कभी ऊदबिलाव को देखा होगा आपने, लेकिन शायद ही जानते होंगे कि ये हमारी गंगा नदी के लिए कितने जरूरी हैं? ये भी शायद ही आपको मालूम हो कि गंगा में इनका ठिकाना अब लगभग समाप्ति की ओर है। ये जीव साफ पानी, पर्याप्त मछलियों, सुरक्षित नदी तट और साल भर बनी रहने वाली नमी पर निर्भर रहते हैं। नदी से ऊदबिलाव का गायब होना उसके बिगड़ते पर्यावरण की चेतावनी हो सकता है।
गंगा और उसकी 22 सहायक नदियों पर हुए एक बड़े वैज्ञानिक अध्ययन ने इनके ठिकानों की चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है। अध्ययन के अनुसार पूरे गंगा नदी बेसिन में स्मूद-कोटेड ऊदबिलाव के लिए सिर्फ 2,138 वर्ग किलोमीटर इलाका बेहद अनुकूल पाया गया। यह अध्ययन में शामिल गंगा बेसिन का महज 0.26 प्रतिशत है।
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करीब 13,300 वर्ग किलोमीटर इलाका मध्यम रूप से अनुकूल मिला, जबकि 8,06,698 वर्ग किलोमीटर हिस्सा ऊदबिलाव के लिए सबसे कम अनुकूल श्रेणी में आया। सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने विशाल गंगा बेसिन में इस जीव के लिए सुरक्षित और उपयोगी नदी तट इतने कम क्यों रह गए हैं।
सात वैज्ञानिकों ने तैयार की गंगा में ऊदबिलाव की तस्वीर
यह शोध अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘प्लॉस वन’ में प्रकाशित हुआ। इसका पूरा विषय गंगा नदी बेसिन में स्मूद-कोटेड ऊदबिलाव के संरक्षण योग्य प्रमुख ठिकानों की पहचान करना है।

शोध करने वाली टीम में सैयद ऐनुल हुसैन, आशीष कुमार पांडा, सूर्य प्रसाद शर्मा, नौरीन शाहनियाज, शिवानी बर्थवाल, एसके जीशान अली और रुचि बडोला शामिल हैं। ये वैज्ञानिक भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के गंगा जलीय जीव संरक्षण एवं निगरानी केंद्र से जुड़े हैं। सैयद ऐनुल हुसैन जैव विविधता एवं स्थिरता विज्ञान केंद्र, देहरादून से भी संबद्ध हैं।
अध्ययन की परिकल्पना सैयद ऐनुल हुसैन और आशीष कुमार पांडा ने तैयार की। आंकड़ों के विश्लेषण की जिम्मेदारी आशीष कुमार पांडा ने संभाली। शोध की कार्यप्रणाली में आशीष कुमार पांडा और सूर्य प्रसाद शर्मा की भूमिका रही। सैयद ऐनुल हुसैन और रुचि बडोला ने जांच और परियोजना संचालन का काम संभाला। एसके जीशान अली शोध के नक्शों और दूसरे दृश्य रूपों से जुड़े रहे।
इस अध्ययन को जल शक्ति मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन से आर्थिक सहायता मिली।
7,680 किलोमीटर में तलाशे गए ऊदबिलाव के निशान
वैज्ञानिकों ने मुख्य गंगा और उसकी 22 सहायक नदियों के लगभग 7,680 किलोमीटर लंबे हिस्से का अध्ययन किया। शोध में 2016 से 2024 तक जुटाई गई जानकारी का इस्तेमाल हुआ। शोधपत्र के कार्यप्रणाली खंड के अनुसार व्यवस्थित नाव आधारित सर्वे 2018 से 2024 के दौरान किए गए।

सर्वे के लिए नदियों को पांच-पांच किलोमीटर लंबे हिस्सों में बांटा गया। नाव की गति छह से आठ किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई। हर दल में दो पर्यवेक्षक शामिल थे। वे दूरबीन की मदद से ऊदबिलाव, उनके पैरों के निशान, मल के निशान, मांद और शरीर साफ करने वाले स्थानों को खोजते रहे।
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मैदानी सर्वे के साथ पहले प्रकाशित शोध, रिपोर्ट और वैश्विक जैव विविधता सूचना सुविधा से भी जानकारी ली गई। शुरुआत में ऊदबिलाव की मौजूदगी से जुड़े 712 स्थान मिले। एक ही इलाके में बार-बार दर्ज स्थानों को हटाने के बाद 267 स्थानों को अंतिम गणना में शामिल किया गया।
