साइबर ठगी का शिकार होने के बाद आदमी सबसे पहले बैंक को सूचना देता है, ताकि खाते से निकली रकम को रोका जा सके। लेकिन आपने देखा होगा कि समय पर शिकायत होने के बाद भी कई पीड़ितों को ना तो पर्याप्त मदद मिलती है, ना ही उनकी रकम वापस मिल पाती है।
अंग्रेजी अखबार द हिंदू की रिपोर्ट में कॉमन कॉज और लोकनीति-सीएसडीएस के स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2026 का हवाला देते हुए बताया गया है कि साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के पीड़ितों की बड़ी संख्या समय रहते बैंक को सूचना देती है। इसके बावजूद रकम की वसूली और शिकायतों के निपटारे को लेकर असंतोष बना हुआ है।
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सर्वेक्षण में साइबर ठगी को लेकर क्या सामने आया?
कॉमन कॉज और लोकनीति-सीएसडीएस के अध्ययन में 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 8,306 लोगों को शामिल किया गया। इसके अतिरिक्त पीड़ितों और विशेषज्ञों समेत 37 हितधारकों से बातचीत की गई।
अध्ययन के प्रमुख आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो से तीन वर्षों में 13 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने साइबर अपराध का अनुभव किया। साइबर अपराध का सामना करने वालों में 54 प्रतिशत डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी के शिकार हुए।
पीड़ितों की शिकायतों से जुड़ा एक अहम तथ्य यह है कि 63 प्रतिशत लोगों ने धोखाधड़ी के 24 घंटे के भीतर बैंक को इसकी सूचना दी। वहीं, 52 प्रतिशत ने घटना के बाद सीधे बैंक में शिकायत दर्ज कराई।
इन आंकड़ों के बावजूद पीड़ितों की परेशानी कम नहीं हुई। शिकायत के बाद बैंक कितनी जल्दी संदिग्ध लेन-देन पर कार्रवाई करता है और रकम रोकने के लिए क्या कदम उठाता है, यह उनकी आर्थिक सुरक्षा के लिए बेहद अहम है।
सर्वेक्षण में साइबर ठगी को लेकर क्या सामने आया?
कॉमन कॉज और लोकनीति-सीएसडीएस के अध्ययन में 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 8,306 लोगों को शामिल किया गया। इसके अतिरिक्त पीड़ितों और विशेषज्ञों समेत 37 हितधारकों से बातचीत की गई।
अध्ययन के प्रमुख आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो से तीन वर्षों में 13 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने साइबर अपराध का अनुभव किया। साइबर अपराध का सामना करने वालों में 54 प्रतिशत डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी के शिकार हुए।
पीड़ितों की शिकायतों से जुड़ा एक अहम तथ्य यह है कि 63 प्रतिशत लोगों ने धोखाधड़ी के 24 घंटे के भीतर बैंक को इसकी सूचना दी। वहीं, 52 प्रतिशत ने घटना के बाद सीधे बैंक में शिकायत दर्ज कराई।
इन आंकड़ों के बावजूद पीड़ितों की परेशानी कम नहीं हुई। शिकायत के बाद बैंक कितनी जल्दी संदिग्ध लेन-देन पर कार्रवाई करता है और रकम रोकने के लिए क्या कदम उठाता है, यह उनकी आर्थिक सुरक्षा के लिए बेहद अहम है।
साइबर ठगी में पैसा लौटाने पर आरबीआई के नियम क्या हैं?
भारतीय रिजर्व बैंक ने 2017 में अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेन-देन से होने वाले नुकसान के लिए ग्राहकों की जिम्मेदारी तय करने के नियम जारी किए थे।
इन नियमों के तहत, यदि नुकसान बैंक की गलती या लापरवाही से हुआ है, तो ग्राहक की जिम्मेदारी शून्य हो सकती है। यदि गलती किसी तीसरे पक्ष की है और न बैंक की गलती है, न ग्राहक की, तो बैंक से लेन-देन की सूचना मिलने के तीन कार्य दिवस के भीतर शिकायत करने पर भी ग्राहक को शून्य जिम्मेदारी का लाभ मिल सकता है।
लेकिन हर मामले में नियम एक जैसे लागू नहीं होते। यदि ग्राहक ने अपनी गोपनीय बैंकिंग जानकारी साझा की है, तो परिस्थितियों के अनुसार नुकसान की जिम्मेदारी उस पर आ सकती है। इसलिए तीन दिन के भीतर शिकायत करने का मतलब यह नहीं है कि हर हाल में पूरा पैसा वापस मिल जाएगा।
यहां असली सवाल यह है कि पात्र मामलों में बैंक नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं। शिकायत करने वाले ग्राहक को समय पर जवाब मिलना चाहिए और बैंक को अपनी कार्रवाई के बारे में साफ जानकारी देनी चाहिए।
म्यूल खातों से पैसे की वापसी क्यों मुश्किल होती है?
