ऑपरेशन Cy-Vajra में बड़ा खुलासा, 8 फर्जी कॉल सेंटर सील, 49 गिरफ्तार, ऐसे काम करता है साइबर ठगी का नेटवर्क

नोएडा पुलिस के ऑपरेशन Cy-Vajra ने फर्जी कॉल सेंटरों के जरिए चल रहे संगठित साइबर अपराध का बड़ा नेटवर्क उजागर किया है। यह रिपोर्ट बताती है कि साइबर ठग कैसे काम करते हैं, कानून क्या कहता है और आम नागरिक किन सावधानियों से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं।
ऑपरेशन Cy-Vajra के दौरान नोएडा पुलिस द्वारा फर्जी कॉल सेंटर पर कार्रवाई

भारत में साइबर अपराध अब केवल ऑनलाइन धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रह गया है। यह संगठित अपराध का ऐसा नेटवर्क बन चुका है, जिसमें कॉल सेंटर, फर्जी बैंकिंग एजेंट, नकली टेक्निकल सपोर्ट, निवेश योजनाएं, डिजिटल पेमेंट चैनल और अंतरराष्ट्रीय गिरोह एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इसी नेटवर्क पर बड़ा प्रहार करते हुए नोएडा पुलिस ने ऑपरेशन Cy-Vajra के तहत आठ फर्जी कॉल सेंटरों का भंडाफोड़ किया और 49 आरोपियों को गिरफ्तार किया।

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यह कार्रवाई केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि साइबर अपराध अब छोटे स्तर की ठगी नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है।

ऑपरेशन Cy-Vajra में क्या कार्रवाई हुई?

नोएडा पुलिस ने तकनीकी विश्लेषण, डिजिटल ट्रैकिंग, खुफिया सूचनाओं और संयुक्त छापेमारी के आधार पर कई स्थानों पर एक साथ कार्रवाई की।

वीडियो देखेंः

इस अभियान के दौरान आठ फर्जी कॉल सेंटर सील किए गए। पुलिस ने 49 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें कॉल सेंटर संचालक, टीम लीडर और कर्मचारी शामिल हैं। जांच में सामने आया कि इन कॉल सेंटरों के जरिए देश और विदेश के लोगों को अलग-अलग तरीकों से निशाना बनाया जा रहा था।

कैसे काम करता था साइबर ठगी का यह नेटवर्क?

जांच के अनुसार गिरोह अलग-अलग स्क्रिप्ट और तकनीकों का उपयोग करता था ताकि पीड़ितों को विश्वास दिलाया जा सके कि वे किसी सरकारी एजेंसी, बैंक या बड़ी तकनीकी कंपनी से बात कर रहे हैं।

विदेशी नागरिकों को माइक्रोसॉफ्ट टेक्निकल सपोर्ट, टैक्स एजेंसी या बैंकिंग सहायता के नाम पर कॉल की जाती थी। उन्हें कंप्यूटर वायरस, टैक्स बकाया या बैंक खाते में समस्या का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करवाए जाते थे।

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भारतीय नागरिकों को आसान लोन, घर बैठे नौकरी, निवेश पर मोटे मुनाफे और क्रेडिट कार्ड ऑफर का लालच देकर ठगा जाता था।

इस पूरे नेटवर्क में VoIP कॉलिंग, Caller ID Spoofing, फर्जी वेबसाइट, नकली दस्तावेज और डिजिटल वॉलेट का उपयोग किया जाता था ताकि कॉल और भुगतान दोनों वास्तविक दिखाई दें।

साइबर फ्रॉड का नेटवर्क केवल भारत तक सीमित नहीं

साइबर अपराध अब सीमा रहित अपराध बन चुका है। जांच एजेंसियों के अनुसार भारत के कई शहरों से जुड़े नेटवर्क विदेशों तक फैले हुए हैं।

भारत

नोएडा, गुरुग्राम, दिल्ली, मुंबई और अन्य शहरों में फर्जी कॉल सेंटर लंबे समय से सक्रिय पाए गए हैं। यहां से विदेशी नागरिकों को टेक्निकल सपोर्ट स्कैम और भारतीय नागरिकों को लोन, निवेश तथा नौकरी के नाम पर निशाना बनाया जाता है।

श्रीलंका

कुछ मामलों में श्रीलंका को सपोर्टिंग हब के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जहां डिजिटल पेमेंट चैनलों और बैंकिंग नेटवर्क के जरिए धन के लेनदेन की जांच सामने आई है।

कंबोडिया, म्यांमार और लाओस

इन देशों में तथाकथित Fraud Factories और Digital Slavery मॉडल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बने हुए हैं। भारतीय युवाओं को आकर्षक नौकरी का झांसा देकर वहां ले जाने और बाद में उन्हें साइबर ठगी करने के लिए मजबूर किए जाने के कई मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे नेटवर्क में डिजिटल अरेस्ट, निवेश धोखाधड़ी और रोमांस स्कैम जैसे अपराध भी संचालित किए जाते हैं।

डिजिटल अरेस्ट और टेक्निकल सपोर्ट स्कैम क्यों तेजी से बढ़ रहे हैं?

