सियासी गलियारे में इसका मतलब चाहे जो निकाला जाए, मगर ये सच है कि देश की आंतरिक सुरक्षा पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के तीन सूत्रीय एक्शन का खास प्रभाव पड़ा है। इंटेलिजेंस शेयरिंग और बहु-राज्यीय समन्वय, सड़कों, मोबाइल टॉवरों, स्कूलों और बैंक शाखाओं का निर्माण और भटकते युवाओं को मुख्यधारा में लाने के प्लान ने देश की आंतरिक सुरक्षा में सकारात्मक असर डाला है। आंतरिक सुरक्षा से जुड़े लोग गृह मंत्री अमित शाह को तकनीकी प्रेमी, साझा जानकारी के पक्षधर और खतरे को भांप कर कार्रवाई की बेहद मजबूत रणनीति को अंजाम देने वाला मंत्री मानते हैं।
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इसका ताजा उदाहरण स्वतंत्रता दिवस से पहले चला एक खास ऑपरेशन है। 15 अगस्त से पहले वाले सप्ताह में जब पूरा देश सो रहा था, तब हमारे देश की इंटेलिजेंस एजेंसी और दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल सहित देश के कई राज्यों की पुलिस दिन रात जगी हुई थीं। इनके जगने का कारण एक खास ऑपरेशन था। ऑपरेशन का मकसद कई राज्यों में मशरूम की तरह फैल रहे एक ऐसे खतरे का खात्मा करना था, जो निर्देश तो सीमा पार से लेते हैं, मगर इस्तेमाल हमारे युवक और संसाधनों का करते हैं।
भारतीय आंतरिक सुरक्षा पर पिछले तीन दशकों की मैदानी रिपोर्टिंग यह साफ दर्शाती है कि देश का सुरक्षा ढांचा अब ‘घटना होने के बाद कार्रवाई करने’ (Reactive) के ढर्रे से बाहर निकलकर ‘खतरे को पनपने से पहले ही खत्म करने’ (Preventive) की रणनीति पर आ गया है।
स्वतंत्रता दिवस के समय 14 राज्यों में एक साथ चला नेटवर्क ध्वस्त अभियान और देश के ‘रेड कॉरिडोर’ का सिकुड़ना, किसी एक एजेंसी की अचानक मिली कामयाबी नहीं है। यह गृह मंत्रालय के अंतर्गत काम कर रहे संस्थागत सुधारों, रीयल-टाइम सूचना साझा प्रणाली और स्पष्ट राजनीतिक नीति का एकीकृत परिणाम है।
1. सीमापार स्लीपर सेल्स पर प्रहार: ‘मल्टी-एजेंसी सेंटर (MAC)’ का कसता शिकंजा
पाकिस्तान स्थित ISI समर्थित शहजाद भट्टी नेटवर्क (SBN) के खिलाफ 12 से 14 अगस्त के दौरान चलाया गया बहु-राज्यीय अभियान भारत में तेजी से उभरते ‘हाइब्रिड थ्रेट’ को रोकने का एक सटीक मॉडल है। यह सिंडिकेट सीधे हमलों के बजाय स्थानीय युवाओं को पैसे देकर सुरक्षा प्रतिष्ठानों की रेकी और जासूसी करवा रहा था।
सुरक्षा तंत्र में आए नीतिगत बदलावों के तीन प्रमुख बिंदु:
- एजेंसियों का निर्बाध समन्वय: उत्तर प्रदेश (62), हरियाणा (52), दिल्ली (51) और पंजाब (44) समेत 14 राज्यों की पुलिस ने केंद्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर एक ही समय पर कार्रवाई को अंजाम दिया, जिससे नेटवर्क को संभलने का मौका नहीं मिला।
- जमीनी स्तर पर विखंडन: 253 लोगों की हिरासत और 200 से अधिक गिरफ्तारियों के जरिए लॉजिस्टिक्स देने वाले लोकल मॉड्यूल्स को प्राथमिक स्तर पर ही नाकाम कर दिया गया।
- कानूनी शिकंजा: UAPA, BNS और एक्सप्लोसिव एक्ट के तहत 80 से अधिक एफआईआर दर्ज कर यह सुनिश्चित किया गया कि आतंकी और आपराधिक गठजोड़ को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।
