“हाथ में कर्म, हृदय में राम” – माघ पूर्णिमा पर सहरसा में संत रविदास का जीवन-संदेश

माघ पूर्णिमा के अवसर पर गायत्री शक्तिपीठ सहरसा में आयोजित व्यक्तित्व परिष्कार सत्र में संत रविदास के “कर्म में भक्ति” के दर्शन को डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने जीवनोपयोगी उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया।
“कर्म में उतरी भक्ति ही संत रविदास का संदेश है”

माघ पूर्णिमा पर संत रविदास संदेश को सैकड़ो श्रद्धालुओं को खास तरीके से पहुंचाया गया। गायत्री शक्तिपीठ सहरसा में व्यक्तित्व परिष्कार में माघ पूर्णिमा संत रविदास संदेश की विस्तार से व्याख्या की गई। व्यक्तित्व परिष्कार सत्र को संबोधित करते हुए डाक्टर अरुण कुमार जायसवाल ने माघ पूर्णिमा के संबंध में कहा- हृदय से हृदय तक बहने वाली जो धारा मनुष्य को मनुष्य से, आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है, वही भक्ति है।

माघ पूर्णिमा संत रविदास संदेश का मतलब

डा. अरुण जायसवाल ने कहा कि भक्ति न तो शब्दों की चतुराई से मिलती है, न बाह्य आडम्बरों से, यह तो विनम्रता, श्रम और आत्मशुद्धि की गोद में पलती है। इसी भक्ति के अनन्य साधक संत शिरोमणि रविदास जी की इस माह पावन जयंती है।

वे कहते हैं “काह रैदास तेरी भगति दूरी है, भाग बड़े से पावे। तजि अभिमान मेटि आया पर, पिपिलक स्वै चुनिखावे ।। अर्थात ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है, पर यह भाग्य अहंकार के बोझ तले नहीं उपजता। अभिमान त्यागकर जो स्वयं को लघु कर लेता है, वही प्रभु के निकट पहुँचता है; ठीक उसी तरह से जैसे विशाल हाथी शक्कर के कण नहीं चुन पाता, पर नन्हीं सी चींटी (पिपीलिका) सहज ही उन्हें उठा लेती है।

रविदास की भक्ति जीवन से विमुख नहीं, बल्कि जीवन में रची-बसी है। वे कर्म से भागने के नहीं, कर्म में उतरने के संत हैं। उनकी दृष्टि में पूजा का अर्थ है हाथों से श्रम, जिह्वा से नाम और हृदय से प्रेम। ‘जिह्वा सौ ओंकार जप, हत्थन सों करि कार’ यह केवल पद नहीं, जीवन-विधान है।

वे कहते हैं कि गंगा में डुबकी लगाने से पहले यदि मन की मैल न उतरी, तो स्नान अधूरा है। बाहरी शुद्धि से पहले भीतरी परिष्कार अनिवार्य है । वे परिकल्पना करते हैं ऐसे नगर की जहाँ न दुख हो, न भय; न कोई ऊँचा, न कोई नीचा।

डा. जायसवाल ने कहा कि छः शताब्दी पूर्व बनारस के सीर गोवर्धन में जन्मे इस संत की वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। कबीर ने उन्हें ‘संतन में रविदास कहा, मीरा ने गुरु माना और गुरुग्रंथ साहब ने उनके पदों को अमरत्व दिया।
अपमान और भेदभाव के बीच भी उनके हृदय से करुणा की ज्योति बुझी नहीं। संत रविदास का वैराग्य और अनुराग कुछ नहीं है बस वे हैं प्रेम के पुजारी, कहते है प्रभुजी तुम चंदन हम पानी। रवि दास का कहना है कि कहीं आने जाने की जरूरत नहीं है, हाथ में काम हो और हृदय में राम हो। मन चंगा तो कटौती में गंगा।बस उतना ही पर्याप्त है।

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हम हाथ से काम – धाम करते रहें और मुख से भगवान का नाम लेते रहें। यानी मन में राम हो तो मन निरंतर निर्मल होता जाएगा। बस मैं को हटाते जायें। संत रविदास का मूल
स्वर है मन का निर्मल होना।
व्यक्तित्व परिष्कार सत्र के बाद गायत्री परिवार खेल महोत्सव का शुभारंभ दीप प्रज्वलित कर किया गया। इस अवसर पर डाक्टर अरुण कुमार जायसवाल,पटना
से आए अतिथिगण रमेश कुमार, माधुरी कुमारी, रुबी जोशी, रविराज कुमार, ललन कुमार सिंह, नवलसिंह एवं गायत्री परिवार के सभी परिजन उपस्थित थे।
इस अवसर पर भूतपूर्व डाक्टर अरुण कुमार सिंह ने कहा-पढाई के साथ साथ खेल में भागीदारी हमें शारीरिक एवं मानसिक रूप से मजबूत करेगा। इस खेल प्रतियोगिता में कंप्यूटर शिक्षण संस्थान के छात्र-छात्राएं प्रज्ञा शिक्षण संस्थान के छात्र-छात्राएं, गायत्री परिवार के युवा मंडल युवती मंडल, प्रज्ञा मंडल ने भाग लिया ।

सत्र को संबोधित करते हुए ट्रस्टी डॉक्टर अरुण कुमार जायसवाल ने कहा इस प्रकार के आयोजन से छात्र-छात्राओं का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास होगा। ये सभी अच्छे स्वास्थ्य का लाभ ले सकेंगे, बीमारी से दूर रहेंगे । सभी की भागीदारी बहुत ही सराहनीय रही । सभी गायत्री परिजनों ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए बहुत ही अच्छे ढंग से प्रयास किया।

प्रज्ञा युवा के संयोजक हरीश कुमार ने सत्र का संचालन बहुत अच्छे ढंग से किया । सभी बाल संस्कारशालाओं की भागीदारी इसमें रही। यह कार्यक्रम बहुत सफल रहा । प्रतियोगिता में भाग लेने वाले तथा सफल रहने वाले प्रतियोगी को मेडल से सम्मानित किया गया । सबसे अधिक रेलवे कॉलोनी बाल संस्कार के बच्चों ने 15 मैडल प्राप्त किया ।

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11-09-2026