ठगी की रकम को इधर-उधर भेजने के लिए अपराधी कई बार ऐसे बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं, जो उनके अपने नाम पर नहीं होते। ऐसे खातों को म्यूल खाते कहा जाता है। इनके जरिये पैसा कई खातों से गुजरता है, जिससे उसकी पहचान करना और उसे वापस हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
खाता खोलते समय ग्राहक की पहचान की सही जांच, संदिग्ध लेन-देन पर नजर और पुलिस के साथ समय पर जानकारी साझा करना जरूरी है। यदि इन मामलों में लापरवाही होती है, तो ठगी की रकम का पता लगाने में देर हो सकती है।
रिपोर्ट में कर्नाटक जैसे राज्यों में साइबर अपराध से पैसे की वसूली की दर 10 प्रतिशत से कम होने का भी उल्लेख है। यह आंकड़ा बताता है कि ठगी के बाद रकम वापस दिलाना जांच एजेंसियों और संबंधित संस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
साइबर ठगी हो जाए तो क्या करें?
सबसे पहले 1930 पर फोन करें। साइबर वित्तीय धोखाधड़ी का पता चलते ही राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर सूचना दें। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज करें। जल्दी सूचना देने से रकम रोकने की कोशिश की जा सकती है, हालांकि पैसा वापस मिलने की गारंटी नहीं होती।
बैंक में लिखित शिकायत दें। बैंक की आधिकारिक हेल्पलाइन, शाखा या उपलब्ध शिकायत व्यवस्था के जरिये शिकायत दर्ज कराएं। लेन-देन की तारीख, रकम और संदर्भ संख्या जैसी जानकारी दें। शिकायत संख्या जरूर लें।
सबूत संभालकर रखें। बैंक के संदेश, लेन-देन की रसीद, संदिग्ध फोन नंबर, बातचीत के स्क्रीनशॉट और शिकायत की प्रति सुरक्षित रखें। जांच के दौरान ये दस्तावेज काम आ सकते हैं।
बैंक से जवाब नहीं मिले तो शिकायत आगे बढ़ाएं। पहले बैंक के शिकायत निवारण अधिकारी से संपर्क करें। यदि बैंक जवाब नहीं देता या समाधान संतोषजनक नहीं है, तो पात्रता और लागू प्रक्रिया के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक की एकीकृत लोकपाल योजना के तहत शिकायत की जा सकती है।
पीड़ितों को राहत देने के लिए बैंक की जवाबदेही जरूरी
कॉमन कॉज और लोकनीति-सीएसडीएस के अध्ययन से सामने आए आंकड़े एक अहम सवाल खड़ा करते हैं। जब साइबर ठगी के पीड़ितों में बड़ी संख्या 24 घंटे के भीतर बैंक को सूचना दे रही है, तो शिकायत के बाद रकम रोकने और वापस दिलाने में इतनी परेशानी क्यों होती है?
बैंकों को शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई करनी होगी। संदिग्ध खातों की जांच, म्यूल खातों पर रोक और पुलिस के साथ तालमेल भी जरूरी है। नियम बनाना काफी नहीं है, उनका पालन भी होना चाहिए।
साइबर ठगी का शिकार हुआ व्यक्ति पहले ही अपनी रकम गंवाने से परेशान होता है। उसे शिकायत के बाद बार-बार भटकना न पड़े और उसके मामले में समय पर फैसला हो, यह सुनिश्चित करना बैंकों की जिम्मेदारी है।










