सुख-दुख का रहस्य क्या है? संचित कर्म, प्रारब्ध और मां गंगा की महिमा को समझिए

जीवन में मिलने वाले सुख-दुख और लाभ-हानि के पीछे संचित कर्म, क्रियमाण कर्म और प्रारब्ध की क्या भूमिका है? आचार्य शुभेश शर्मन के इस आध्यात्मिक संदेश में जानिए कर्म सिद्धांत और मां गंगा की महिमा।
संचित कर्म प्रारब्ध और मां गंगा की महिमा पर आध्यात्मिक संदेश

मानव जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि और यश-अपयश का क्रम चलता रहता है। जब जीवन में कोई अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आती है तो अधिकांश लोग उसका कारण बाहर खोजते हैं, जबकि सनातन दर्शन मनुष्य को अपने कर्मों की ओर देखने की प्रेरणा देता है। प्रश्न यह नहीं है कि हानि क्यों हुई या लाभ क्यों मिला, बल्कि यह है कि उसके पीछे कौन से कर्म कार्य कर रहे हैं और भविष्य में हानि से बचने के लिए क्या किया जाना चाहिए।

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शास्त्रों के अनुसार जीवन में घटित होने वाली प्रत्येक घटना के पीछे मुख्य रूप से तीन प्रकार के कर्म माने गए हैं। इन्हें संचित कर्म, क्रियमाण कर्म और प्रारब्ध कहा जाता है।

संचित कर्म, क्रियमाण कर्म और प्रारब्ध क्या हैं?

आचार्य शुभेश शर्मन बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति के पास बैंक या तिजोरी में धन सुरक्षित रखा है तो वह संचित धन के समान है। इसी प्रकार अनेक जन्मों और वर्तमान जीवन के शुभ-अशुभ कर्मों का संचय संचित कर्म कहलाता है। जब मनुष्य परिश्रम करता है, व्यवसाय करता है, सेवा करता है या कोई भी कर्म करता है तो वह क्रियमाण कर्म की श्रेणी में आता है। यह वर्तमान में किया जा रहा कर्म है जो भविष्य के संचित कर्मों का आधार बनता है।

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प्रारब्ध को उस धन के समान समझा जा सकता है जो पहले से संचित था और अब खर्च हो रहा है। वर्तमान जीवन में मिलने वाले सुख-दुख, लाभ-हानि और अनेक परिस्थितियां प्रारब्ध के रूप में सामने आती हैं। इसलिए शास्त्र मनुष्य को सत्कर्मों का संचय करने की प्रेरणा देते हैं। यदि कर्मों का भंडार शुभ होगा तो उसका फल भी शुभ ही प्राप्त होगा। कर्मों का संचयन ही जीवन को स्थिरता और सार्थकता प्रदान करता है।

मां गंगा के बिना अधूरी मानी गई है साधना

सनातन परंपरा में मां गंगा को मोक्षदायिनी और पापहारिणी कहा गया है। आचार्य शुभेश शर्मन के अनुसार साधना, उपासना, प्रार्थना तथा देव, ऋषि और पितृ ऋण के शोधन में गंगा जल का विशेष महत्व माना गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि मां गंगा बैकुंठ से पृथ्वी पर अवतरित हुईं। भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा के वेग को धारण किया और राजा भगीरथ के तप एवं संकल्प से गंगा धरती पर प्रवाहित हुईं। इसी कारण उन्हें भागीरथी भी कहा जाता है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा वर्णित यह चौपाई गंगा की महिमा को स्पष्ट करती है—

“गंग सकल मुद मंगल मूला, सब सुख करनि हरनि सब सूला।”

अर्थात मां गंगा समस्त मंगलों की मूल हैं। वे सुख प्रदान करने वाली और दुखों का नाश करने वाली हैं।

शास्त्र की मर्यादा का पालन क्यों आवश्यक है?

आचार्य शुभेश शर्मन का कहना है कि शास्त्रीय मान्यताओं में मनमानी नहीं की जा सकती। शास्त्रों में जीवन को संतुलित और मर्यादित बनाने का मार्ग निहित है। जब मनुष्य शास्त्रों द्वारा निर्धारित मर्यादाओं की उपेक्षा करता है तो वही व्यवस्था उसके यश, कीर्ति, सम्मान और वैभव को प्रभावित कर सकती है।

उनके अनुसार शास्त्र और शस्त्र का संबंध भी इसी भाव को दर्शाता है। जहां शास्त्र का सम्मान होता है वहां व्यवस्था और कल्याण बना रहता है, जबकि मर्यादा भंग होने पर वही स्थिति कष्ट का कारण बन सकती है।

मर्यादा अनुसार चलने का संदेश

सद्गुरुदेव का सरल संदेश है कि जीवन में मर्यादा का पालन करें। कर्मों को श्रेष्ठ बनाएं, धर्म के मार्ग पर चलें और अपने आचरण को शास्त्रीय मूल्यों के अनुरूप रखें। यही संचित कर्मों को समृद्ध करता है और प्रारब्ध को भी सकारात्मक दिशा प्रदान करता है।

मां गंगा की कृपा, सत्कर्मों का संचय और मर्यादित जीवन मनुष्य को आंतरिक शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं।

हर हर गंगे। जय मां गंगे।

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आचार्य शुभेश शर्मन
डॉ. आचार्य शुभेश शर्मन एक प्रख्यात सनातनी विद्वान हैं, जो अपनी प्राच्य विद्याओं और ज्योतिषीय ज्ञान के लिए जाने जाते हैं। वे सनातन समाज में सक्रिय रूप से धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूकता फैलाते हैं, जिसमें पौधारोपण (हरिशंकरी) जैसे सामाजिक कार्य भी शामिल हैं। वे ज्योतिष महाकुंभ जैसे आयोजनों से भी जुड़े रहे हैं।

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16-09-2026