मनुष्य बाजार से दवा खरीद सकता है, लेकिन स्वास्थ्य नहीं। स्वास्थ्य शरीर की स्वाभाविक अवस्था है और बीमारी किसी विकृति का संकेत। इसलिए स्वस्थ रहने के लिए बीमारी के कारण, भोजन की प्रकृति और अपनी दिनचर्या को समझना जरूरी है।
यह बात डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने गायत्री शक्तिपीठ में आयोजित व्यक्तित्व परिष्कार सत्र को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, योग और सात्विक भोजन का उल्लेख करते हुए लोगों को प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने का संदेश दिया।
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चिकित्सा ने शरीर को समझा, लेकिन बीमारी के कारण पर भी विचार जरूरी
डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने कहा कि पश्चिमी चिकित्सा का प्रारंभ यूनान से माना जाता है। पाश्चात्य जगत में लंबे समय तक ज्ञान और विज्ञान का बड़ा स्रोत यूनान रहा। शुरुआती दौर में यूनानी चिकित्सा, आयुर्वेद और हकीमी चिकित्सा में शरीर के साथ प्रकृति को समझने पर भी ध्यान दिया गया।
उनके मुताबिक समय बीतने के साथ शरीर रचना, शरीर क्रिया और रोग विज्ञान पर अधिक जानकारी जुटाई गई। इससे शरीर की बीमारी पहचानने और उसका उपचार करने में प्रगति हुई, लेकिन यह सवाल पीछे छूटता गया कि शरीर में विकृति पैदा क्यों हुई।
डॉ. जायसवाल ने कहा कि आयुर्वेद बीमारी के कारणों को मनुष्य के भोजन, व्यवहार, दिनचर्या और प्रकृति से जोड़कर देखता है। इसलिए स्वस्थ जीवन के लिए उपचार के साथ बीमारी पैदा करने वाली आदतों को पहचानना भी जरूरी है।
सात्विक भोजन क्या है
डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने भोजन को सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवृत्तियों के आधार पर समझाया। उनके अनुसार जो भोजन स्वास्थ्य, पोषण और शरीर की जरूरत को ध्यान में रखकर लिया जाता है, उसे सात्विक भोजन कहा जा सकता है।
जो भोजन मुख्य रूप से स्वाद की इच्छा पूरी करने के लिए लिया जाए, वह राजसिक प्रवृत्ति का माना जाता है। स्वाद के कारण आवश्यकता से अधिक भोजन करना तामसिक प्रवृत्ति का संकेत हो सकता है।
उन्होंने कहा कि आहार ऐसा होना चाहिए जिसे शरीर आसानी से पचा सके। भोजन की मात्रा, उसे खाने का समय और व्यक्ति की पाचन क्षमता भी महत्त्वपूर्ण है। पेट भर जाने के बाद भी खाते रहना शरीर पर अनावश्यक बोझ डाल सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी स्वस्थ भोजन के लिए पर्याप्त पोषण, संतुलन, संयम और विविधता को जरूरी मानता है। फल, सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ संतुलित भोजन का हिस्सा हो सकते हैं। भोजन की जरूरत उम्र, स्वास्थ्य, जीवनशैली और शारीरिक सक्रियता के अनुसार बदल सकती है।
शाकाहार और मांसाहार पर क्या कहा
डॉ. जायसवाल ने कहा कि सामान्य रूप से शाकाहारी भोजन को सात्विक माना जाता है। कुछ स्थानों पर वनस्पति भोजन उपलब्ध न होने के कारण लोग जीवन रक्षा के लिए मांस या मछली का सेवन करते रहे हैं। उनके मुताबिक ऐसी परिस्थितियां अपवाद थीं, लेकिन बाद में अपवाद को सामान्य नियम मान लिया गया।
उन्होंने यह विचार भी रखा कि मनुष्य के खाने, पानी पीने और पाचन तंत्र की कई विशेषताएं शाकाहारी जीवों से मेल खाती हैं। उन्होंने लंबी आंत और घूंट-घूंट पानी पीने का उदाहरण दिया।
