भारत में साइबर अपराध के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी, हैकिंग, डेटा चोरी और डिजिटल ठगी जैसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या साइबर अपराध में जमानत मिल सकती है?
इसका जवाब हर मामले में एक जैसा नहीं होता, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आरोपी पर कौन-सी कानूनी धाराएं लगाई गई हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 को लेकर भी लंबे समय से भ्रम बना हुआ था। अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानूनी स्थिति को स्पष्ट कर दिया है।
आईटी एक्ट की धारा 66 क्या है?
धारा 66 उन मामलों पर लागू होती है, जहां कोई व्यक्ति कंप्यूटर, मोबाइल, नेटवर्क या डिजिटल सिस्टम का बेईमानी या धोखाधड़ी के इरादे से दुरुपयोग करता है। इसमें अनधिकृत प्रवेश, हैकिंग, डेटा से छेड़छाड़ और डिजिटल माध्यम से किसी को नुकसान पहुंचाने जैसे अपराध शामिल हो सकते हैं।
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ऐसे अपराधों का असर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। कई बार बैंकिंग व्यवस्था, सरकारी रिकॉर्ड, निजी कंपनियों और आम नागरिकों का संवेदनशील डेटा भी प्रभावित होता है।
क्या धारा 66 जमानती है?
आईटी एक्ट में वर्ष 2008 के संशोधन के दौरान धारा 77B जोड़ी गई थी। इसमें यह व्यवस्था की गई कि जिन अपराधों में अधिकतम तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान है, वे सामान्यतः जमानती होंगे। तीन वर्ष से अधिक की अधिकतम सजा वाले अपराध गैर-जमानती माने जाएंगे।
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धारा 66 में अधिकतम तीन वर्ष के कारावास का प्रावधान है। इसी आधार पर इसे जमानती अपराध माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जुलाई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि धारा 66 की व्याख्या करते समय धारा 77B को साथ पढ़ना आवश्यक है। न्यायालय ने माना कि निचली अदालत द्वारा धारा 77B पर विचार नहीं किए जाने से अपराध की जमानतीय स्थिति को लेकर भ्रम पैदा हुआ। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वर्तमान कानून के अनुसार धारा 66 जमानती है।
क्या इसका मतलब हर साइबर आरोपी को जमानत मिल जाएगी?
यह समझना जरूरी है कि किसी मामले में केवल धारा 66 ही नहीं, बल्कि भारतीय न्याय संहिता, बैंकिंग कानून या अन्य विशेष कानूनों की धाराएं भी लग सकती हैं। यदि किसी मामले में गैर-जमानती धाराएं भी शामिल हैं, तो जमानत का निर्णय उन्हीं प्रावधानों के अनुसार होगा।
इसलिए प्रत्येक मामला अपने तथ्यों और आरोपों के आधार पर अलग-अलग देखा जाता है।
क्या कानून में बदलाव की जरूरत है?
साइबर अपराध का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदला है। आज रैनसमवेयर, डिजिटल पहचान की चोरी, बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी और अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोह जैसी चुनौतियां सामने हैं।
इसी कारण कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के कुछ प्रावधानों की समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि नए प्रकार के साइबर अपराधों के अनुरूप दंड और जांच प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
हालांकि, किसी भी संशोधन का निर्णय संसद द्वारा कानून में बदलाव के बाद ही लागू होगा। फिलहाल धारा 66 की कानूनी स्थिति वही है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 77B के संदर्भ में स्पष्ट किया है।
निष्कर्ष
डिजिटल दुनिया में बढ़ते साइबर अपराधों के बीच कानून की सही जानकारी होना बेहद जरूरी है। आईटी एक्ट की धारा 66 गंभीर साइबर अपराधों से जुड़ी है, लेकिन वर्तमान कानूनी व्यवस्था में यह जमानती श्रेणी में आती है। साथ ही यह बहस भी तेज हो रही है कि बदलते साइबर खतरों को देखते हुए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में समयानुकूल संशोधन किए जाने चाहिए।










