बिहार के सहरसा में स्थित गायत्री शक्तिपीठ में आयोजित व्यक्तित्व परिष्कार सत्र में ट्रस्टी डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने विद्यार्थियों को अध्ययन का गूढ़ तत्व समझाते हुए बताया कि प्रातःकाल वास्तव में स्वर्णिम समय होता है। इस समय जागने से स्मृति, धृति, मेधा और प्रज्ञा का जागरण होता है।
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सुबह की ताजगी मन और मस्तिष्क को नई ऊर्जा देती है, जिससे अंतःस्फुरणा उत्पन्न होती है और याददाश्त में स्पष्ट सुधार देखा जाता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सुबह उठने से केवल पढ़ाई में ही नहीं, बल्कि जीवन के हर निर्णय में विवेक विकसित होता है। व्यक्ति समझ पाता है कि क्या करना उचित है और क्या नहीं। इस समय वातावरण में प्राण ऊर्जा अधिक होती है, जो मानसिक और बौद्धिक विकास में सहायक बनती है। इसलिए विद्यार्थियों को सुबह उठकर पढ़ाई करने की आदत डालनी चाहिए।
पढ़ाई: जीवन का वास्तविक सौंदर्य
डॉ. जायसवाल ने यह भी कहा कि पढ़ाई केवल परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन का सौंदर्य है। यदि विद्यार्थी पढ़ाई में अपनी रुचि खोज लेते हैं, तो उनका मन स्वतः अध्ययन में लगने लगता है। यही रुचि आगे चलकर सफलता का आधार बनती है।
कार्यक्रम की विशेष झलक
इस अवसर पर सिलीगुड़ी से आए बी. एन. मंडल यूनिवर्सिटी के अवकाश प्राप्त प्रवीर कृष्ण सिन्हा ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि यहां की व्यवस्था उत्कृष्ट है और अरुणजी का यह प्रयास कई लोगों के लिए सहायक सिद्ध हुआ है।
कार्यक्रम में विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राओं के साथ गायत्री शक्तिपीठ, सहरसा के सभी परिजन उपस्थित रहे। साथ ही संस्कृति भवन, लोकहा, सुपौल के लोकार्पण समारोह का आयोजन भी हुआ, जिसका अनावरण माननीय उप मुख्यमंत्री श्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने किया। सांसद श्री दिलेश्वर कामत सहित कई गणमान्य लोग इस अवसर पर उपस्थित रहे।
अंत में डॉ. जायसवाल ने कहा कि संस्कृति का अर्थ परिष्कृति है, जिसमें चिंतन, चरित्र और व्यवहार की शुद्धता शामिल होती है। यह संस्कृति भवन पूरे गांव में प्रेरणा और संस्कार का स्रोत बना रहेगा।
