सनातन धर्म में प्रत्येक देवी-देवता की उपासना का अपना अलग विधान बताया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने लंबे अध्ययन और आध्यात्मिक अनुभव के आधार पर पूजा-पद्धति निर्धारित की है। इसलिए शास्त्रों में बताए गए मार्ग का पालन करना ही श्रेष्ठ माना गया है।
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किस भगवान को किस प्रकार की पूजा प्रिय है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणपति मोदक से प्रसन्न होते हैं। भगवान सूर्य को नियमित अर्घ्य अर्पित करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। भगवान महादेव का अभिषेक विशेष फलदायी माना गया है। वहीं भगवती अंबा स्तुति और भक्ति से प्रसन्न होती हैं।
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जब पूजा शास्त्रों के अनुरूप होती है तो उसका आध्यात्मिक लाभ भी अधिक मिलता है। इसके विपरीत मनमाने तरीके अपनाने से साधना का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। इसलिए सनातन परंपरा में शास्त्रों के निर्देशों का पालन करने पर बल दिया गया है।
जय-जय श्रीलक्ष्मी नरसिंह देव भगवान।
अहंकार क्यों बन जाता है विनाश का कारण?
रामायण में कुंभकर्ण का उल्लेख केवल एक शक्तिशाली योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि अहंकार के प्रतीक के रूप में भी किया जाता है। कहा जाता है कि जब वह जागता था तो उसके सामने जो भी आता, उसे निगल जाने का प्रयास करता था।
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अहंकार का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही होता है। जिस व्यक्ति में अहंकार आ जाता है, वह दूसरों को दबाने, उनका सम्मान छीनने और सब कुछ अपने अधिकार में करने की इच्छा रखने लगता है। अंततः यही अहंकार उसकी कीर्ति, धन, स्वास्थ्य, ज्ञान और विवेक तक को नष्ट कर सकता है।
इससे बचने का सबसे सरल उपाय भगवान के नाम का स्मरण और श्रीराम की शरणागति बताई गई है।
राम जपो, राम जपो, राम जपो बावरे।
घोर भव नीर निधि, नाम निज नाव रे।।
जीवन में अंतर्दृष्टि और बाह्य दृष्टि दोनों क्यों आवश्यक हैं?
जीवन में केवल बाहरी दुनिया को देखना ही पर्याप्त नहीं है। अंतर्दृष्टि मनुष्य को आत्मबोध कराती है, जबकि बाह्य दृष्टि उसे संसार को सही रूप में देखने की क्षमता देती है।
यदि ज्ञान तो हो, लेकिन जीवन में सही दृष्टि न हो, तो मनुष्य सुख का अनुभव कर सकता है, पर पूर्ण आनंद नहीं पा सकता। इसी कारण स्वस्थ नेत्र और स्पष्ट दृष्टि दोनों ही मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने गए हैं।
नेत्रदान और नेत्र बाधित लोगों की सहायता का संकल्प
सनातन संस्कृति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। सेवा भी धर्म का महत्वपूर्ण स्वरूप है। नेत्र बाधित लोगों को संसार देखने का अवसर मिले, इसके लिए समाज को आगे आना चाहिए।
यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग का संकल्प ले, तो अनेक लोगों के जीवन में प्रकाश लाया जा सकता है। यही सच्ची मानव सेवा भी है और धर्म का पालन भी।
जीवन पर चिंतन
विश्वास समय के साथ बनता है, लेकिन टूटने में देर नहीं लगती। बदलते व्यवहार और टूटते वादों के बीच मनुष्य को विवेक और सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
वो बदले हैं हवाओं की तरह, यकीन ही नहीं।
वो दौड़ में शामिल हैं, जिनके पास ज़मीन ही नहीं।
वो कहते हैं खुद को ईमानदार सबका,
जिनके ईमान पर खुद को भी यकीन नहीं।
वो बदले हैं कई बार, कई मौकों पर,
उनके बदलने पर भी अब यकीन नहीं।
उन पर भी अब कितना भरोसा करूं,
मुझे उनके किसी वादे पर अब यकीन नहीं।
वो आते-जाते हैं महफ़िल में हर शहर, हर गली,
उनके आने-जाने पर भी अब यकीन नहीं।
वो चले जाते हैं महफ़िल से रुसवा होकर,
वो आएंगे फिर महफ़िल में, इस पर अब यकीन नहीं।
शब्द संचयन: शुभेश शर्मन
कृपापात्र और विश्वासपात्र में अंतर
धर्मग्रंथों के अनुसार कृपापात्र स्वयं ईश्वर या गुरु की कृपा से बनता है। वह कृपा का अधिकारी होकर अपने आप उनके निकट पहुंच जाता है।
लेकिन विश्वासपात्र बनने के लिए पात्रता सिद्ध करनी पड़ती है। जैसे गुरु स्वयं योग्य शिष्य को बुलाते हैं, उसी प्रकार विश्वास भी योग्य आचरण से अर्जित होता है।
जय मां गंगे।







