सफर में आपको भी मिलते हैं क्या ये बेमंजिल मासूम रेलयात्री

आलोक वर्मा

क दूसरे शहर और कस्बे को जोड़ती भारतीय रेल। हरेक को मंजिल पर पहुंचाती भारतीय रेल में सफर करने वाले लाखों यात्रियों में आजकल हजारों की संख्या उन चेहरोॆं की रहने लगी है जो शहरी चकाचौंध से वशीभूत या किसी के बहकावे में आकर अपना कस्बा छोड़कर एक ऐसे रेलवे सफर पर निकल जाते हैं जिसकी कोई मंजिल नहीं। इसमें सबसे ज्यादा संख्या बच्चों की है ऐसे बच्चों की जिनके दिल से लेकर आंखों तक में समाजिक विषमताएं, मां बाप के नियंत्रण से आजाद होने की बेताबी और एक ऐसे अनदेखे संसार को देखने की बेचैनी होती है जिसके कहानी और किस्से उन्होंने घर परिवार या पास पड़ोस में सुनी होती है। अपनी किशोरावस्था के इन नादानी भरे सपनों को पूरा करने के लिए वो रेल को हमसफर बनाते हैं।

एशिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क उनके इस बेमंजिल सफर का माध्यम बनता है। आंकड़ों की मानें तो ऐसे बच्चों में सबसे ज्यादा संख्या 12-18 साल की आयु के बच्चों की है। एकल सरकारी स्वामित्व वाले विश्व के दूसरे सबसे बड़े रेल नेटवर्क का गांव कस्बों तक पहुंच ऐसे बच्चों और कई बार बड़ों को भी अपने जड़ से इतना दूर ले जाते हैं कि उनकी वापसी नामुमकिन सी होती है। इस तरह की बिना मंजिल वाले सफर की मंजिल महानगरों की चकाचौंध होती है ये बात दीगर है कि महानगर में पहुंचकर इनका सामना ऐसी सच्चाईयों से होता है जिनकी कल्पना भी नहीं की होती मानसिक से लेकर शारीरिक शोषण तब इनकी मजबूरी बन जाती है। रेलवे सुरक्षा बल के महानिदेशक धर्मेन्द्र कुमार के मुताबिक हाल के वर्षों में इस दिशा में कई प्रभावी कार्य हुए हैं ताकि बच्चों का अवांछनीय पलायन रोका जा सके। रेलवे सुरक्षा बल भी इस दिशा में अहम भूमिका अदा कर रहा है। 

रेलवे सुरक्षा बल यानि आरपीएफ ने इसी साल अक्टूबर महीने तक 9113 बच्चों को उनके परिवार या सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया है। इसमें 2299 बच्चियां और 6814 बच्चे शामिल हैं। खास बात ये कि ऐसे सबसे ज्यादा बच्चे मुंबई दिल्ली या पटना में बचाए गए। इस तरह की एक घटना में 21 मई को रतलाम आरपीएफ ने एक सूचना के आधार पर दाहौद से इंदौर जा रही ट्रेन नंबर 69181 को रोककर 60 बच्चों को आजाद कराया। इस सिलसिले में 8 लोगों की गिरफ्तारी हुई। जीआरपी की जांच में पता लगा कि ये बच्चे धर्म परिवर्तन के लिए ले जाए जा रहे हैं। सात नवंबर को ही उज्जैन रेलवे स्टेशन पर चार बच्चे बरामद हुए उन्हें चाइल्ड हेल्प लाइन को सौंपना पड़ा।

रेल में बिना मंजिल के सफर करते इन बच्चों में से हजारों को आरपीएफ बेशक सकुशल बचा लेती है इनमें से कईयों को अपना परिवार भी वापस मिल जाता होगा लेकिन सच ये हैं कि ऐसे बच्चों की संख्या भी कम नहीं जो लाखोॆं किलोमीटर लंबी रेल लाइन पर धड़ाधड़ चलने वाली ट्रेन पर चढ़ते हैं और दूर बस दूर होते जाते हैं उन सब चीजों से जो उनके परिवार, गांव और कस्बे में मिल सकता था। ऐसे बच्चों का भविष्य भी इस बेमंजिल सफर की तरह ही हो जाता है। इनमें रोकथाम की कोशिश आरपीएफ जैसी एजेंसियां तो कर रही हैं लेकिन जरूरत है कि हम और आप जैसे रेल यात्री भी सफर के दौरान ऐसे बेमंजिल की सफर करने वाले रेलयात्रियों पर ध्यान दें शायद इस विकराल होती समस्या पर कुछ काबू पाया जा सके।

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11-09-2026