Online Fraud: नौकरी और निवेश के नाम पर ₹641 करोड़ की ठगी, आखिर कहां गया पैसा?

ईडी की जांच में ऑनलाइन फ्रॉड के ₹641 करोड़ को म्यूल खातों, फर्जी कंपनियों, विदेशी फिनटेक मंच और क्रिप्टो से जोड़ने वाला कथित नेटवर्क सामने आया है। दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर रमण कुमार सिंह समझा रहे हैं पूरा नेटवर्क
ऑनलाइन फ्रॉड के ₹641 करोड़ को म्यूल खातों और क्रिप्टो के जरिए विदेश भेजने का सांकेतिक चित्र

मोबाइल पर पार्ट टाइम नौकरी का संदेश आया। घर बैठे कमाई का भरोसा दिया गया। शुरुआत में छोटी रकम जमा कराई गई और स्क्रीन पर मुनाफा भी दिखाया गया। किसी दूसरे व्यक्ति को निवेश के नाम पर अधिक लाभ का लालच दिया गया। कुछ लोग फिशिंग और ऑनलाइन भुगतान धोखाधड़ी का शिकार हुए।

पीड़ितों ने अलग-अलग तरीकों से पैसा गंवाया, लेकिन उनकी रकम अंत में एक ही कथित साइबर अपराध गिरोह के पास पहुंचती रही। प्रवर्तन निदेशालय की जांच में सामने आया कि ऑनलाइन फ्रॉड से जुटाई गई रकम को म्यूल खातों, फर्जी कंपनियों, विदेशी फिनटेक मंच और क्रिप्टो के जरिए छिपाया गया।

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ईडी ने लगभग ₹641 करोड़ के साइबर फ्रॉड और धन शोधन मामले में दो चार्टर्ड अकाउंटेंट अशोक कुमार शर्मा और भास्कर यादव को 28 फरवरी 2026 को गिरफ्तार किया। यह कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 के तहत की गई। दोनों के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर न्यायिक प्रक्रिया जारी है।

यह मामला लोगों के लिए बड़ी चेतावनी है। ऑनलाइन फ्रॉड में पैसा गंवाने के बाद सवाल उठता है कि आखिर यह रकम जाती कहां है और अपराधी इसे पुलिस तथा जांच एजेंसियों से कैसे छिपाते हैं?

₹641 करोड़ के साइबर फ्रॉड में क्या सामने आया?

ईडी के मुताबिक, ऑनलाइन धोखाधड़ी से जुड़ी करीब ₹641 करोड़ की रकम को ठिकाने लगाने के लिए सुनियोजित व्यवस्था बनाई गई थी। इसमें शिक्षित पेशेवरों के शामिल होने का आरोप है।

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जांच एजेंसी का दावा है कि चार्टर्ड अकाउंटेंट अशोक कुमार शर्मा, भास्कर यादव, अजय और विपिन यादव कथित सिंडिकेट से जुड़े थे। दिल्ली के बिजवासन में एक ही पते और आपस में जुड़े दस्तावेजों के सहारे 20 से अधिक कंपनियां बनाई गई थीं।

इन कंपनियों में कई साझेदार और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता समान थे। इनके केवाईसी दस्तावेज, मोबाइल नंबर और ईमेल पते भी आपस में जुड़े मिले। ईडी का आरोप है कि इन कंपनियों का इस्तेमाल ऑनलाइन फ्रॉड से प्राप्त रकम का असली स्रोत छिपाने के लिए किया गया।

लोगों को किन तरीकों से बनाया गया शिकार?

