जीवन निरंतर गतिशील है। गति चाहे धीमी हो, लेकिन वह सही दिशा में और सफलता की ओर ले जाने वाली होनी चाहिए। सफलता हर व्यक्ति चाहता है। किसी को अधिक मिलती है, किसी को कम, और किसी को उसके प्रयासों के अनुरूप नहीं मिल पाती। ऐसे में हमें अपने जीवन और व्यवहार का मूल्यांकन करना चाहिए।
यह भी पढ़ेंः संगति का प्रभाव और सनातन धर्म की व्यापकता
सबसे पहले यह विचार करना आवश्यक है कि हम दिनभर में कितना बोलते हैं और उसमें कितना सत्य तथा कितना असत्य होता है। हमारे शब्द कितने वास्तविक हैं और कितने बनावटी। सत्य न तो छोटा होता है और न बड़ा। उसका प्रभाव परिस्थितियों के अनुसार कम या अधिक हो सकता है, लेकिन उसका महत्व हमेशा बना रहता है।
यह भी पढ़ेंः समर्पण, शून्य और सच्ची सफलता का आध्यात्मिक अर्थ
दैनिक जीवन में अक्सर देखा जाता है कि लोग छोटी-छोटी बातों में भी असत्य का सहारा ले लेते हैं। विद्यार्थी गृहकार्य पूरा न होने पर बहाने बनाते हैं। विद्यालय देर से पहुंचने पर वास्तविक कारण बताने के बजाय झूठ बोल देते हैं। किसी कार्य के समय पर न होने पर कर्मचारी या सेवक भी कई बार सत्य छिपाने का प्रयास करते हैं। हालांकि सभी लोग ऐसे नहीं होते। अनेक लोग कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ते।
सद्गुरुदेव कहते हैं कि सत्य वचन बोलने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं और मां सरस्वती की कृपा प्राप्त होने लगती है। सत्य मनुष्य के व्यक्तित्व में ऐसी चमक लाता है जिसे कोई कृत्रिम साधन नहीं दे सकता। सत्य को कुछ समय के लिए छिपाया जा सकता है, लेकिन वह अंततः प्रकट होकर सामने आ ही जाता है।
जिस प्रकार वाहन में यात्रा करते समय सुरक्षा के लिए सीट बेल्ट बांधी जाती है और उससे आत्मविश्वास बढ़ता है, उसी प्रकार जीवन में सत्य का पालन व्यक्ति को आंतरिक सुरक्षा प्रदान करता है। सत्य मनुष्य के आत्मबल को मजबूत करता है। आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्यक्ति के तेज और सकारात्मक ऊर्जा को भी बढ़ाता है।
भारतीय संस्कृति में सत्य का सर्वोच्च स्थान रहा है। राजा सत्यवादी हरिश्चंद्र का चरित्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा। आज भी उनका जीवन सत्यनिष्ठा और धर्मपालन की प्रेरणा देता है।
हमारे सामाजिक और व्यवहारिक जीवन में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है, “सांच को आंच नहीं।” इसका अर्थ है कि सत्य को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाई जा सकती। समय चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, अंततः विजय सत्य की ही होती है।
सद्गुरुदेव कहते हैं कि सत्य जीवन मानव की श्रेष्ठ जीवनधारा है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में “सत्यम् शिवम् सुन्दरम्” का संदेश दिया गया है। सत्य ही शिव है और शिव ही कल्याण का मार्ग हैं। सत्य का आचरण करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे भय, भ्रम और असत्य से मुक्त होकर आत्मिक शांति की ओर बढ़ता है।
भगवान शिव की भक्ति का वास्तविक अर्थ भी सत्य, करुणा और सदाचार को जीवन में उतारना है। जब मनुष्य सत्य को अपनाता है, तब उसके भीतर सकारात्मक शक्ति का विकास होता है और उसका जीवन अधिक संतुलित, शांत तथा सार्थक बनता है।