साइबर अपराधी अब मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल करते हैं। वे खुद को पुलिस अधिकारी, सीबीआई, आयकर विभाग, बैंक अधिकारी या टेक्निकल इंजीनियर बताकर पीड़ित को डराते हैं।

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डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में वीडियो कॉल पर फर्जी वारंट दिखाए जाते हैं और कहा जाता है कि जांच पूरी होने तक किसी से बात नहीं करनी है। इसके बाद पीड़ित से पैसे ट्रांसफर करवाए जाते हैं।

BNS की धारा 111 क्यों महत्वपूर्ण है?

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 111 संगठित अपराध से संबंधित है। यदि कोई व्यक्ति संगठित साइबर अपराध में शामिल पाया जाता है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा सकती है। इस प्रावधान के तहत दोष सिद्ध होने पर न्यूनतम पांच वर्ष की सजा, आजीवन कारावास तक की सजा और कम से कम पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है।

यदि जांच में यह साबित होता है कि फर्जी कॉल सेंटर संगठित साइबर ठगी के लिए संचालित किए जा रहे थे, तो आरोपियों पर यह धारा लागू हो सकती है।

आम नागरिक कैसे रहें सुरक्षित?

साइबर अपराध से बचने का सबसे प्रभावी तरीका सतर्कता है। यदि कोई व्यक्ति बैंक अधिकारी, पुलिस, सरकारी एजेंसी या टेक्निकल सपोर्ट बनकर फोन करे और तुरंत पैसे भेजने, ओटीपी बताने या स्क्रीन शेयर करने के लिए कहे तो तुरंत कॉल समाप्त कर दें।

किसी भी लोन, निवेश या नौकरी के प्रस्ताव की पुष्टि संबंधित कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट से करें। अज्ञात लिंक, ऐप और रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने से बचें। यदि ठगी हो जाए तो तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर रिपोर्ट करें। शुरुआती कुछ घंटे धन वापस मिलने की संभावना बढ़ा सकते हैं।

ऑपरेशन Cy-Vajra का व्यापक संदेश

नोएडा पुलिस की यह कार्रवाई केवल एक आपराधिक गिरोह के खिलाफ अभियान नहीं है। यह संकेत है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां अब साइबर अपराध को संगठित अपराध के रूप में देख रही हैं। डिजिटल ट्रैकिंग, तकनीकी जांच और विभिन्न एजेंसियों के समन्वय से ऐसे नेटवर्क तक पहुंचना पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हुआ है।

साथ ही यह कार्रवाई आम नागरिकों के लिए भी चेतावनी है कि साइबर अपराधी लगातार अपने तरीके बदल रहे हैं। जागरूकता, तकनीकी सतर्कता और समय पर शिकायत ही ऑनलाइन ठगी के खिलाफ सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

ऑपरेशन Cy-Vajra क्या है?

यह नोएडा पुलिस का विशेष अभियान है, जिसके तहत फर्जी कॉल सेंटरों और संगठित साइबर अपराध नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की गई।

फर्जी कॉल सेंटर कैसे ठगी करते हैं?

ये बैंक अधिकारी, टेक्निकल सपोर्ट, सरकारी एजेंसी, निवेश सलाहकार या नौकरी देने वाली कंपनी बनकर लोगों से पैसे और व्यक्तिगत जानकारी हासिल करते हैं।

डिजिटल अरेस्ट स्कैम क्या होता है?

इसमें ठग खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर फर्जी दस्तावेज दिखाते हैं और गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करवाते हैं।

साइबर ठगी होने पर सबसे पहले क्या करें?

तुरंत 1930 हेल्पलाइन पर कॉल करें, राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें और संबंधित बैंक को तुरंत सूचना दें।

BNS की धारा 111 क्या कहती है?

यह संगठित अपराध से संबंधित प्रावधान है, जिसके तहत दोषी पाए जाने पर न्यूनतम पांच वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और न्यूनतम पांच लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।

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inspector raman kumar
इंस्पेक्टर रमण कुमार सिंह,दिल्ली पुलिस में बतौर इंस्पेक्टर तैनात है । वे दिल्ली के कई पुलिस थानों के साथ साथ साइबर पुलिस स्टेशन के थानाध्यक्ष रहे है । वे साइबर जागरूकता के लिए साइबर सेफ व्हाट्सएप्प ग्रुप और बी द पुलिस नाम से फेसबुक पेज और फेसबुक ग्रुप के संचालक है ।

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16-09-2026