दिल्ली पुलिस में 9,248 पद खाली: राज्यसभा के जवाब के पीछे छिपा असली संकट क्या है?

राज्यसभा में दिल्ली पुलिस के खाली पदों पर दिए गए आधिकारिक आंकड़े चौंकाने वाले हैं। हैरानी की बात यह नहीं कि 9 हजार से ज्यादा पद खाली हैं, बल्कि यह कि फैसले लेने वाले पद भरे हुए हैं और ज़मीन पर अमल कराने वाले सबसे ज्यादा कम हैं।
Delhi Police vacant posts

17 दिसंबर को राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल और गृह मंत्रालय के जवाब ने दिल्ली पुलिस की आंतरिक संरचना को लेकर कई असहज सवाल खड़े कर दिए। सवाल था दिल्ली पुलिस में खाली पदों (Delhi Police vacant posts) का और जवाब दिया गया आंकड़ों के साथ। मगर आंकड़ों के पीछे छिपी असल तस्वीर पर शायद ही किसी ने ध्यान दिया।

गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के अनुसार, 30 नवंबर 2025 तक दिल्ली पुलिस की स्वीकृत कुल संख्या 94,044 है, जिसमें से 9,248 पद रिक्त हैं। पहली नजर में यह एक सामान्य प्रशासनिक जानकारी लग सकती है, लेकिन जब रैंक-वार स्थिति देखी जाती है तो तस्वीर गंभीर हो जाती है।

Delhi police vacant posts ऊपर सब भरा, नीचे खाली

कमिश्नर ऑफ पुलिस, स्पेशल सीपी, जॉइंट सीपी और एडिशनल सीपी जैसे सभी शीर्ष पद पूरी तरह भरे हुए हैं। यानी नीति बनाने, फाइल चलाने और फैसले लेने वाले स्तर पर कोई कमी नहीं है।

समस्या शुरू होती है वहां से, जहां निगरानी और ज़मीनी अमल होना चाहिए।

  • डीसीपी/एडिशनल डीसीपी: 60 में से 13 पद खाली
  • ACP: 346 में से 125 पद खाली (36 प्रतिशत से ज्यादा)
  • इंस्पेक्टर: 1,453 में से 108 पद खाली
  • सब-इंस्पेक्टर: 8,087 में से 1,039 पद खाली
  • ASI: 7,320 में से 300 पद खाली
  • हेड कांस्टेबल: 23,724 में से 3,057 पद खाली
  • कांस्टेबल: 50,946 में से 4,591 पद खाली

यह आंकड़े साफ बताते हैं कि दिल्ली की कानून व्यवस्था को सीधे संभालने वाले ढांचे में सबसे बड़ी कमी है।

ACP स्तर पर सबसे बड़ा झटका

किसी भी पुलिस सिस्टम में ACP वह स्तर होता है जहां से वास्तविक निगरानी शुरू होती है। थाने, इंस्पेक्टर और फील्ड यूनिट्स की जवाबदेही यहीं तय होती है।

जब इसी स्तर पर 36 प्रतिशत से ज्यादा पद खाली हों, तो यह मान लेना मुश्किल नहीं कि मौजूदा अफसरों पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा होगा। अतिरिक्त चार्ज, कई-कई सब-डिवीजन और बढ़ता प्रशासनिक दबाव सीधे कार्यक्षमता को प्रभावित करता है।

प्रमोशन की कतार और ठप निर्णय

सूत्रों के अनुसार, एसीपी स्तर के कम से कम 20 अधिकारी एडिशनल डीसीपी बनने के इंतजार में हैं। यही स्थिति इंस्पेक्टर से ACP बनने वालों की भी है।

इस प्रमोशन अनिश्चितता का असर काम पर साफ दिखता है। अधिकारी जोखिम लेने से बचते हैं, फैसले लटकते हैं और फाइलें आगे बढ़ने की बजाय ठहर जाती हैं। डर यह कि कोई भी विवाद भविष्य की पदोन्नति में बाधा न बन जाए।

ग्राउंड फोर्स की कमी और मंत्रालय की फाइलें

दिल्ली पुलिस काफी पहले ग्राउंड स्टाफ की कमी को लेकर गृह मंत्रालय को प्रस्ताव भेज चुकी थी। मंत्रालय ने उस पर भरोसा नहीं किया और स्वतंत्र एजेंसी NPC यानी नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल से आकलन कराया गया।

वीडियो देखेंः

NPC ने भी दिल्ली पुलिस की जरूरतों को सही माना। इसके बावजूद प्रस्ताव आज तक मंजूरी के इंतजार में है। सवाल यह है कि वह फाइल किस दफ्तर में धूल खा रही है और उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा।

मीडिया में हेडलाइन बनी, सवाल गायब हो गया

राज्यसभा में जवाब आने के अगले ही दिन यह खबर मीडिया में छा गई। लेकिन ज्यादातर रिपोर्ट्स सिर्फ संख्या तक सीमित रहीं। असली सवाल कहीं गायब हो गया।

अगर दिल्ली पुलिस में नीति तय करने वाले सारे पद भरे हुए हैं, तो ज़मीनी अमल करने वालों की भारी कमी के लिए जिम्मेदार कौन है?
और क्या राजधानी की कानून व्यवस्था को ऐसे ही चलाया जाना चाहिए?

निष्कर्ष

दिल्ली पुलिस में 9,248 खाली पद सिर्फ एक प्रशासनिक आंकड़ा नहीं हैं। यह राजधानी की सुरक्षा, पुलिसकर्मियों के कार्यदबाव और सिस्टम की प्राथमिकताओं का आईना हैं।

जब तक इस असंतुलन पर ईमानदारी से बात नहीं होगी, तब तक हर नई घटना के बाद सवाल उठते रहेंगे और जवाब सिर्फ कागजों में सिमटे रहेंगे।

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Alok Verma
a senior journalist with a 25 years experience of print, electronics and digital. worked with dainik jagran, news18india, R,bharat, zee news

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18-07-2026