डिजिटल अरेस्ट स्कैम चलाने वालों के लिए यह बुरी जानकारी है ! सुप्रीम कोर्ट ने इस स्कैम पर बहुत सख्त रवैया अपनाया है। ऐसे मामलों के आरोपियों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। अदालत ने कहा है कि इस तरह के अपराध केवल आर्थिक धोखाधड़ी नहीं हैं, बल्कि लोगों की जीवनभर की कमाई पर हमला हैं। विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाने वाले ऐसे अपराधों को अदालत ने अत्यंत गंभीर माना है।
27 जुलाई 2026 को सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने स्पष्ट किया कि डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में जमानत सामान्य नियम नहीं हो सकती। अदालत ने संकेत दिया कि केवल असाधारण परिस्थितियों में ही राहत पर विचार किया जाना चाहिए।
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Digital Arrest क्या है?
डिजिटल अरेस्ट एक ऐसा साइबर फ्रॉड है जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल या फोन पर लोगों को डराते हैं। उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनका बैंक खाता, मोबाइल नंबर या आधार किसी गंभीर अपराध में इस्तेमाल हुआ है।
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इसके बाद पीड़ित को घंटों तक ऑनलाइन निगरानी में रखकर उसकी जमा पूंजी अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करा ली जाती है। पिछले कुछ वर्षों में देशभर में हजारों लोग इस तरह की धोखाधड़ी का शिकार हो चुके हैं।
किस मामले में हुई सुनवाई?
सुप्रीम कोर्ट के सामने एक आरोपी की जमानत याचिका आई थी। आरोपी का कहना था कि उसने केवल बैंक खाता खुलवाने में मदद की थी और वह एक वर्ष से अधिक समय से जेल में है।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने इस दलील को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि यदि कोई व्यक्ति धोखाधड़ी के नेटवर्क को संचालित करने या उसे आसान बनाने में भूमिका निभाता है, तो उसकी जिम्मेदारी भी गंभीर मानी जाएगी।
अदालत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल अरेस्ट घोटालों को समाज के लिए बेहद गंभीर खतरा बताया। अदालत ने कहा कि ऐसे अपराध बुजुर्गों और आम नागरिकों की जीवनभर की कमाई छीन लेते हैं। इसलिए इन मामलों को साधारण आर्थिक अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता।
पीठ ने यह भी संकेत दिया कि केवल लंबी हिरासत या सीमित भूमिका का दावा अपने आप जमानत का आधार नहीं बन सकता। यदि किसी मामले में असाधारण परिस्थितियां हों, जैसे गंभीर स्वास्थ्य स्थिति या न्याय के स्पष्ट उल्लंघन की स्थिति, तभी अदालत राहत पर विचार कर सकती है।
सह-अपराधियों को भी राहत आसान नहीं
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि केवल बैंक खाते उपलब्ध कराना, खाते खुलवाना या धन के प्रवाह में सहयोग करना भी गंभीर भूमिका मानी जा सकती है। इससे उन लोगों के लिए भी स्पष्ट संदेश गया है जो स्वयं ठगी नहीं करते लेकिन पूरे नेटवर्क को चलाने में मदद करते हैं।
जांच एजेंसियों पर क्या असर पड़ेगा?
अदालत की टिप्पणियों से यह संकेत मिलता है कि डिजिटल अरेस्ट जैसे संगठित साइबर अपराधों की जांच में पुलिस और अन्य एजेंसियां अधिक कठोर दृष्टिकोण अपना सकती हैं। न्यायालय ने अपने पूर्व निर्देशों का भी उल्लेख किया, जिनमें देशभर में ऐसे संगठित साइबर फ्रॉड के खिलाफ समन्वित कार्रवाई पर जोर दिया गया था।
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस न्यायिक रुख का उद्देश्य केवल आरोपियों पर सख्ती करना नहीं है, बल्कि संभावित पीड़ितों को सुरक्षा का संदेश देना भी है। यदि अदालतें लगातार ऐसे मामलों में कड़ा दृष्टिकोण अपनाती हैं, तो संगठित साइबर गिरोहों के लिए जोखिम बढ़ेगा और जांच एजेंसियों को भी कानूनी प्रक्रिया में मजबूती मिलेगी।
हालांकि प्रत्येक जमानत याचिका का फैसला उसके तथ्यों और लागू कानून के आधार पर ही किया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियां निचली अदालतों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन अवश्य हैं, लेकिन हर मामले का अंतिम निर्णय उसके साक्ष्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
ध्यान देने योग्य कानूनी तथ्य
यह समझना आवश्यक है कि किसी अपराध का जमानती या गैर-जमानती होना सामान्यतः संबंधित कानून की धाराओं से तय होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस सुनवाई में जमानत पर सख्त न्यायिक दृष्टिकोण अपनाने का संकेत दिया है। इसलिए इसे व्यापक कानूनी नीति के रूप में समझना चाहिए, न कि प्रत्येक मामले में स्वतः जमानत असंभव होने के रूप में।
Digital Arrest से कैसे बचें?
यदि कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर डराए, बैंक खाते फ्रीज होने की धमकी दे या तुरंत पैसे ट्रांसफर करने के लिए कहे, तो उस पर भरोसा न करें। ऐसी स्थिति में कॉल काटें, आधिकारिक हेल्पलाइन से संपर्क करें और राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 या साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।










