save forest-जंगल और जल को इस तरह बचा रहा है झारखंड का वन विभाग

save forest

Save forest-शासन औऱ प्रशासन की नेकनियति से किया गया प्रयास रंग दिखाता जरूर है। झारखंड में वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग ने कुछ ऐसे प्रयास शुरू किए हैं जिनके परिणा उल्लेखनीय हैं। विभाग के प्रयासों से ना केवल जंगल को बचाने की मुहिम कारगर हो रही है बल्कि औद्योगीकरण, शहरीकरण, जलवायु के साथ हरित क्रांति
परिवर्तन से उत्पन्न जल संसाधनों की चुनौती का भी बखूबी सामना किया जा रहा है। आपको बताते हैं कि फॉरेस्ट विभाग के किन प्रयासों ने वैश्विक रूप लेना शुरू कर दिया है।

Save forest save tree अभियान

सबसे पहले चर्चा उस खास अभियान की जिससे जंगल के पेड़ो की सुरक्षा महफूज हुई है। अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक सह सीईओ, कैम्पा, झारखंड पद पर तैनात आईएफएस संजीव कुमार ने जिला वन अधिकारी के पद पर ही तैनाती के समय एक खास अभियान शुरू किया था। इन्होंने पेड़ों पर राखी बांध कर उन्हें बचाने की राज्य में एक अनूठी पहल शुरू की। यह अभियान अब 1000 गांवो को छूने की कगार से निकलकर दूसरे राज्यों तक पहुंच चुका है।

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पेड़ों को अवैध कटाई से बचाने और उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए, अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक, कैम्पा, झारखंड, संजीव कुमार, आईएफएस, ने साल 2005 में राखी का पवित्र धागा बांधकर पेड़ों को बचाने के लिए एक अनूठी पहल शुरू की थी। इस अभियान ने जल्द ही रफ्तार पकड़ ली और संजीव कुमार अपने हर तैनाती में इस अभियान को जोर शोर से चलाते रहे। इससे केवल पेड़ो की सुरक्षा ही नहीं बल्कि लोगों की आजीविका भी पैदा हो रही थी, इसलिए इस अभियान को लोगों का अपार प्यार मिला।

Save forest अभियान में अब जल को बचाने की बारी

विभिन्न इंसानी गतिविधियों ने जल संसाधनों के लिए कई तरह की मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। धीरे धीरे ये जल स्त्रोत समाप्त हो रहे हैं। हालात ये है कि केंद्रीयकृत भंडारण बनाने के लिए पारंपरिक दृष्टिकोण से ऐसे जल स्रोत बनाने होंगे जो बारहमासी हों। झारखंड के चाइबासा वन प्रभाग (Chaibasa Forest Division) ने ऐसे ही 15 जल स्त्रोत बनाए हैं। जीवित जल स्त्रोतों के कायाकल्प से बने ये बारहमासी जल श्रोत जंगल, इंसान और वन्य जीव तीनों के काम आ रहे हैं। बडाचिरु वन (Badachiru Forest) अधिसूचित संरक्षित वन क्षेत्र है।

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यह संगजाता संरक्षित वन, गांगीमुंडी संरक्षित और कुमारम संरक्षित वन क्षेत्र से घिरा हुआ है। सभी चारों संरक्षित वनों का कुल क्षेत्रफल 156.58 हेक्टेयर है। यह सूअर, सुस्त भालू, हिरण, भेड़िया, सियार, मोर आदि का घर भी है। यहां हाथियों का प्रवासी मार्ग भी है। 40 से 44 डिग्री सेल्सियस के अप्रत्याशित उच्च तापमान आदि के कारण जंगल और आस-पास के गांवों के अंदर सभी जल निकाय मई के दूसरे सप्ताह तक सूख गए थे। अत: उसके बाद जलराशि का निर्माण हुआ
बडाचिरु पीएफ के अंदर जीवित जल स्रोतों का कायाकल्प ही एकमात्र स्रोत है अब उपरोक्त चार संरक्षित वनों के वन्य जीवों और आसपास के ग्रामीणों के लिए पानी उपलब्ध है।
जीवित जल स्रोतों के पुनरुद्धार का प्रभाव:-

  1. भूजल पुनर्भरण।
  2. वन्य जीवन के लिए जल का स्रोत।
  3. आसपास के ग्रामीणों को उनकी स्थानीय जरूरतों के लिए पानी का स्रोत।
    सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व:- प्रकृति पूजा एक प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा है
    आदिवासी समाज का. जंगल के अंदर जीवित जल स्रोत एक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं
    जनजातीय लोगों की आध्यात्मिकता. तो जंगल द्वारा इस प्रकार के छोटे हस्तक्षेप

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