवादित यूजीसी दिशा-निर्देशों से उपजे असंतोष को प्रश्नपत्र लीक के मामलों ने और बढ़ा दिया। कुछ मामलों की जांच में परीक्षाओं के संचालन से जुड़े लोगों और वरिष्ठ शिक्षकों की कथित भूमिका सामने आना शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।

सस्ती पढ़ाई से लाखों की फीस तक का सफर

मैं इस संकट को एक मध्यम वर्गीय व्यक्ति के अनुभव से देखता हूं। मैंने स्वयं अपेक्षाकृत कम खर्च में मास्टर डिग्री पूरी की। मेरे पुत्र ने वर्ष 2001 में IIT दिल्ली में बीटेक में प्रवेश लिया था। उस समय उसकी सालाना फीस लगभग 18 हजार रुपये थी। इसी कारण एक सामान्य आय वाला परिवार भी देश के प्रतिष्ठित संस्थान में अपने बच्चे को पढ़ाने का साहस कर सकता था।

आज एक ग्रुप-ए अधिकारी के लिए भी निजी मेडिकल कॉलेज में बच्चे को पढ़ाना आसान नहीं है। फीस इतनी अधिक हो चुकी है कि सरकारी सेवा या नियमित वेतन से होने वाली आय भी कई बार पर्याप्त नहीं पड़ती। सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार के लिए यह खर्च अपनी पूरी बचत लगाने या बड़ी रकम का कर्ज लेने के बिना संभव नहीं दिखता।

देश के अनेक परिवारों में माता-पिता अपनी जमा पूंजी, मकान और दूसरी संपत्तियों का हिसाब लगाकर यह तय करने को मजबूर हैं कि वे अपने बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठा सकते हैं या नहीं। कभी कॉलेज की सीट को गरीबी और सीमित अवसरों से बाहर निकलने का रास्ता माना जाता था। अब वही सीट भारी निवेश में बदलती जा रही है।

भारत में उच्च शिक्षा इतनी महंगी क्यों हो रही है?

सार्वजनिक धन से स्थापित IIT और IIM जैसे संस्थानों का उद्देश्य प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराना था। इन संस्थानों की बढ़ती फीस ने सुलभ शिक्षा के इस विचार पर सवाल खड़े किए हैं।

IIM अहमदाबाद, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे प्रमुख प्रबंधन संस्थानों में दो वर्षीय प्रबंधन कार्यक्रम की फीस लगभग 24.5 लाख से 27.5 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है। किताबें, निजी खर्च और रहने की लागत जोड़ने पर कुल रकम 30 से 35 लाख रुपये तक जा सकती है।

IIT में चार वर्षीय बीटेक की ट्यूशन फीस करीब एक लाख रुपये प्रति सेमेस्टर है। संस्थान के अन्य शुल्क, छात्रावास और भोजन का खर्च जोड़ने पर चार वर्षों की लागत लगभग 9.5 लाख से 13.9 लाख रुपये तक पहुंच सकती है।

सबसे कठिन स्थिति चिकित्सा शिक्षा में दिखाई देती है। सरकारी मेडिकल सीट नहीं मिलने पर निजी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने का खर्च लगभग 50 लाख रुपये से शुरू होकर 1.5 करोड़ रुपये या इससे अधिक हो सकता है। कॉलेज, राज्य और कोटा बदलने पर वास्तविक फीस में बड़ा अंतर भी मिलता है।

कमाई के मुकाबले पढ़ाई का खर्च कितना बड़ा?

भारत की औसत शुद्ध सालाना प्रति व्यक्ति आय लगभग 2.08 लाख रुपये मानें तो उच्च शिक्षा की लागत का अंतर साफ दिखाई देता है।

लगभग 27.5 लाख रुपये की IIM फीस औसत भारतीय की 13 वर्षों से अधिक की सालाना आय के बराबर बैठती है। IIT से बीटेक की करीब 11 लाख रुपये की लागत पांच वर्षों से अधिक की आय के बराबर है। निजी मेडिकल कॉलेज की एक करोड़ रुपये की सीट के लिए लगभग 48 वर्षों की औसत शुद्ध आय के बराबर रकम चाहिए।

