मानव जीवन निरंतर गतिशील है और यही उसकी प्रकृति भी है। जीवन में प्रतिदिन अनेक प्रसंग आते हैं। कुछ हमें सीख देने के लिए आते हैं और कुछ दूसरों को सीख देने का अवसर प्रदान करते हैं। इन सभी परिस्थितियों के बीच एक तत्व ऐसा है जिसका प्रभाव सबसे गहरा होता है और वह है हमारी नियत।
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सनातन परंपरा में कहा गया है कि जिसकी जैसी नियत होती है, उसे वैसी ही बरकत प्राप्त होती है। मन में संतोष हो, धैर्य हो और ईश्वर के प्रति श्रद्धा हो तो जीवन का मार्ग अपेक्षाकृत सरल प्रतीत होने लगता है। हालांकि कई लोग यह मानते हैं कि केवल सब्र रखने से ही शांति मिल जाती है, लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। शांति का मूल आधार केवल धैर्य नहीं, बल्कि शुद्ध नियत भी है।
शुद्ध नियत और जीवन की शांति
मनुष्य अपने कर्मों का निर्माता है, लेकिन उसके कर्मों की दिशा उसकी नियत निर्धारित करती है। यदि मन में छल, स्वार्थ और अहंकार कम हों तथा सद्भाव, करुणा और सत्य का स्थान हो, तो परिस्थितियां कठिन होने पर भी भीतर की शांति बनी रहती है।
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कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि सही मार्ग पर चलने वालों को परिणाम मिलने में अधिक समय लग रहा है। तब मन में प्रश्न उठता है कि आखिर कब तक प्रतीक्षा की जाए। ऐसे समय में आध्यात्मिक संतों का संदेश मार्गदर्शन करता है। सद्गुरुजन कहते हैं कि यदि मनुष्य का विश्वास ईश्वर पर पूर्ण हो जाए तो प्रतीक्षा बोझ नहीं लगती। उसे यह भरोसा रहता है कि जो भी होगा, उचित समय पर होगा और उसके हित में होगा।
ईश्वर पर विश्वास क्यों आवश्यक है?
जब मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि से जीवन को देखता है तो उसे अनेक घटनाएं अन्यायपूर्ण या कठिन दिखाई देती हैं। लेकिन जब वही व्यक्ति ईश्वर की व्यवस्था पर विश्वास करना सीख जाता है, तब उसका दृष्टिकोण बदलने लगता है।
एक छोटे बच्चे का उदाहरण लें। माता अपने बच्चे को गोद में लेकर ऊपर उछालती है और फिर तुरंत पकड़ लेती है। बच्चा न तो भयभीत होता है और न ही संदेह करता है, क्योंकि उसे अपनी माता पर पूर्ण विश्वास होता है। वह जानता है कि चाहे जितना ऊपर जाए, अंततः मां की गोद में ही लौटेगा।
मनुष्य और परमात्मा का संबंध भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए। यदि भगवान पर भरोसा अटूट हो जाए तो जीवन की कठिनाइयां भी विश्वास को कमजोर नहीं कर पातीं।
बाज का बच्चा और आत्मविश्वास का पाठ
प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है। बाज अपने बच्चों को ऊंचाइयों तक लेकर जाता है और फिर उन्हें छोड़ देता है। प्रारंभ में यह स्थिति भयावह लग सकती है, लेकिन इसी प्रक्रिया से बच्चा उड़ना सीखता है। यदि बाज अपने बच्चों को कभी घोंसले से बाहर न निकाले तो वे आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंच ही नहीं सकते।
ठीक इसी प्रकार जीवन की परीक्षाएं भी हमें कमजोर करने नहीं, बल्कि हमारी क्षमता को प्रकट करने आती हैं। कई बार जिन परिस्थितियों को हम संकट समझते हैं, वही हमारे विकास का कारण बनती हैं।
भक्त प्रह्लाद से मिलती है अटूट आस्था की प्रेरणा
सनातन धर्म में भक्त प्रह्लाद का जीवन ईश्वर पर विश्वास का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट दिए गए, लेकिन उन्होंने भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा नहीं छोड़ी। जब सभी मार्ग बंद होते दिखाई दिए, तब भगवान नृसिंह रूप में प्रकट हुए और अपने भक्त की रक्षा की। यह प्रसंग बताता है कि शरणागत की रक्षा करना भगवान का स्वभाव है।
सच्ची शरणागति का अर्थ केवल प्रार्थना करना नहीं है। इसका अर्थ है परिस्थितियां विपरीत होने पर भी विश्वास बनाए रखना।
शरणागति का भाव ही सच्चा बल है
जब मनुष्य अपने अहंकार को छोड़कर ईश्वर की शरण में जाता है, तब उसके भीतर एक अद्भुत शक्ति का जन्म होता है। उसे यह अनुभव होने लगता है कि वह अकेला नहीं है। यही भावना संकट के समय साहस देती है और सफलता के समय विनम्रता बनाए रखती है।
जीवन में सब कुछ तुरंत प्राप्त नहीं होता, लेकिन जो व्यक्ति ईश्वर पर विश्वास रखकर आगे बढ़ता है, उसके लिए प्रतीक्षा भी साधना बन जाती है।
निष्कर्ष
जीवन में आने वाली प्रत्येक परिस्थिति हमें कुछ न कुछ सिखाने आती है। यदि हमारी नियत शुद्ध हो, मन में संतोष हो और ईश्वर पर विश्वास अटूट हो, तो देर भले लगे लेकिन सही मार्ग अवश्य प्राप्त होता है।
जैसे बच्चा अपनी माता पर भरोसा करता है, जैसे बाज का बच्चा उड़ना सीखता है और जैसे भक्त प्रह्लाद ने विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान का साथ नहीं छोड़ा, वैसे ही हमें भी शरणागति और विश्वास का भाव बनाए रखना चाहिए। जब समर्पण पूर्ण होता है, तब शंका समाप्त होने लगती है और भगवान श्री नारायण की कृपा का अनुभव स्वयं होने लगता है।
