जानिए क्या संकेत दे रहे हैं चौराहों के सिग्नल

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आलोक वर्मा

ये प्रगति मैदान के पास का चौक था। लाल बत्ती हो चुकी थी लिहाजा मुझे गाड़ी रोकनी पड़ी। कुछ ही पल बीते थे कि दो हाथ कार के शीशे पर फैल गए। नन्हे हाथ कुछ मांग रहे थे, कुछ सोचता इसके पहले ही बत्ती हरी हो गई और मुझे वहां से चल देना पड़ा। मगर वो दो नन्हे हाथ मेरी आंखों के आगे अभी भी नाच रहे हैं। ऐसे हाथ दिल्ली एनसीआर और मुंबई से लेकर देश के कई शहरों में चौक पर रूकी गाडियों के आसपास अब आम हो गए हैं।

फोटो-हिमानी सिंह

केवल दिल्ली की ही बात करें तो राजधानी की सड़कों पर मौजूद 830 सिग्नल पर गाडियों के रूकते ही कई तरह के हाथ आपकी कार के शीशे पर आते हैं। इनमें किन्नर, बुजुर्ग महिलाओं से लेकर नन्हें बच्चे तक शामिल हैं। एक औऱ ट्रेंड तेजी से बढ़ा है फैले हुए हाथों के अलावा अब सामान बेचने वाले हाथों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।

आश्चर्य की बात ये कि दिल्ली के इन सिग्नलों के पास ट्रैफिक पुलिस तो खड़ी रहती ही है, इन पर पुलिस अफसर, मीडिया के लोग, जज और सांसदों की कारें भी रूकती हैं लेकिन ना तो ये किसी के लिए कार्रवाई करने का काम दिखता है, ना ही किसी चैनल या अखबार को खबर दिखती है, ना सरकार को निर्देश देने का मुद्दा और ना संसद में उठाए जाने लायक आवाज। जबकि दिल्ली में 1960 से ही भीख मांगने पर कानूनी प्रतिबंध है और अगर ड्राइव करते समय शराब पीन, हार्न बजाना या बेल्ट ना पहनना कानूनी अपराध है तो चौराहे पर भीख मांगने या बाजार खोल देना कहां का न्याय है।

मीडिया में किसी के लिए यह खबर नहीं क्योंकि यह बिकेगी नहीं। खबर बेचने की परिपाटी जब से चल पड़ी है तब से ऐसी खबरें महसूस की जाती हैं लेकिन दिखाने या छापने की जरूरत नहीं समझी जाती।

फोटो-हिमानी सिंह

दिल्ली या एनसीआर का शायद ही कोई ऐसा चौक हो जहां इस दृश्य का सामना ना किया जाता हो मगर किसी को इससे मुक्त होने की जरूरत नहीं लगती। जाम मुक्त शहर या चौक की बात जनता, मीडिया से लेकर नेता तक करते हैं मगर जाम के इस एक प्रमुख कारण की किसी को चिंता नहीं।

बहरहाल मेरा मन और दिमाग दोनों में वो हाथ छाए हुए हैं और दिमाग में कई सारे सवाल कि भिक्षावृति एक संगठित रूप में चलाई जाती है ये तो सब जानते मानते हैं लेकिन क्या अब सामान बेचने वाले भी चौराहों पर संगठित रूप से कब्जा कर लिया है। जिंदगी की रफ्तार से ज्यादा तेजी से एक पर एक सवाल दिमाग में आ रहे हैं क्या पुलिस जानबूझ कर इस हालात को अनदेखा करती है या कोई लालच है, क्या सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय या स्थानीय सरकार को इस स्थिति से कोई मतलब नहीं।

जाहिर है भीख मांगने वाले हाथों पर कुछ ना कुछ रखा जाता होगा औऱ सामान बेचने वाले हाथों से कुछ ना कुछ खरीदा भी जाता होगा लेकिन अगर इनकी संख्या में दिन दूनी रात चौगूनी तरक्की होती जाएगी तो इस हालत का भविष्य क्या होगा। पुलिस चौथ की कुछ रकम लेकर खामोश हो सकती है और इनके पुनर्वास के लिए जिम्मेवार समाज कल्याण विभाग के पास जगह नहीं होने का बहाना हो सकता है।

सवाल कई हैं मगर शायद जवाब एक ही कि मुर्खता भरी बातों में दिन ना गवांना ही बेहतर है क्योंकि ये ना तो कोई खबर है ना स्टोरी और ना ही किसी विभाग के लिए सोचने का विषय।

 

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