2. ‘रेड कॉरिडोर’ से ‘सुरक्षा ग्रिड’ तक: 3-पिलर मॉडल की सफलता
छह दशकों तक भारत की आंतरिक संप्रभुता के लिए सबसे बड़ा खतरा रहा वामपंथी उग्रवाद (LWE) अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका है। 2004 से 2014 के बीच का दौर सबसे हिंसक माना जाता था, जहाँ 2010 में ही 1,936 घटनाएं और 1,000 से अधिक मौतें दर्ज की गई थीं।

इस दीर्घकालिक संकट को हल करने के लिए गृह मंत्रालय ने जिस 3-पिलर सुरक्षा मॉडल को लागू किया, उसकी संरचना इस प्रकार है:
पहला पिलर: मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और फॉरवर्ड बेसिंग
राज्य के प्रशासनिक प्रभाव को घने जंगलों में स्थापित करने के लिए तीन बुनियादी सुधार किए गए:
- सुरक्षित पुलिस थाने: 2014 के मात्र 66 थानों के मुकाबले अब 663 सुदृढ़ थानों का निर्माण किया गया है।
- सुरक्षा शिविर (CAPF Camps): 408 नए सुरक्षा कैंप स्थापित कर कोर-नक्सल क्षेत्रों पर निरंतर दबदबा (Area Domination) बनाया गया।
- सामरिक सुगमता: 68 नाइट-लैंडिंग हेलीपैड और 400 बुलेट/माइन-प्रूफ वाहनों ने रात के अभियानों व घायलों के त्वरित रेस्क्यू को प्रभावी बनाया।
दूसरा पिलर: इंटेलिजेंस-आधारित पिनपॉइंट ऑपरेशंस
ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, ऑपरेशन ऑक्टोपस और ऑपरेशन डबल बुल जैसे लक्षित सैन्य अभियानों ने पारंपरिक सर्च ऑपरेशन की जगह तकनीक-आधारित पिनपॉइंट स्ट्राइक का रूप लिया। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट में 30 से अधिक हार्डकोर कमांडरों को बेअसर कर उनके सुरक्षित ठिकानों का खात्मा किया गया।
तीसरा पिलर: फंडिंग पर प्रहार और पुनर्वास नीति
- वित्तीय कमर तोड़ना: NIA और ED द्वारा उग्रवादियों के लेवी (वसूली) नेटवर्क पर प्रहार कर 90 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध संपत्तियां जब्त की गईं।
- मुख्यधारा में वापसी: पुनर्वास नीतियों के असर से 2024 से 2026 के मध्य 3,900 से अधिक कैडरों ने हिंसा का मार्ग छोड़कर आत्मसमर्पण किया।
3. नीतिगत बदलाव का सांख्यिकी तुलनात्मक ढांचा
आंकड़ों की जुबानी भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में आया निर्णायक बदलाव:
| सुरक्षा मानक | पुराना परिदृश्य (2010-2014) | वर्तमान स्थिति (2026) | नीतिगत प्रभाव |
| प्रभावित जिले | 126 जिले (2014) | शून्य (0) | शासन का दूरस्थ क्षेत्रों तक विस्तार |
| अत्यधिक प्रभावित जिले | 35 जिले (2014) | शून्य (0) | कोर-कमांड नेटवर्क का पूर्ण विनाश |
| वार्षिक हिंसा की घटनाएं | 1,936 (वर्ष 2010 में) | 33 (जुलाई 2026 तक) | हिंसा में 98% से अधिक की गिरावट |
| नागरिकों व जवानों की मौतें | 1,005 (वर्ष 2010 में) | 11 (जुलाई 2026 तक) | मानव क्षति में अभूतपूर्व कमी |
एक वरिष्ठ रक्षा व आंतरिक मामलों के विश्लेषक के तौर पर, यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि देश की सुरक्षा व्यवस्था अब किसी एक अधिकारी या एजेंसी पर निर्भर नहीं है। राजनीतिक इच्छाशक्ति, पारदर्शी अंतर-एजेंसी समन्वय और विकास केंद्रित सुरक्षा नीति के इस त्रिकोण ने भारत के सुरक्षा ग्रिड को आधुनिक और अभेद्य बना दिया है।









