प्रेम और मातृत्व में क्या फर्क है? व्यक्तित्व सत्र में डा. जायसवाल की गहरी व्याख्या

डॉ अरुणकुमार जायसवाल व्यक्तित्व परिष्कार सत्र में मातृत्व के महत्व पर संबोधन देते हुए

बिहार के सहरसा गायत्री पीठ में आयोजित व्यक्तित्व परिष्कार सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. अरुणकुमार जायसवाल ने मातृत्व, प्रेम और स्त्री के व्यक्तित्व की गहराई पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि प्रेम और मातृत्व दो अलग भावनाएँ हैं। प्रेम किसी के भी मन में हो सकता है, लेकिन मातृत्व एक विरल और दैवी भाव है।

उन्होंने बताया कि माँ बनना केवल एक जैविक घटना है, जबकि मातृत्व का भाव एक आध्यात्मिक और दैवी अनुभव है। जब स्त्री के मन में मातृभाव जागृत होता है, तब वह केवल पत्नी नहीं रहती बल्कि परिवार के प्रति त्याग, देखभाल और संरक्षण का भाव लेकर चलती है।

प्रेम और मातृत्व का अंतर

डॉ. जायसवाल के अनुसार पत्नी का प्रेम जब पूर्ण होता है, तब उसमें मातृभाव भी आ जाता है। उन्होंने पश्चिमी दार्शनिक नीत्शे (Nietzsche) का उल्लेख करते हुए कहा कि स्त्री का प्रेम तब पूर्ण होता है जब वह अपने पति में भी संतान जैसा भाव देखने लगती है और उसकी देखभाल उसी प्रकार करती है।

उन्होंने कहा कि परिवार में स्वस्थ वातावरण बनाने के लिए पति-पत्नी दोनों को अपनी भूमिका समझनी चाहिए। पत्नी को केवल पत्नी ही नहीं बल्कि मित्र और माता जैसा भाव भी रखना चाहिए, वहीं पति को भी केवल पति नहीं बल्कि पिता और गुरु की भूमिका निभानी चाहिए।

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परिवार में प्रेम और ईमानदारी का महत्व

डॉ. जायसवाल ने कहा कि परिवार और समाज में सुव्यवस्था केवल नियमों से नहीं आती, बल्कि प्रेम और ईमानदारी से आती है। प्रेम और ईमानदारी ऐसी भावनाएँ हैं जिनके लिए किसी नियम की आवश्यकता नहीं होती, वे स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय में परिवारों में वह खुलापन कम होता जा रहा है, जिसमें लोग बिना झिझक और डर के अपनी बात कह सकें। इस संस्कृति को पुनः विकसित करने की आवश्यकता है।

स्त्री का रहस्मय व्यक्तित्व

उन्होंने संस्कृत के प्रसिद्ध सुभाषित “त्रियाचरित्रं पुरुषस्य भाग्यम् देवो न जानाति कुतो मनुष्यः” का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका अर्थ स्त्री की निंदा नहीं बल्कि उसके व्यक्तित्व की रहस्यमयता को दर्शाता है।

डॉ. जायसवाल के अनुसार स्त्री के व्यक्तित्व में तीनों गुण—सत्त्व, रज और तम—मौजूद होते हैं। यही कारण है कि स्त्री का व्यवहार और व्यक्तित्व कई बार रहस्यमय प्रतीत होता है। इसी प्रकार पुरुष का भाग्य भी उतना ही रहस्यमय होता है, जिसे पूरी तरह समझ पाना कठिन है।

रामायण का उदाहरण

अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने रामायण का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि पंचवटी प्रसंग में जब राम सोने के हिरण के पीछे गए और मारीच ने “हे राम” पुकारा, तब सीता ने लक्ष्मण को राम की सहायता के लिए भेजने के लिए कठोर शब्द कहे।

तुलसीदास के वर्णन के अनुसार यह प्रसंग “छाया सीता” से जुड़ा हुआ माना जाता है, क्योंकि वास्तविक सीता पहले ही अग्नि में सुरक्षित रखी गई थीं। इस प्रकार राम की लीला और रावण के वध का उद्देश्य पूरा हुआ।

जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति

अपने संबोधन के अंत में डॉ. जायसवाल ने कहा कि मनुष्य को सच्ची संतुष्टि तब मिलती है जब वह अपने जीवन के उद्देश्य को समझकर उसके अनुरूप आगे बढ़ता है। जैसे स्त्री का व्यक्तित्व गहन और रहस्यमय होता है, उसी तरह मनुष्य का भाग्य भी पूरी तरह समझ पाना संभव नहीं होता।

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14-10-2026