ईश्वर पर विश्वास ही सबसे बड़ी शक्ति है, जानिए गुरु वचनों का संदेश

मनुष्य का विश्वास कई रिश्तों में बंटा होता है, लेकिन सबसे बड़ा सहारा ईश्वर पर विश्वास और आत्मविश्वास है। आचार्य शुभेश शर्मन का यह धर्म चिंतन जीवन, गुरु कृपा और सत्कर्म के महत्व को सरल शब्दों में समझाता है।
ईश्वर पर विश्वास, आत्मविश्वास और गुरु कृपा पर आधारित धर्म चिंतन की फीचर इमेज, जिसमें नदी किनारे ध्यानमग्न व्यक्ति और मंदिर का दृश्य दिखाया गया है

जीवन निरंतर गतिशील है। कभी इसकी गति धीमी होती है तो कभी तेज। किंतु गति चाहे जितनी भी हो, उसमें मर्यादा और संतुलन आवश्यक हैं। इसी प्रकार जीवन में विश्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना स्वयं जीवन। मनुष्य के जीवन में अनेक संबंध होते हैं। माता-पिता, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री जैसे संबंध ऐसे होते हैं जिन पर विश्वास करने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं होती।

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यदि कभी कोई कारण सामने भी आ जाए तो मन उसे सहज स्वीकार नहीं करता। परिवार में ताऊ, चाचा, मामा और अन्य कुटुंबी भी विश्वास के सूत्र में बंधे होते हैं।

कभी-कभी पड़ोस में भी ऐसे रिश्ते बन जाते हैं जिनमें अपनापन और भरोसा होता है। मित्र, सहकर्मी और साथ काम करने वाले लोगों के साथ भी विश्वास का संबंध बनता है। हालांकि इन संबंधों में विश्वास की मात्रा अलग-अलग हो सकती है। ससुराल पक्ष के रिश्ते भी इसी भाव से जुड़े होते हैं। लेकिन हर विश्वास की एक सीमा होती है। कुछ विश्वास समय के साथ बदल जाते हैं और कुछ इतने मजबूत होते हैं कि कभी टूटते नहीं।

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जीवन यात्रा के दौरान कई ऐसे लोग भी मिलते हैं जो वर्षों तक साथ निभाते हैं। उनके साथ भी विश्वास का बंधन बनता है। यह आवश्यक नहीं कि हर बार कोई व्यक्ति ही विश्वास तोड़े। कई बार परिस्थितियां भी विश्वास को कमजोर कर देती हैं या कुछ समय के लिए प्रभावित कर देती हैं।

अक्सर कहा जाता है कि विश्वास टूटने के लिए होता है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। विश्वास निभाने के लिए भी होता है।सद्गुरुदेव कहते हैं कि विश्वास अवश्य करना चाहिए और उसे निभाना भी चाहिए। प्रश्न यह है कि सबसे अधिक विश्वास किस पर किया जाए?

इसका उत्तर है, परमात्मा पर।

ईश्वर पर पूर्ण विश्वास और आत्मविश्वास ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति हैं। यही शक्ति जीवन में शुभता, सहजता और सामर्थ्य प्रदान करती है।

मेरा आत्मविश्वास मेरे पूज्य पिताश्री स्वामी श्री कल्याण चंद्र त्रिखंडीय जी महाराज में रहा। उनसे मैंने सीखा कि विषम परिस्थितियों में भी भगवान की कृपा और अपने कर्म पर भरोसा बनाए रखना चाहिए।

मेरा विश्वास पूज्य सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी श्री शारदानंद सरस्वती जी महाराज में सदैव रहा है। उन्होंने सिखाया कि मनुष्य को हर परिस्थिति में ईश्वर की शरणागति स्वीकार करनी चाहिए। हम भगवान के हैं और भगवान हमारे हैं। यही सबसे बड़ी शक्ति है।

मनुष्य आपको कठिनाइयों में डाल सकता है, लेकिन महादेव कभी अपने भक्त का अहित नहीं करते। इष्टदेव, गुरुदेव और माता जगदंबा की कृपा ही जीवन का वास्तविक आधार है। यही साधना है, यही साधन है और यही समाधान भी है।

कहा गया है,

“उसने नदी में बहाया, वही तिनका भी देगा।”

मेरा विश्वास सबमें है, सदैव शुभ संकल्पों के साथ। परिस्थितियां कैसी भी हों, मनुष्य को प्रसन्न रहना चाहिए। स्वास्थ्य कभी-कभी कमजोर हो सकता है, लेकिन मन और आत्मबल को मजबूत बनाए रखना आवश्यक है।

आज भी प्रयास जारी है कि विषम परिस्थितियों को सम में बदला जाए।

जो भी हों, मेरा आत्मदृढ़ विश्वास सबसे भारी है।

धर्म, दान और सत्कर्म पर अविश्वास क्यों?

मानव जीवन में दृष्टिकोण का विशेष महत्व है। जब हम पूजा-पाठ, दान, धर्म और सत्कर्म करते हैं तो कहीं न कहीं उसके बदले कुछ पाने की अपेक्षा भी रखते हैं। जब मनचाहा परिणाम नहीं मिलता तो कई लोग अपने ही धर्म और सत्कर्म पर प्रश्नचिह्न लगाने लगते हैं।

यही वह समय होता है जब व्यक्ति को स्वयं को संभालना चाहिए।

कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति किसी अस्पताल में जाकर केवल यह जानने का प्रयास करे कि वहां कितने मरीज उपचार के दौरान मृत्यु को प्राप्त हुए। यदि वह केवल इसी आधार पर निष्कर्ष निकाल ले कि चिकित्सा का कोई लाभ नहीं होता, तो यह अधूरा दृष्टिकोण होगा। क्योंकि उसने यह नहीं देखा कि उसी अस्पताल में कितने लोग स्वस्थ होकर अपने घर लौटे।

ठीक यही बात धर्म और सत्कर्म पर भी लागू होती है।

धर्म के मार्ग पर चलने का फल कभी-कभी देर से मिलता है, लेकिन उसका सुफल अवश्य प्राप्त होता है। इसलिए धैर्य, श्रद्धा और विश्वास बनाए रखना आवश्यक है।

दुआओं से तकदीर भी संभल जाती है,
अगर कबूल हो तो मंजिल भी मिल जाती है।

जय श्रीराम।

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आचार्य शुभेश शर्मन
डॉ. आचार्य शुभेश शर्मन एक प्रख्यात सनातनी विद्वान हैं, जो अपनी प्राच्य विद्याओं और ज्योतिषीय ज्ञान के लिए जाने जाते हैं। वे सनातन समाज में सक्रिय रूप से धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूकता फैलाते हैं, जिसमें पौधारोपण (हरिशंकरी) जैसे सामाजिक कार्य भी शामिल हैं। वे ज्योतिष महाकुंभ जैसे आयोजनों से भी जुड़े रहे हैं।

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19-09-2026