गुरु पूर्णिमा पर विशेष जानें गुरु की महता, कहां ले जाते हैं गुरु

मंजू लोढ़ा, लेखिका

गुरू गोविंद दोऊ खडे, काके लागूं पाँय।

बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दियो बतया।’’

भारतीय संस्कृती में गुरू को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। बिन गुरू के ज्ञान नही मिलता। जब हमारा जन्म होता है तो माता-पिता हमारे गुरू होते है जो हमें संस्कारों का, आचरण का चरित्र निर्माण का ज्ञान देते है। वही हमारे मार्गदर्शक एवम् सच्चे पथ-प्रदर्शक बनते है। इसलिये कहते है “माँ-बाप की सेवा पहली पूजा है।’’ फिर हम बडे होते है-विद्यालय, महाविद्यालय का ज्ञान अर्जित करने लगते है तब वहॉं के शिक्षक हमारे गुरू बन जाते है। वहाँ जीवन में व्यावसायिक सफलता को पाने की शिक्षा हम प्राप्त करते है। फिर हमारे जीवन में आगमन होता है, आध्यत्मिक गुरू का, जो हमें जीवन जीने की कला, परमात्मा को प्राप्त करने का सच्चा मार्ग दिखलाते है।

श्री गुरू ग्रंथ साहिब में लिखा गया है,

“गुरू पूरा बडमागी पाइए-मिली साधु हरिनाम छिसाइयें।’’

गुरू-शिष्य परंपरा वेदों-उपनिषदों के समय से रही है।

 

भगवान श्री राम को अपने गुरू विश्वमित्र पर अनन्य भक्ति थी, वही श्रीकृष्णने अपने गुरू पुत्र को यम से लाकर गुरू दक्षिणा का संकल्प पुरा किया। गुरू मानवता की मुंडेर पर चरित्र का चिराग है, साधना के शिखर पर सिद्धत्व की सृष्टि है, आत्मा की भूमि पर अक्षत की दृष्टि है। समाज के शीश पर सौभाग्य का सिंदूर है, अमावस्या की अंधियारी रात में पूनम का प्रकाश है।

इस विराट विश्व में सदगुरू का मिलना अत्यंत हा rदुर्लभ है। सदगुरू जीवन रथ के सारथी है, जीवन नौका के नाविक है। प्रकाश स्तम्भ की भांति स्वयं अलौकिक है और दुसरों को भी आलोक प्रदान करते है।

सदगुरू की महिमा अवर्णनीय है। इसलिये गुरू के प्रति अपनी कृतज्ञता को अर्पित करने के लिये हर वर्ष आषाढ की पुर्णिमा को गुरू पुर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। आषाढ पुर्णिमा को व्यास पुर्णिमा के नाम से भी जान जाता है। यह महर्षि व्यास की जन्मतिथी है जो 18 पुराणों और उपपुराणों के रचयिता है इन्होंने वेदों के ज्ञान का विस्तार किया और महाभारत ग्रंथ की रचना की।

गुरू वह उपकारी है, जो हमको कुम्हार की मिट्टी की तरह अपने सधे हाथों द्वारा एक नायाब आकार प्रदान करता है। गुरू के उपकारों से हम कभी ऋण-मुक्त नही हो सकते, तभी तो गुरू द्रोण द्वारा दाहिने हाथ का अंगुठा मांगने पर भी शिष्य एकलव्य ने निर्भीक होकर अपने अगूंठे को काट कर गुरू दक्षिणा के रूप  में गुरू को प्रदान कर दिया। एक वह समय था, जब सब सुविधाओं को छोडकर शिष्य ज्ञान प्राप्ति के लिये वर्षों तक गुरू के आश्रम में रहकर शिक्षा अर्जित करते थे।

सच गुरू हमें मोह-माया-लोभ-अहंकार और क्रोध रूपी अजगर की कैद से आजाद कराते है और इस नश्वर संसार से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन होने की राह दिखलाते है, धन्य है ऐसे सदगुरू जो हमें मोक्ष मार्ग पर ले जाते है।

“गुरू महिमा गावत सदा, मन राखे अति मोद

सो भव फिर आतै नहीं, बैठे प्रभुकी गोद।’’

गुरूवर के चरणों में श्रद्धा सुमन (कविता)

गुरू-पूर्णिमा के इस शुभ दिन पर

श्रद्धा-सुमन समर्पित गुरूवर, आप इसको स्वीकार करो

प्रात स्मरणीय, परोपकार-परायण, धर्म प्रणेता

आपके पथ की अनुनायी बन पाऊँ, बस इतना उपकार करो

आपके ज्ञान दीप को लेकर, जन-जन तक पहुँचा पाऊं

सत्य, अहिंसा, प्रेम, त्याग की सच्ची अलख जगा पाऊं

काम, क्रोध, मदृ मोह, लोभ से, स्वयं को दूर करा पाऊं

माया के इस मकड जाल से खुद को मुक्त करा पाऊं

करती हूँ यह कामना, आपका आशीर्वाद सदा पाऊं

इतनी दे शक्ति, आपके बताये कर्म मार्ग पर, परिवार को ले चल पाऊं

सच्ची गुरू पुर्णिमा यह होगी, ऐसा है मेरा विश्वास, इसे स्वीकार करो

करूँ प्रतीक्षा आपकी प्रेरणा की, गुरूवर दो मम दिव्य प्रकाश

मेरी आस पूरी करो

“जय गुरूदेव- जय गुरूदेव- जय गुरूदेव’’

–       मंजू लोढ़ा

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06-09-2026