ये आंकड़े बताते हैं कि मामला फीस बढ़ने भर का नहीं है। उच्च शिक्षा की लागत और परिवारों की कमाई के बीच फासला बहुत बड़ा हो चुका है।

प्रमुख पाठ्यक्रमअनुमानित कुल खर्चऔसत सालाना प्रति व्यक्ति आय से तुलना
IIM का दो वर्षीय प्रबंधन कार्यक्रम₹30 से ₹35 लाखलगभग 14 से 17 वर्ष
IIT से चार वर्षीय बीटेक₹9.5 से ₹13.9 लाखलगभग 5 से 7 वर्ष
निजी कॉलेज से एमबीबीएस₹50 लाख से ₹1.5 करोड़ या अधिकलगभग 24 से 72 वर्ष

फीस संस्थान, राज्य, कोटा और शैक्षणिक सत्र के अनुसार बदल सकती है। प्रवेश से पहले संबंधित संस्थान की आधिकारिक फीस जरूर देखें।

शिक्षा ऋण से करियर पर बढ़ता दबाव

पढ़ाई का खर्च और पारिवारिक आय का अंतर पूरा करने के लिए विद्यार्थी शिक्षा ऋण लेते हैं। इन ऋणों की ब्याज दर लगभग 8.5 से 13 प्रतिशत सालाना तक हो सकती है। बैंक, ऋण राशि और योजना के अनुसार ब्याज दर अलग रहती है।

इस व्यवस्था में युवा पहली नौकरी और पहली तनख्वाह मिलने से पहले ही कर्जदार बन जाता है। पढ़ाई पूरी होने के बाद उसके सामने मनपसंद करियर और कर्ज चुकाने के बीच चुनाव खड़ा हो सकता है।

बुनियादी विज्ञान, सार्वजनिक सेवा, शोध या अपना कारोबार शुरू करने की इच्छा रखने वाला विद्यार्थी अधिक वेतन वाली कॉरपोरेट नौकरी चुनने के लिए मजबूर हो सकता है, क्योंकि उसे हर महीने शिक्षा ऋण की किस्त चुकानी होती है। इसका असर देश के शोध, सार्वजनिक सेवाओं और नए उद्यमों पर भी पड़ सकता है।

IIT और IIM की फीस पर पहले भी उठे सवाल

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में शिक्षा मंत्री रहे डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने IIT और IIM की फीस बढ़ाए जाने पर सवाल उठाया था। उन्हें संस्थानों की स्वायत्तता के नाम पर आलोचना का सामना करना पड़ा।

यह बहस आज भी प्रासंगिक है। यदि सरकारी जमीन, सार्वजनिक संसाधन और करदाताओं के पैसे से खड़े हुए संस्थान भी सामान्य परिवारों की पहुंच से बाहर हो जाएं तो उनकी सामाजिक भूमिका क्या रह जाती है? वित्तीय आत्मनिर्भरता जरूरी हो सकती है, लेकिन इसे ऐसी फीस का तर्क नहीं बनाया जा सकता जो प्रतिभाशाली विद्यार्थी को प्रवेश लेने से पहले ही कर्ज के डर में डाल दे।

NRI कोटा और पैसे से सीट मिलने का सवाल

मेडिकल और तकनीकी संस्थानों का NRI कोटा भी लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। कई मामलों में आर्थिक रूप से संपन्न उम्मीदवार सामान्य फीस से तीन से पांच गुना ज्यादा रकम देकर सीट हासिल कर लेते हैं। इससे कम आय वाले योग्य विद्यार्थी पीछे छूट सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी NRI कोटे की विस्तृत व्याख्या पर सख्त टिप्पणी कर चुका है। अदालत ने इसे कई बार धन कमाने का माध्यम बनाए जाने और योग्यता के साथ धोखा होने का सवाल उठाया। यदि कम प्रवेश रैंक वाला विद्यार्थी पैसे के बल पर सीट हासिल कर ले और अधिक अंक वाला विद्यार्थी फीस न दे पाने के कारण बाहर रह जाए तो पूरी प्रवेश व्यवस्था पर भरोसा कम होता है।

