गलती से भी किसी दूसरे व्यक्ति को अपना बैंक खाता इस्तेमाल करने देना आपको भारी मुसीबत में डाल सकता है। यहां तक कि कई दिनों तक जेल में भी रहना पड़ सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने ₹2.65 करोड़ की डिजिटल अरेस्ट ठगी के मामले में वित्तीय लेनदेन संभालने वालों की भूमिका को गंभीर माना है।
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साइबर अपराध की दुनिया में ऐसे बैंक खातों का इस्तेमाल तेजी से चर्चा में है, जिनके जरिए ठगी की रकम को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया जाता है। इन्हें म्यूल अकाउंट (Mule Account) कहा जाता है। ऐसे खातों का इस्तेमाल डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन निवेश धोखाधड़ी और फर्जी ट्रेडिंग जैसे अपराधों में किया जा सकता है।
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दिल्ली हाईकोर्ट ने ₹2.65 करोड़ की डिजिटल अरेस्ट ठगी से जुड़े एक मामले में अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए इस बात पर जोर दिया कि ठगी की रकम को संभालने वाले लोगों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी पीड़ितों को धमकाने वाले कॉलर्स की।
क्या होता है म्यूल अकाउंट और इसका इस्तेमाल कैसे होता है?
म्यूल अकाउंट ऐसा बैंक खाता होता है, जिसका इस्तेमाल साइबर ठगी से हासिल रकम को प्राप्त करने, आगे भेजने या उसकी असली कड़ी छिपाने के लिए किया जाता है। कई मामलों में खाताधारक खुद ठगी में शामिल होते हैं, जबकि कुछ लोग कमीशन या अन्य लालच में अपना खाता दूसरों को इस्तेमाल करने देते हैं।
साइबर ठग ऐसे खातों के जरिए रकम को कई स्तरों पर ट्रांसफर करते हैं। इससे जांच एजेंसियों के लिए ठगी की रकम के असली स्रोत और उसके अंतिम लाभार्थियों तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है।
यही वजह है कि बैंक खाता किराए पर देना या किसी दूसरे व्यक्ति को अपने खाते से लेनदेन करने की अनुमति देना गंभीर कानूनी जोखिम पैदा कर सकता है।
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₹2.65 करोड़ की डिजिटल अरेस्ट ठगी में सामने आई मनी ट्रेल
दिल्ली हाईकोर्ट के सामने आए मामले में एक वरिष्ठ नागरिक को ठगों ने स्काइप और फोन कॉल के जरिए संपर्क किया। आरोपियों ने खुद को भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई), मुंबई पुलिस और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का अधिकारी बताया।
पीड़ित को बताया गया कि उनका आधार आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। गिरफ्तारी और परिवार पर कार्रवाई की धमकी देकर उन पर मानसिक दबाव बनाया गया। इसके बाद उनसे बड़ी रकम अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कराई गई।
जांच में सामने आए वित्तीय लेनदेन के अनुसार:
- ₹1.50 करोड़: आसिफ एंटरप्राइजेज नाम की इकाई में ट्रेस हुए।
- ₹1.15 करोड़: वेवलैंड कॉमेस्टिबल प्राइवेट लिमिटेड में ट्रेस हुए।
- ₹5.31 लाख: अग्रिम जमानत मांगने वाले एक व्यक्ति से जुड़े पाए गए। उसने दावा किया कि यह रकम मोबाइल फोन खरीदने के लिए मिली थी।
मामले में अदालत ने रकम के लेनदेन से जुड़े लोगों की भूमिका को जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण माना। आंशिक रकम लौटाने के बावजूद अग्रिम जमानत की मांग स्वीकार नहीं की गई।
म्यूल अकाउंट धारकों पर भी क्यों हो सकती है कार्रवाई?
साइबर ठगी में पीड़ित से फोन पर बात करने वाला व्यक्ति अक्सर किसी बड़े नेटवर्क की एक कड़ी होता है। उसके पीछे ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो बैंक खातों की व्यवस्था करते हैं, रकम को अलग-अलग खातों में भेजते हैं और ठगी से हासिल धन को छिपाने में मदद करते हैं।
अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर अपना बैंक खाता साइबर ठगी की रकम प्राप्त करने या आगे भेजने के लिए उपलब्ध कराता है, तो उसकी भूमिका जांच के दायरे में आ सकती है। अपराध में उसकी जानकारी, मंशा और वास्तविक भूमिका के आधार पर कानूनी जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
इसलिए यह मान लेना गलत है कि किसी ठगी में सीधे फोन नहीं करने या पीड़ित को धमकी नहीं देने से कोई व्यक्ति कानूनी कार्रवाई से बच सकता है।
बैंक खाता सुरक्षित रखने के लिए क्या करें?
- अपना बैंक खाता किसी अनजान व्यक्ति या संस्था को इस्तेमाल करने के लिए न दें।
- कमीशन या नौकरी के लालच में अपने खाते में दूसरों की रकम मंगवाकर आगे ट्रांसफर न करें।
- बैंक खाते का पासवर्ड, ओटीपी, एटीएम कार्ड और इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी किसी के साथ साझा न करें।
- यदि आपके खाते में किसी अनजान व्यक्ति की रकम आ जाती है, तो उसे खुद कहीं और भेजने के बजाय तुरंत बैंक को सूचित करें।
- यदि आप डिजिटल अरेस्ट या किसी अन्य ऑनलाइन वित्तीय ठगी के शिकार हुए हैं, तो तत्काल 1930 साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर भी जानकारी दें।
साइबर ठगी से बचने के लिए सिर्फ संदिग्ध फोन कॉल पहचानना काफी नहीं है। अपने बैंक खाते को दूसरों के वित्तीय लेनदेन का माध्यम बनने से रोकना भी उतना ही जरूरी है।