जांच में कई प्रकार की ऑनलाइन धोखाधड़ी से प्राप्त रकम के इस्तेमाल की बात सामने आई। इनमें फर्जी निवेश योजनाएं, पार्ट टाइम नौकरी का झांसा, फिशिंग और ऑनलाइन भुगतान से जुड़ी ठगी शामिल है।

पार्ट टाइम जॉब फ्रॉड

इस धोखाधड़ी में लोगों को घर बैठे वीडियो पसंद करने, उत्पाद की रेटिंग करने या ऑनलाइन काम पूरा करने का प्रस्ताव मिलता है। शुरुआत में थोड़ी कमाई देकर भरोसा जीता जाता है। इसके बाद अधिक मुनाफे के नाम पर बड़ी रकम जमा करा ली जाती है।

फर्जी निवेश योजना

व्हाट्सऐप और टेलीग्राम समूहों में शेयर बाजार, क्रिप्टो या किसी कारोबारी योजना से भारी लाभ का दावा किया जाता है। पीड़ित को नकली ऐप या वेबसाइट पर बढ़ता हुआ मुनाफा दिखाई देता है। रकम निकालने का प्रयास करने पर कर, सेवा शुल्क या सुरक्षा राशि के नाम पर और पैसा मांगा जाता है।

फिशिंग और भुगतान धोखाधड़ी

धोखेबाज बैंक, कंपनी या सरकारी संस्था के नाम से नकली लिंक भेजते हैं। लिंक खोलने पर बैंक खाते, कार्ड, पासवर्ड या ओटीपी जैसी जानकारी मांगी जाती है। कुछ मामलों में भुगतान प्राप्त करने का दावा करके क्यूआर कोड स्कैन कराया जाता है।

याद रखें, पैसा प्राप्त करने के लिए यूपीआई पिन डालने की जरूरत नहीं होती। यूपीआई पिन डालने का अर्थ आमतौर पर खाते से भुगतान की अनुमति देना है।

साइबर ठगी का ₹641 करोड़ कहां गया?

ईडी की जांच इस मामले को सामान्य ऑनलाइन फ्रॉड से अलग बनाती है। आरोप है कि पीड़ितों से ठगी गई रकम को सीधे विदेश नहीं भेजा गया। पैसा कई खातों और कंपनियों से गुजारा गया, जिससे उसका असली स्रोत पहचानना कठिन हो जाए।

रकम का चरणकथित तरीका
पहला चरणपीड़ितों का पैसा म्यूल बैंक खातों में जमा कराया गया
दूसरा चरणरकम को 20 से अधिक फर्जी कंपनियों के खातों में घुमाया गया
तीसरा चरणभारतीय बैंकों के वीजा और मास्टरकार्ड डेबिट कार्ड से भुगतान किया गया
चौथा चरणरकम संयुक्त अरब अमीरात स्थित PYYPL फिनटेक मंच पर पहुंचाई गई
पांचवां चरणदुबई में नकदी निकाली गई या रकम क्रिप्टो परिसंपत्तियों में बदली गई

ईडी के आरोपों के अनुसार, कुछ रकम को Binance क्रिप्टो एक्सचेंज के जरिए आभासी डिजिटल परिसंपत्तियों में बदला गया। जांच एजेंसी अब लेनदेन और इससे जुड़े लोगों की भूमिका की पड़ताल कर रही है।

किसी फिनटेक मंच या क्रिप्टो एक्सचेंज का नाम जांच में आना अपने आप उस मंच को अपराध का भागीदार साबित नहीं करता। आरोप उन लोगों पर है जिन्होंने इन सेवाओं का कथित रूप से गलत इस्तेमाल किया।

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म्यूल अकाउंट क्या होता है?

म्यूल अकाउंट वह बैंक खाता होता है जिसका इस्तेमाल किसी दूसरे व्यक्ति की अवैध रकम प्राप्त करने या आगे भेजने में किया जाता है। कई बार खाता धारक को कमीशन का लालच देकर बैंक खाता, एटीएम कार्ड, सिम, चेकबुक या इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी ले ली जाती है।

कुछ लोग यह सोचकर अपना खाता दे देते हैं कि उन्हें प्रत्येक लेनदेन पर कमीशन मिलेगा। ऐसा करना गंभीर कानूनी परेशानी पैदा कर सकता है। खाते में साइबर ठगी की रकम आने पर बैंक खाता फ्रीज हो सकता है और खाता धारक को पुलिस जांच का सामना करना पड़ सकता है।

