मातृभक्ति और अद्वैत की विरासत: आदि शंकराचार्य का प्रेरक प्रसंग

मातृभक्ति और संस्कृति के संरक्षण की ऐसी मिसाल, जो हर पीढ़ी को प्रेरित करती है।
गायत्री शक्तिपीठ में प्रवचन देते हुए वक्ता और ध्यान से सुनते श्रोता

बिहार के सहरसा स्थित गायत्री शक्तिपीठ में मातृ दिवस के अवसर पर आयोजित व्यक्तित्व परिष्कार सत्र में डॉ. अरुण कुमार जायसवाल ने भारतीय संस्कृति, मातृभक्ति और जीवन मूल्यों पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने आदि शंकराचार्य मातृभक्ति की विशेष जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि माँ केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि संस्कारों की पहली गुरु होती है। व्यक्ति चाहे कितनी भी ऊँचाई हासिल कर ले, माँ के प्रति उसका कर्तव्य कभी समाप्त नहीं होता। उनका पूरा वक्तव्य केवल जानकारी नहीं था, बल्कि ऐसा संदेश था जिसने श्रोताओं को अपने जीवन और व्यवहार पर सोचने के लिए प्रेरित किया।

आदि शंकराचार्य मातृभक्तिःशंकराचार्य और माँ को दिया गया वचन

उन्होंने कहा कि आदि शंकराचार्य का जीवन इस बात का उदाहरण है कि आध्यात्मिक ऊँचाइयों पर पहुंचने के बाद भी मातृभक्ति सर्वोपरि रहती है। संन्यासी बनने के बाद भी उन्होंने अपनी माँ से किया वादा निभाया और अंतिम समय में उनके पास पहुंचे।

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समाज के विरोध के बावजूद उन्होंने घर के द्वार पर ही माँ का अंतिम संस्कार किया। यह घटना उनके जीवन की सबसे भावुक घटनाओं में गिनी जाती है। अपनी माँ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए शंकराचार्य ने “मातृ स्तुति” की रचना की।

इस स्तुति में माँ के कष्ट, त्याग और स्नेह का ऐसा वर्णन है, जो हर व्यक्ति को भीतर तक छूता है।

भारत की सांस्कृतिक एकता में योगदान

डॉ. जायसवाल ने अपने वक्तव्य में यह भी बताया कि शंकराचार्य का कार्य केवल आध्यात्मिक नहीं था, बल्कि उन्होंने पूरे भारत को एक सूत्र में जोड़ा। उन्होंने चार मठों की स्थापना की। ये मठ हैंः

  • बद्रीनाथ (उत्तर)
  • श्रृंगेरी (दक्षिण)
  • द्वारका (पश्चिम)
  • पुरी (पूर्व)

इन मठों के माध्यम से उन्होंने ज्ञान और परंपरा को संरक्षित किया और समाज को दिशा दी। उस समय तंत्र और अंधविश्वास का प्रभाव बढ़ रहा था, जिससे समाज भ्रमित हो रहा था। शंकराचार्य ने वैदिक मार्ग को पुनः स्थापित किया और बताया कि धर्म का अर्थ प्रकृति के साथ संतुलन बनाना है।

डॉ. जायसवाल ने अपने प्रवचन में यह स्पष्ट किया कि महान से महान व्यक्ति भी माँ के प्रति अपने कर्तव्य को लेकर संवेदनशील रहता है। स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों के जीवन में भी यह भाव देखने को मिलता है।

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन में उपलब्धियों के साथ भावनात्मक जिम्मेदारियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

डॉ. जायसवाल ने यह भी रेखांकित किया कि आज के समय में जब सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों में परिवर्तन दिख रहा है, ऐसे उदाहरण हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देते हैं। उनका पूरा वक्तव्य श्रोताओं के लिए एक आत्ममंथन का अवसर बन गया, जिसमें धर्म, कर्तव्य और भावनात्मक जिम्मेदारी का संतुलन स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया।

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13-10-2026