यूपी की राजनीति में आए कई बदलाव जानिए यहां ? वीडियो से समझें

आलोक वर्मा

उत्तर प्रदेश में हरेक पार्टी अपनी जुगत में जुटी हुई है। हर जाती का समीकरण बिठाने से लेकर विभिन्न तरह से सम्मेलनों, यात्राओं का दौर जारी है। यूपी की राजनीति कि दिलचस्प गाथा देख सुन रहा वोटर अभी खामोश है। ऐसे में हम यहां आपको यूपी के राजनितिक इतिहास की गाथा बता रहे हैं जो काफी दिलचस्प है।

ऋग्वेद में यूपी 

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास के साक्ष्य ऋग्वेद युग से मिलने शुरू होते हैं। शुरुआत में आर्य सभ्यता का क्षेत्र सप्तसिंधु (अविभाजित भारत की सात नदियों का प्रदेश)नदी था। बाद में गंगा और सरस्वती के मैदानों में कुरु, कोसल, पांचाल और काशी राज्यों का उदय हुआ। ये क्षेत्र वैदिक सभ्यता के प्रमुख केंद्र बने।छठी सदी में गुप्त युग के पतन के बाद कन्नौज और थानेश्वर शक्ति के नए केंद्र बनकर उभरे। इसके राजा हर्षवर्धन (606-647 ईस्वी) के अधीन उत्तर भारत का एक बड़ा साम्राज्य था।

वर्चस्व की लड़ाई

हर्ष के समय में ही चीनी यात्री हवेन सांग भारत आया था। हर्ष की मृत्यु के बाद उत्तर भारत पर वर्चस्व की लड़ाई में अंतिम रूप से गुर्जर-प्रतिहार वंश विजयी रहा। नौवीं-दसवीं सदी में उनका वर्चस्व बना रहा। 1018-19 में महमूद गजनवी ने उनको पराजित कर दिया। इसके बाद इस क्षेत्र में गहरवार वंश का प्रभुत्व रहा। इस वंश के राजा जयचंद (1170-1193 ईस्वी) ने पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ महमूद गोरी का साथ दिया। लिहाजा 1192 ईस्वी में महमूद गोरी ने पृथ्वीराज को पराजित किया और 1193 ईस्वी में जयचंद को हरा कर उसकी हत्या कर दी। 1203 में चंदेल वंश के राजा वीर परमल को गोरी के सहयोगी कुतुबुद्दीन ऐबक ने हरा दिया।

आजादी के बाद यूपी की राजनीति

यह तो हुई इतिहास की पुरानी बात। यूपी ने पिछले 55 साल में राजनीति के कई उतार चढ़ाव देखे हैं। यूपी के राजनीतिक इतिहास में साल 1967 काफी अहम रहा। देश की स्वतंत्रता के बाद सन 1967 में प्रदेश में सतारूढ़ कांग्रेस पार्टी में विद्रोह हुआ। तत्कालीन किसान नेता चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर भारतीय क्रांति दल बनाई। उन्होंने प्रदेश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार का गठन किया। 3 अप्रैल 1967 को बनी इस सरकार ने 328 दिन राज किया।

साल 1975 में कांग्रेस ने पूरे देश में आपातकाल घोषित कर दिया। 1967 में चौधरी चरण सिंह के अलग होने के बाद दुबारा सता में आई कांग्रेस को आजादी के तीन दशक बाद साल 1977 में  यूपी में हार का सामना करना पड़ा। इस बार जनता पार्टी के राम नरेश यादव ने यूपी में सरकार बनाई।

1984 में इंदिरा गांधी की मौत से उपजी सहानुभूति की बदौलत कांग्रेस ने एक बार फिर 269 सीटों पर विजय हासिल कर सरकार बनाई। यह कांग्रेस की यूपी में आखिरी जीत थी।

बोफोर्स घोटाले की छीछालेदर के बाद 1989 में कांग्रेस पार्टी ने जनता दल के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार का नेतृत्व किया। जनता दल सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरा औऱ भाजपा के समर्थन से यूपी में सरकार का गठन हुआ। इसके बाद 5 दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

1990 में अयोध्या में विवादित ढांचा और कार्यकर्ताओं पर गोलीबारी के विरोध में भाजपा ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया। जिसके बाद मुलायम को कांग्रेस ने समर्थन दिया। 1991 में हुए चुनाव में भाजपा को जीत मिली और कल्याण सिंह की सरकार बनी।

विवादित ढांचा गिरने के बाद 1992 में कल्याण सरकार बर्खास्त कर दी गई। इसके बाद मुलायम कांशीराम का गठबंधन हुआ। 1993 में हुए चुनाव में पिछड़े, दलितों औऱ मुसलमानों के नाम पर नई सरकार बनी औऱ बसपा के सहयोग से 4 दिसंबर 1993 को मुलायम फिर से मुख्यमंत्री बने।

सनसनीखेज गेस्ट हाउस कांड (मायावती की जान लेने की कोशिश) के बाद सपा बसपा गठबंधन टूट गया। 3 जून 1995 को भाजपा के सहयोग से मायावती सूबे की पहली मुख्यमंत्री बनीं।

मार्च 1997 में बसपा-भाजपा ने नए राजनीतिक प्रयोग का सूत्रपात किया। एक ऐसा गठबंधन बना जिसमें दोनो पार्टियां बारी बारी से सीएम बनने पर राजी हुईं। छह महीने भाजपा का और छह महीने बसपा की सीएम बनाए जाने पर करार हुआ। रोटेशन की इस डील में मायावती छह माह मुख्यमंत्री बनने के बाद हट गईं इसके बाद कल्याण सिंह की सरकार बनी मगर मायावती ने दो माह में ही समर्थन वापस ले लिया।

21 फरवरी 1998 को जगदंबिका पाल मुख्यमंत्री बने। उनके पास मुलायम और मायावती दोनो का समर्थन था मगर हाई कोर्ट ने 48 घंटे में ही कल्याण सरकार को बहाल करने का आदेश दे दिया। 23 फरवरी को कल्याण और जगदंबिका दोनो सचिवालय में बैठकर मुख्यमंत्री होने का दावा कर रहे थे।

2003 में मायावती की तीसरी बार सरकार बनी मगर भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया जिसके बाज मुलायम सिंह यादव ने अल्पमत की सरकार बनाई।

2007 में 22 साल से चल रहा अनिश्चितता का दौर खत्म हुआ। मायावती का ब्राह्णण कार्ड सफल रहा औऱ 206 सीटों के साथ उन्होंने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।

2012 में यह दौर जारी रहा औऱ मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश ने बहुमत की सरकार बनाई। 2017 में भारतीय जनता पार्टी ने 325 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई।

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