स्वामी विवेकानंद जयंती पर ‘रन फॉर स्वदेशी’: युवाओं से आत्मनिर्भर भारत की ओर एक राष्ट्रीय आह्वान

स्वामी विवेकानंद जयंती के अवसर पर देशभर में आयोजित ‘रन फॉर स्वदेशी’ अभियान युवाओं को आत्मनिर्भर भारत के विचार से जोड़ने की एक राष्ट्रीय पहल है, जो विवेकानंद के दर्शन को व्यवहार में उतारने का प्रयास करती है।
स्वामी विवेकानंद जयंती
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12 जनवरी केवल एक जयंती नहीं है। यह वह दिन है जब भारत अपने सबसे जाग्रत आत्मबोधी विचारक — स्वामी विवेकानंद — को स्मरण करता है और साथ ही अपने युवाओं से यह प्रश्न भी करता है कि वे किस तरह का भारत बनाना चाहते हैं।

राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाने वाला स्वामी विवेकानंद जयंती आज केवल प्रेरणा का उत्सव नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का स्मरण बन गया है। ऐसे समय में जब भारत “विकसित राष्ट्र” बनने की ओर अग्रसर है, स्वामी विवेकानंद के विचार हमें बताते हैं कि सच्चा विकास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक, बौद्धिक और आत्मनिर्भर होना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद जयंतीः युवा दर्शन और आज का भारत

स्वामी विवेकानंद युवाओं को राष्ट्र की पुनर्रचना की सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। उनका प्रसिद्ध आह्वान —
“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए” — आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना एक सदी पहले था।

यह आह्वान केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं था, बल्कि सामाजिक दायित्व और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए था। वह चाहते थे कि भारत का युवा निर्भीक हो, आत्मविश्वासी हो और अपने देश के प्रति कर्तव्यबोध से प्रेरित हो।

‘रन फॉर स्वदेशी’: एक प्रतीकात्मक नहीं, व्यावहारिक आंदोलन

स्वदेशी जागरण मंच के संयोजक डॉक्टर अश्वनी महाजन के मुताबिक इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए 12 जनवरी 2026 को देशभर में ‘रन फॉर स्वदेशी’ या ‘स्वदेशी संकल्प दौड़’ का आयोजन किया जा रहा है। यह दौड़ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक विचार यात्रा है — आत्मनिर्भरता की ओर।

यूजीसी ने देश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से इसमें भाग लेने का आग्रह किया है। स्कूल शिक्षा विभाग ने इसे ‘परीक्षा पर चर्चा’ पहल से जोड़ते हुए विद्यालयों में ऐसे कार्यक्रमों का आह्वान किया है। विद्या भारती और अनेक राज्य सरकारों की शिक्षा संस्थाएँ भी इसमें सक्रिय भागीदारी कर रही हैं।

स्वदेशी क्यों आज की अनिवार्यता है

आज का वैश्विक परिदृश्य युद्ध, व्यापार संघर्ष, आपूर्ति शृंखला संकट और रणनीतिक संसाधनों के राजनीतिक उपयोग से भरा हुआ है। ऐसे समय में किसी भी राष्ट्र के लिए आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन जाती है।

स्वदेशी का अर्थ है — अपने उद्योग, अपने किसानों, अपने कारीगरों, अपने नवाचार और अपने श्रम की रक्षा और सम्मान।

स्वदेशी का व्यापक अर्थ

स्वदेशी केवल “देशी सामान खरीदना” नहीं है। यह एक सम्पूर्ण सोच है जिसमें शामिल है —

  • भारतीय उद्योगों, MSME और स्टार्टअप्स को सशक्त बनाना
  • स्थानीय उत्पादन और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देना
  • तकनीक, शिक्षा और नवाचार में आत्मनिर्भर बनना
  • उपभोग में विवेक और नीति में दूरदृष्टि रखना

युवाओं के लिए यह उपभोक्ता से निर्माता बनने का आह्वान है। समाज के लिए यह सुविधा से ऊपर उठकर उत्तरदायित्व की ओर बढ़ने का संदेश है।

निष्कर्ष

एक विकसित भारत केवल ऊँची जीडीपी वाला देश नहीं होता, बल्कि वह आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और नैतिक रूप से सुदृढ़ राष्ट्र होता है।

स्वामी विवेकानंद को सच्ची श्रद्धांजलि उनके विचारों को जीवन में उतारना है — और स्वदेशी उसी दिशा में एक ठोस कदम है।

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