नारी के रूपः मातृत्व, प्रेम और तपस्विनी शक्ति-डा. अरूण कुमार जायसवाल

गायत्री शक्तिपीठ में व्यक्तित्व परिष्कार सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने कहा कि स्त्री अपने सौंदर्य के कारण नहीं बल्कि मातृत्व और प्रेम की शक्ति के कारण पूजनीय होती है।
गायत्री शक्तिपीठ व्यक्तित्व परिष्कार सत्र में नारी के मातृत्व और प्रेम पर डॉ अरुण कुमार जायसवाल का संबोधन

बिहार के सहरसा में आयोजित व्यक्तित्व परिष्कार सत्र में नारी के रूप पर गंभीर और गूढ़ चर्चा हुई। सत्र को संबोधित करते हुए डा. अरुण कुमार जायसवाल ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी के स्वरूप को अत्यंत गंभीरता और गूढ़ता के सात समझा गया है।

स्त्री पूज्यनीय क्यों ?-सौंदर्य नहीं, मातृत्व से

डा. जायसवाल ने कहा कि प्रेम किसी के मन में हो सकता है मगर मातृत्व विरले हृदयों में ही प्रकट होता है। उनके अनुसार नारी अपने सौंदर्य के कारण प्रशंसनीय हो सकती है, लेकिन वह मातृत्व के कारण पूज्यनीय बनती है। उन्होंने कहा कि संतान के माध्यम से नारी का आस्तित्व पूर्णता प्राप्त करता है, और यही उसकी सबसे बड़ी आध्यात्मिक शक्ति है।

मौन संप्रेषण की अद्भुत शक्ति

उन्होंने बताया कि स्त्री के प्रेम की दो विशेषताएं होती हैं। पहली, वह बिना शब्दों के ही अपने प्रेम को सामने वाले तक पहुंचा देती है। यह मौन संप्रेषण होता है। दूसरी, प्रेम के लिए उसके भीतर अद्भुत धैर्य और प्रतीक्षा होती है।

डा. जायसवाल ने कहा कि जितनी प्रतीक्षा स्त्री कर सकती है, उतनी प्रतीक्षा पुरूष के लिए संभव नहीं होती। स्त्री प्रेम को जीती है और जिस रिश्ते को छूती है, उसे प्रेम से भर देती है।

स्त्री का आस्तित्व एक उत्सव

उन्होंने कहा कि स्त्री होना सौभाग्य है या दुर्भाग्य यह सामाजिक व्यवस्थाओं का विषय हो सकता है लेकिन स्त्री का आसित्व अपने आप में एक उत्सव है। वह पारस की तरह होती है, जो जिस संबंध को स्पर्श करती है उसे प्रेम और संवेदना से भर देती है।

यह भी पढ़ेंः प्रेम और मातृत्व में क्या फर्क है? व्यक्तित्व सत्र में डा. जायसवाल की गहरी व्याख्या

तपस्विनी बनने की शक्ति स्त्री में अधिक

डा. जायसवाल ने कहा कि स्त्री में वह शक्ति है जो उसे तपस्विनी और साध्वी दोनों बना सकती है। उन्होंने कहा कि स्त्री जीवन के साथ भी प्रेम करना जानती है और जीवन के बाद भी उस प्रेम को निभा सकती है। यही स्त्री की आध्यात्मिक शक्ति है।

उन्होंने कहा कि जब तक संसार में भौतिकता और आध्यात्मिकता का संतुलन नहीं हो जाता, तब तक दुनिया युद्ध और संघर्ष की आग में झुलसती रहेगी। आध्यात्मिक जीवन दृष्टि के साथ ही बुद्धि, शक्ति और सामर्थ्य का विकास संभव है।

ईश्वर कर्मों का साक्षी है

अपने संबोधन के अंत में डॉ. जायसवाल ने कहा कि ईश्वर मनुष्य के सभी कर्मों का साक्षी है।
भगवान किसी के जीवन में सीधे हस्तक्षेप नहीं करते, बल्कि मनुष्य को स्वयं अपने भीतर सद्बुद्धि और विवेक विकसित करना होता है।

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01-10-2026