दूसरे देशों में सार्वजनिक शिक्षा का मॉडल

जर्मनी के कई सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में स्नातक पाठ्यक्रमों की ट्यूशन फीस बहुत कम या शून्य है। फ्रांस में सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को सरकार से बड़ी आर्थिक सहायता मिलती है और सामान्य डिग्री पाठ्यक्रमों की फीस अपेक्षाकृत कम रखी जाती है।

नॉर्वे, फिनलैंड और डेनमार्क में भी सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को सरकारी वित्तीय सहायता मिलती है। हालांकि इन देशों में नागरिकता, पाठ्यक्रम और विद्यार्थी की श्रेणी के अनुसार फीस संबंधी नियम अलग हो सकते हैं।

इन व्यवस्थाओं के पीछे यह सोच है कि उच्च शिक्षा पर किया गया सार्वजनिक खर्च भविष्य में प्रशिक्षित नागरिकों, शोध, नए आविष्कार और अधिक कर राजस्व के रूप में देश को वापस मिलता है।

महंगी शिक्षा का असर पूरे समाज पर पड़ता है

शिक्षा के लाभ कमाने वाले बाजार में बदलने का पहला नुकसान गरीब और मध्यम वर्गीय विद्यार्थियों को होता है। प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश की योग्यता होने के बाद भी फीस उनके रास्ते में दीवार बन सकती है।

दूसरा नुकसान प्रतिभा आधारित प्रवेश का होता है। यदि पैसा किसी विद्यार्थी के लिए अलग रास्ता खोल सकता है तो मेहनत और योग्यता का महत्व कमजोर पड़ता है।

तीसरा असर परिवारों पर पड़ने वाले लंबे कर्ज के रूप में सामने आता है। एक मेडिकल छात्र यदि एमबीबीएस की पढ़ाई पर एक करोड़ रुपये खर्च करता है तो पेशे में आने के बाद उस रकम की भरपाई का दबाव उस पर रहेगा। इसका असर चिकित्सा सेवाओं की लागत और डॉक्टर के पेशेवर फैसलों पर भी पड़ सकता है।

उच्च शिक्षा की फीस पर राष्ट्रीय नीति जरूरी

प्रधानमंत्री और सभी राजनीतिक दलों को शिक्षा सुधार पर राष्ट्रीय सहमति बनाने की जरूरत है। सरकारी और निजी संस्थानों में पढ़ाई की वास्तविक लागत जानने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा शुल्क कार्यबल बनाया जा सकता है। इसे मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रबंधन और कानून जैसे पाठ्यक्रमों की फीस का अध्ययन करने तथा उसकी समीक्षा करने का कानूनी अधिकार मिलना चाहिए।

फीस वास्तविक संचालन लागत के अनुसार तय होनी चाहिए। उसमें पढ़ाई, प्रयोगशाला, शिक्षकों के वेतन, छात्रावास और जरूरी ढांचे का खर्च शामिल किया जा सकता है, लेकिन मुनाफाखोरी को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

पैसे पर आधारित कोटा और व्यावसायिक सीटों की समीक्षा भी जरूरी है। प्रवेश का मुख्य पैमाना योग्यता और पारदर्शी नियम होने चाहिए। निम्न तथा मध्यम आय वाले परिवारों के विद्यार्थियों को शिक्षा ऋण पर ब्याज सहायता दी जानी चाहिए, ताकि पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका जीवन भारी EMI से शुरू न हो।

जो देश अपनी कक्षाओं को सबसे अधिक रकम चुकाने वाले लोगों तक सीमित कर देता है, वह अपने भविष्य के अवसरों को सीमित करता है। भारत के युवाओं के सपने उनके माता-पिता की आर्थिक क्षमता से तय नहीं होने चाहिए। शिक्षा ऐसी सीढ़ी बने जिस पर प्रतिभा और परिश्रम के बल पर आगे बढ़ा जा सके, न कि ऐसी दीवार जिसके दरवाजे धनवानों के लिए ही खुलें।

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DR. VK Bahuguna
डॉ. वी.के. बहुगुणा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र के वरिष्ठ विशेषज्ञ हैं। वे भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के पूर्व महानिदेशक एवं कुलाधिपति रह चुके हैं। वर्तमान में वे संसाधन प्रबंधन एवं पर्यावरण केंद्र (CRE) के अध्यक्ष हैं। पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर उनका व्यापक अनुभव और शोध रहा है।

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21-09-2026