पालघर के ये दो कस्बे आदर्श बन गए हैं क्यों जानिए विस्तार से

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नई दिल्ली, इंडिया विस्तार। महाराष्ट्र के पालघर जिले में लगभग 20,000 की आबादी वाले दो छोटे कस्बे इस बात के लिये एक आदर्श बन गए हैं कि कैसे बाधित पानी की आपूर्ति, पानी की कमी, पानी के बिगड़ते बुनियादी ढांचे जैसी चुनौतियों से उचित कीमत पर निपटा जा सकता है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-आईआईटी बम्बई मौजूदा पाइप के ज़रिये जल वितरण नेटवर्क के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए एक हस्तक्षेप के रूप में ‘मल्टीपल आउटलेट्स’ के साथ आगे आया है। हस्तक्षेप में शेड्यूलिंग और विकेंद्रीकृत बुनियादी ढांचे के उपयोग द्वारा वांछित जल आपूर्ति संचालन की एक नई रणनीति शामिल है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) – जल प्रौद्योगिकी उपक्रम, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-आईआईटी बम्बई और आईआईटी मद्रास के सहयोग से, स्थानीय ग्राम पंचायत की भागीदारी के साथ, महाराष्ट्र के पालघर जिले के कस्बों  सफाले और उमरपाड़ा, में समाधान लागू किया गया है। वर्तमान में यहाँ एक बहु ग्राम जल आपूर्ति प्रणाली से पानी उपलब्ध कराया गया है।

ये समाधान महंगे इन्फ्रास्ट्रक्चर घटकों की आवश्यकता को कम करेंगे और योजना के संचालन में सुधार करेंगे। आमतौर पर, 2000 लोगों की आबादी के लिए, पारंपरिक रूप से, ईएसआर (आधे दिन की भंडारण क्षमता) के लिए लगभग 10 लाख रुपये की लागत की आवश्यकता होगी। जबकि कई आउटलेट के साथ शाफ्ट के लिये केवल 2 लाख रुपये की ही लागत आती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में, 2000 से कम आबादी वाले ऐसे 5 लाख निवास स्थान हैं। इसलिए, कई आउटलेटों के साथ शाफ्ट को अपनाने से मौजूदा सरकारों का जल जीवन मिशन और अन्य शहरी जल आपूर्ति प्रणालियों में हजारों करोड रुपये के खर्चों को बचाया जा सकेगा। लागत के अलावा, शाफ्ट में बहुस्तरीय प्रावधान से परिचालन में आसानी, बेहतर दबाव प्रबंधन और भविष्य की जनसंख्या वृद्धि के लिए बेहतर समाधान प्रदान करता है। यह कम लागत वाला हस्तक्षेप, जिसने महंगे बुनियादी ढांचे के घटकों की आवश्यकता को कम कर दिया है और योजना के संचालन में सुधार किया है। जल शक्ति मंत्रालय द्वारा जल जीवन मिशन के तहत हर घर जल के हिस्से के रूप में कार्यान्वयन के लिए सिफारिश की गई है। कई सार्वजनिक स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग विभाग, नगर निगम और जल प्राधिकरण इन समाधानों को अपनाने के लिए आगे आए हैं क्योंकि इससे बड़ी लागत में धन की बचत होगी।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा समर्थित जल प्रौद्योगिकी पहल के तहत मांग आधारित जल अभिसरण समाधान के लिए महंगे बुनियादी ढांचे के घटकों की आवश्यकता को कम करेगा और योजना के संचालन में सुधार करेगा।

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