अपराधी टेलीग्राम और दूसरे सोशल मीडिया मंचों पर बैंक खाता उपलब्ध कराने वालों की तलाश करते हैं। छात्र, बेरोजगार युवक, छोटे दुकानदार और आर्थिक परेशानी में फंसे लोग इनके निशाने पर आ सकते हैं।

पेशेवर जानकारी के इस्तेमाल का आरोप

ईडी का दावा है कि इस मामले में कंपनियां बनाने, बैंक खाते खुलवाने और रकम को कई स्तरों पर घुमाने के लिए पेशेवर जानकारी का इस्तेमाल किया गया।

चार्टर्ड अकाउंटेंट पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी कंपनियों के गठन और नियंत्रण में भूमिका निभाई। उनकी पेशेवर पहचान के कारण कंपनियों तथा वित्तीय लेनदेन को पहली नजर में वैध दिखाने में सहायता मिली।

इस मामले के कारण सभी चार्टर्ड अकाउंटेंट या बैंक कर्मचारियों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। जांच संबंधित व्यक्तियों की कथित भूमिका पर केंद्रित है।

नवंबर 2024 में हुई थी छापेमारी

ईडी ने 28 नवंबर 2024 को अशोक कुमार शर्मा और भास्कर यादव के ठिकानों पर तलाशी ली थी। एजेंसी का आरोप है कि तलाशी के दौरान अशोक कुमार शर्मा वहां से निकल गए और ईडी अधिकारियों पर कथित हमला किया गया। इस संबंध में दिल्ली के कापसहेड़ा थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

तलाशी के दौरान फर्जी बताई गई कंपनियों से संबंधित एटीएम कार्ड, चेकबुक और कई दस्तावेज बरामद किए गए। दोनों ने अग्रिम जमानत के लिए अदालतों का रुख किया। राहत नहीं मिलने और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद दोनों ने आत्मसमर्पण किया। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया।

ईडी के अनुसार, मामले में अब तक कुल 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। करीब ₹8.67 करोड़ मूल्य की चल और अचल संपत्ति अस्थायी रूप से कुर्क की जा चुकी है। मामले में आगे की जांच जारी है।

Online Fraud से कैसे बचें?

घर बैठे कमाई का कोई प्रस्ताव मिले तो संबंधित कंपनी की वेबसाइट, पंजीकरण और संपर्क पते की जांच करें। टेलीग्राम या व्हाट्सऐप पर मिले व्यक्ति के कहने पर पैसा जमा न करें।

निवेश पर तय या असामान्य लाभ का दावा खतरे का संकेत हो सकता है। किसी ऐप में दिखाई दे रहा मुनाफा असली होने का प्रमाण नहीं है। पैसा लगाने से पहले यह जांचें कि निवेश सेवा सेबी के पास पंजीकृत है या नहीं।

कमीशन के बदले अपना बैंक खाता, सिम कार्ड, एटीएम कार्ड या यूपीआई खाता किसी को इस्तेमाल करने के लिए न दें। बैंक खाते में अनजान रकम आए तो उसे आगे भेजने के बजाय तुरंत बैंक को सूचित करें।

ऑनलाइन ठगी होने पर देर न करें। तत्काल बैंक से संपर्क करके लेनदेन रोकने की मांग करें। इसके बाद राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें। शिकायत में लेनदेन संख्या, बैंक विवरण, मोबाइल नंबर, चैट और स्क्रीनशॉट जरूर लगाएं।

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inspector raman kumar
इंस्पेक्टर रमण कुमार सिंह,दिल्ली पुलिस में बतौर इंस्पेक्टर तैनात है । वे दिल्ली के कई पुलिस थानों के साथ साथ साइबर पुलिस स्टेशन के थानाध्यक्ष रहे है । वे साइबर जागरूकता के लिए साइबर सेफ व्हाट्सएप्प ग्रुप और बी द पुलिस नाम से फेसबुक पेज और फेसबुक ग्रुप के संचालक है ।

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08-09-2026