यहां यह समझना जरूरी है कि शाकाहार या मांसाहार से जुड़ी पोषण आवश्यकता हर व्यक्ति में समान नहीं होती। किसी बीमारी, गर्भावस्था, कमजोरी या पोषक तत्व की कमी की स्थिति में आहार विशेषज्ञ अथवा योग्य चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।
जीभ से शुरू होती हैं कई गलतियां
व्यक्तित्व परिष्कार सत्र में डॉ. जायसवाल ने हकीम लुकमान का कथन सुनाया, “इंसान अपनी कब्र जीभ की नोक से खोदता है।”
इस कथन के माध्यम से उन्होंने समझाया कि स्वाद के पीछे भागने और जरूरत से ज्यादा भोजन करने की आदत स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकती है। उनका कहना था कि विधाता ने मनुष्य को स्वस्थ शरीर देकर भेजा है, लेकिन प्रदूषण, गंदगी, गलत खानपान और अव्यवस्थित जीवनशैली से बीमारी के कारण पैदा किए जाते हैं।
उन्होंने कहा, “स्वास्थ्य कहीं बाजार में नहीं मिलता। बीमारी हट जाए तो हम स्वस्थ हैं। डॉक्टर, वैद्य या हकीम मनुष्य को नया स्वास्थ्य नहीं देता, वह शरीर में आई विकृति को हटाने में सहायता करता है।”
शरीर दवा नहीं, शुद्धि मांगता है
डॉ. अरुण कुमार जायसवाल के मुताबिक कई शारीरिक परेशानियां शरीर में जमा विषैले तत्वों और बिगड़ी जीवनशैली से जुड़ी हो सकती हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में खानपान, पानी, धूप, मिट्टी, आराम और अन्य प्राकृतिक उपायों के माध्यम से शरीर की स्वाभाविक क्षमता को सहारा देने का प्रयास किया जाता है।
उन्होंने कहा, “सच यह है कि शरीर दवा नहीं मांगता, शरीर शुद्धि मांगता है।” उनके अनुसार प्राकृतिक चिकित्सा को बीमारी ठीक करने की पद्धति के साथ प्राकृतिक स्वास्थ्य देखभाल के रूप में समझना चाहिए।
इस विचार का अर्थ चिकित्सकीय उपचार छोड़ना नहीं है। गंभीर बीमारी, संक्रमण, लगातार दर्द या किसी आपात स्थिति में जांच और योग्य डॉक्टर का उपचार जरूरी है। योग, भोजन और प्राकृतिक जीवनशैली चिकित्सकीय परामर्श के पूरक हो सकते हैं, उसके स्थानापन्न नहीं।
मानसिक विकृति दूर करने में योग और ध्यान की भूमिका
डॉ. जायसवाल ने कहा कि प्रकृति और विकृति का अंतर समझ लिया जाए तो स्वास्थ्य से जुड़ी कई बातें आसान हो सकती हैं। यदि परेशानी मानसिक स्तर पर है तो अच्छा साहित्य पढ़ना, सकारात्मक चिंतन, अपने मन को समझना, आसन, प्राणायाम और ध्यान उपयोगी हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि प्राणायाम किसी एक धर्म या संप्रदाय की क्रिया नहीं है। इसका संबंध श्वास को व्यवस्थित करने के अभ्यास से है। आयुष मंत्रालय के योग पोर्टल पर भी आसन, प्राणायाम और ध्यान को प्रचलित योग अभ्यासों में शामिल किया गया है।
योग का अभ्यास अपनी उम्र और स्वास्थ्य के अनुसार प्रशिक्षित शिक्षक की देखरेख में करना चाहिए। सांस रोकने वाले या कठिन अभ्यास हर व्यक्ति के लिए उचित नहीं होते।
जैविक घड़ी का रखें ध्यान
डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने कहा कि मनुष्य की जैविक घड़ी सूर्य और प्राकृतिक प्रकाश के अनुसार चलती है। देर रात तक जागना, अनियमित समय पर खाना और प्रकृति के विपरीत दिनचर्या अपनाना शरीर के स्वाभाविक क्रम को प्रभावित कर सकता है।
उनका संदेश था कि लोगों के धर्म, रीति-रिवाज, पहनावे और रहन-सहन अलग हो सकते हैं, लेकिन शरीर की मूल जरूरतें समान हैं।
उन्होंने कहा, “शरीर न जाति मानता है, न धर्म और न मजहब। शरीर कुदरत के नियमों को मानता है। शरीर स्वस्थ रहेगा तो मनुष्य सेवा, प्रार्थना और इबादत भी कर सकेगा। वह स्वयं खुश रहेगा और उसका परिवार भी प्रसन्न रहेगा।”