केवल नदी में पानी होना काफी नहीं
ऊदबिलाव के रहने योग्य स्थान पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने जलवायु, जमीन की बनावट, पानी, वनस्पति और मानवीय दखल से जुड़े 26 कारणों का अध्ययन किया। आपस में मिलते-जुलते कारण हटाने के बाद 16 प्रमुख कारणों को अंतिम गणना में रखा गया।
अलग-अलग परिणामों की जांच के लिए छह वैज्ञानिक गणना पद्धतियों का इस्तेमाल किया गया। इनके साझा नतीजों से तैयार आकलन की सटीकता अच्छी पाई गई। इनमें वन क्षेत्र और जीवों के फैलाव का अनुमान लगाने में इस्तेमाल होने वाली रैंडम फॉरेस्ट पद्धति ने सबसे बेहतर परिणाम दिया।
अध्ययन में संरक्षित स्थान से दूरी सबसे असरदार कारण निकली। दिन और रात के तापमान का अंतर दूसरे तथा नदी से दूरी तीसरे स्थान पर रही। जमीन और सतह पर पानी या नमी की मौजूदगी भी ऊदबिलाव के ठिकाने तय करने में महत्वपूर्ण पाई गई।
इसका सीधा अर्थ है कि नदी में पानी दिखाई देना ही पर्याप्त नहीं है। उसके किनारे आराम करने, छिपने और बच्चे पालने की जगह भी होनी चाहिए। नदी में मछलियां और दूसरे जलीय जीव मिलने चाहिए। आसपास अधिक शोर, निर्माण, खनन और मानवीय दखल नहीं होना चाहिए।
एक किलोमीटर के बाद क्यों बदलने लगी स्थिति
संरक्षित स्थानों के पास ऊदबिलाव के अनुकूल आवास मिलने की संभावना सबसे अधिक रही। इनसे करीब एक किलोमीटर से अधिक दूरी बढ़ने पर अनुकूलता घटने लगी। इसकी वजह संरक्षित स्थानों के आसपास कम मानवीय दखल, बेहतर नदी तट और अधिक सुरक्षित वनस्पति हो सकती है।
नदी या दूसरे जल स्रोत से दूरी बढ़ने पर भी स्थिति तेजी से बदली। करीब 2.5 किलोमीटर दूर जाने के बाद ऊदबिलाव के लिए अनुकूलता काफी कम हो गई। यह जीव भोजन, आराम और मांद बनाने के लिए नदी तथा उसके आसपास की नम पट्टी पर निर्भर रहता है।
जिन स्थानों पर साल भर सतह की नमी बनी रही, वहां अनुकूलता अधिक मिली। दिन और रात के तापमान में ज्यादा अंतर होने पर अनुकूलता घटी। साल के सबसे सूखे महीनों में भी कुछ वर्षा और पानी बनाए रखने वाले इलाके ऊदबिलाव के लिए उपयोगी पाए गए।
किस राज्य में कितना अनुकूल ठिकाना मिला
उत्तराखंड में ऊदबिलाव के लिए सबसे अधिक बेहद अनुकूल आवास मिला। राज्य में 1,260.18 वर्ग किलोमीटर इलाका इस श्रेणी में आया। यह अध्ययन में आंके गए उत्तराखंड के हिस्से का करीब 2.43 प्रतिशत है।
उत्तर प्रदेश 495.07 वर्ग किलोमीटर बेहद अनुकूल आवास के साथ दूसरे स्थान पर रहा। हिमाचल प्रदेश में 178.26 वर्ग किलोमीटर और हरियाणा में 145.60 वर्ग किलोमीटर इलाका बेहद अनुकूल पाया गया।
| राज्य | मध्यम अनुकूल आवास | बेहद अनुकूल आवास |
|---|
| उत्तराखंड | 2,417.11 वर्ग किमी | 1,260.18 वर्ग किमी |
| उत्तर प्रदेश | 4,277.38 वर्ग किमी | 495.07 वर्ग किमी |
| हिमाचल प्रदेश | 1,419.91 वर्ग किमी | 178.26 वर्ग किमी |
| हरियाणा | 365.34 वर्ग किमी | 145.60 वर्ग किमी |
| राजस्थान | 773.05 वर्ग किमी | 104.13 वर्ग किमी |
| बिहार | 1,954.69 वर्ग किमी | 79.42 वर्ग किमी |
| मध्य प्रदेश | 824.23 वर्ग किमी | 30.00 वर्ग किमी |
| झारखंड | 945.13 वर्ग किमी | 15.88 वर्ग किमी |
| पश्चिम बंगाल | 2,420.64 वर्ग किमी | शून्य |
| छत्तीसगढ़ | 534.78 वर्ग किमी | शून्य |
| दिल्ली | 140.31 वर्ग किमी | शून्य |
राजस्थान में 104.13 वर्ग किलोमीटर, बिहार में 79.42 वर्ग किलोमीटर, मध्य प्रदेश में 30 वर्ग किलोमीटर और झारखंड में 15.88 वर्ग किलोमीटर इलाका बेहद अनुकूल मिला।
पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में कोई भी इलाका बेहद अनुकूल श्रेणी में नहीं आया। दिल्ली में 140.31 वर्ग किलोमीटर हिस्सा मध्यम रूप से अनुकूल जरूर मिला है।
वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि किसी स्थान का अनुकूल पाया जाना वहां ऊदबिलाव की वास्तविक मौजूदगी का प्रमाण नहीं है। दिल्ली के कुछ हिस्सों में दूसरे उपयोगी ठिकानों जैसी पर्यावरणीय स्थितियां हो सकती हैं, लेकिन इससे वहां ऊदबिलाव होने की पुष्टि नहीं होती।
तराई में कहां मिले बेहतर ठिकाने
भारत और नेपाल का तराई इलाका ऊदबिलाव के लिए अधिक उपयोगी पाया गया। राजाजी राष्ट्रीय उद्यान, दुधवा बाघ अभयारण्य, नंधौर वन्यजीव अभयारण्य, कॉर्बेट बाघ अभयारण्य, कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य और वाल्मीकि बाघ अभयारण्य के आसपास बेहतर आवास मिले।
गिरवा, घाघरा, गंडक, चंबल और सोन नदी के कुछ हिस्से भी महत्वपूर्ण पाए गए। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य और सोन घड़ियाल अभयारण्य के आसपास कम मानवीय दखल, नदी किनारे की वनस्पति, आर्द्र भूमि और लगातार जुड़े नदी तट ऊदबिलाव के लिए उपयोगी माने गए।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य और विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य में भी बेहद अनुकूल आवास के बड़े हिस्से मिले। इन स्थानों पर मछली पकड़ने की पाबंदी, कम मानवीय हलचल और पर्याप्त शिकार ऊदबिलाव के टिके रहने में मदद कर सकते हैं।
कुछ बांध और बैराज भी बने संभावित ठिकाने
अध्ययन में कुछ बांधों, जलाशयों और बैराजों के आसपास भी अच्छी अनुकूलता दर्ज हुई। चंबल नदी पर राणा प्रताप सागर, गांधी सागर और जवाहर सागर बांध के आसपास ऐसे स्थान मिले।
यमुना पर डाकपत्थर, हथिनीकुंड, वजीराबाद, आईटीओ और ओखला बैराज के आसपास भी अनुकूलता देखी गई। सोन पर इंद्रपुरी बैराज, रामगंगा पर हरेवली बैराज, रामगंगा और कालागढ़ बांध तथा शारदा पर टनकपुर बांध और बनबसा बैराज भी इस सूची में शामिल हैं।
घाघरा पर कैलाशपुरी बांध, गंडक बैराज, दामोदर पर पंचेत बांध और दुर्गापुर बैराज तथा मुख्य गंगा पर टिहरी बांध, बिजनौर और फरक्का बैराज के आसपास भी संभावित अनुकूल आवास मिले।
बेतवा नदी पर राजघाट, माताटीला और बेतवा बांध तथा सिंध नदी पर मोहिनी सागर यानी मड़ीखेड़ा बांध के आसपास भी अनुकूलता दर्ज की गई। इन स्थानों पर स्थायी पानी, मछलियों की उपलब्धता और कुछ हद तक कम मानवीय दखल इसकी वजह हो सकते हैं।
इस तथ्य का यह अर्थ नहीं है कि हर बांध ऊदबिलाव के लिए अच्छा होता है। बांध और बैराज नदी का स्वाभाविक बहाव, मौसमी बाढ़ और जीवों की आवाजाही रोक सकते हैं। अध्ययन ने यह बताया है कि कुछ जलाशयों के आसपास बनी स्थायी जल स्थिति ऊदबिलाव के लिए उपयोगी हो सकती है।
सुरक्षित सीमाओं के बाहर मिला 21 प्रतिशत आवास
अध्ययन के अनुसार करीब 21 प्रतिशत अनुकूल आवास मौजूदा संरक्षित स्थानों के बाहर है। इसलिए ऊदबिलाव को बचाने का काम राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
घाघरा, शारदा, रामगंगा और गंडक के कई उपयोगी हिस्से संरक्षित सीमाओं से बाहर हैं। वहां अवैध रेत खनन, नदी तल में खेती, अतिक्रमण, निर्माण और बिना नियंत्रण मछली पकड़ने से नदी तट खराब हो रहे हैं।
मुख्य गंगा में औद्योगिक और खेती से निकला गंदा पानी मछलियों तथा दूसरे जलीय जीवों को नुकसान पहुंचाता है। नदी किनारे की प्राकृतिक घास और वनस्पति हटने से ऊदबिलाव के आराम करने, छिपने और बच्चे पालने के स्थान कम होते हैं।
मछुआरों के साथ टकराव भी एक बड़ी समस्या है। मछलियों के जाल में फंसना या मछलियों को लेकर होने वाला नुकसान ऊदबिलाव के लिए खतरा बन सकता है।
ऊदबिलाव का बचना नदी के लिए क्यों जरूरी है
भारत में ऊदबिलाव की तीन प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें स्मूद-कोटेड ऊदबिलाव, यूरेशियन ऊदबिलाव और एशियन स्मॉल-क्लॉड ऊदबिलाव शामिल हैं। स्मूद-कोटेड ऊदबिलाव का फैलाव सबसे अधिक है।
यह नदियों, झीलों, मीठे पानी वाली आर्द्र भूमि, जलाशयों, मैंग्रोव, सिंचाई नहरों और धान के खेतों के पास भी रह सकता है। इसका प्रमुख भोजन मछली है। उपलब्धता के अनुसार यह पक्षियों, मेंढकों, कीटों, केकड़ों, छोटे स्तनधारियों और सरीसृपों को भी खाता है।
खाद्य शृंखला में ऊपरी शिकारी होने के कारण ऊदबिलाव की मौजूदगी पर्याप्त मछलियों, पानी और उपयोगी नदी तट का संकेत देती है। इसी कारण इसे नदी की सेहत बताने वाला जीव माना जाता है।
स्मूद-कोटेड ऊदबिलाव को अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल सूची में खतरे की आशंका वाली प्रजाति माना गया है। आवास का नुकसान, प्रदूषण, भोजन की कमी, अवैध शिकार और वन्यजीव व्यापार इसके लिए प्रमुख खतरे हैं।
यह अध्ययन संख्या नहीं, संभावित ठिकाने बताता है
इस शोध से गंगा में मौजूद ऊदबिलावों की कुल संख्या पता नहीं चलती। यह केवल उन स्थानों का अनुमान देता है जहां पर्यावरणीय दशाएं इस जीव के रहने के अनुकूल हो सकती हैं।
अध्ययन में ऊदबिलाव की मौजूदगी वाले स्थानों का इस्तेमाल हुआ है। हर नदी हिस्से में यह पता लगाने के लिए बार-बार सर्वे नहीं हुआ कि वहां जीव मौजूद है या पहचान में नहीं आ सका।
नदी किनारे की बहुत छोटी स्थानीय दशाओं, मौसम के साथ बदलते जल प्रवाह और मछलियों की वास्तविक संख्या को भी सीधे शामिल नहीं किया गया। वैज्ञानिकों ने भविष्य में बार-बार मैदानी सर्वे, आनुवंशिक जांच, जीवों की आवाजाही और मछलियों की उपलब्धता से जुड़े आंकड़े जुटाने की जरूरत बताई है।
क्या उपाय बताए गए हैं
शोध में तराई और दूसरे महत्वपूर्ण नदी तटों पर स्थानीय समुदायों की भागीदारी से संरक्षण व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया गया है। अनुकूल ठिकानों के आसपास रेत खनन, नदी तल की खेती और अतिक्रमण पर नियंत्रण जरूरी बताया गया है।
जहां खनन पर पूरी रोक संभव न हो, वहां सीमित मात्रा, अलग-अलग समय और कड़ी निगरानी के साथ रेत निकालने की व्यवस्था की जा सकती है। मछुआरों के नुकसान की भरपाई, जागरूकता और कमाई के दूसरे साधन मानव और ऊदबिलाव के टकराव को घटा सकते हैं।
नदी, आर्द्र भूमि, मछली पालन और जमीन के उपयोग से जुड़ी योजनाओं में ऊदबिलाव के ठिकानों को शामिल करना होगा। अलग-अलग राज्यों और विभागों के साझा प्रयास के बिना गंगा जैसी विशाल नदी व्यवस्था में इस जीव को बचाना आसान नहीं होगा।
गंगा बेसिन का सिर्फ 0.26 प्रतिशत हिस्सा ऊदबिलाव के लिए बेहद अनुकूल मिलना एक प्रजाति तक सीमित चेतावनी नहीं है। नदी में पानी दिखाई देना और उसका जीवित रहना अलग-अलग बातें हैं। ऊदबिलाव के ठिकाने बचेंगे तो मछलियां, आर्द्र भूमि, प्राकृतिक नदी तट और गंगा के दूसरे जलीय जीव भी बचेंगे।
शोध स्रोत: सैयद ऐनुल हुसैन, आशीष कुमार पांडा, सूर्य प्रसाद शर्मा, नौरीन शाहनियाज, शिवानी बर्थवाल, एसके जीशान अली और रुचि बडोला का ‘प्लॉस वन’ में प्रकाशित शोधपत्र।













