साइबर अपराध के बढ़ते मामलों के बीच गृह मंत्रालय (MHA) की नई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) छोटे-मूल्य के पीड़ितों के लिए एक अहम राहत लेकर आई है। नई SOP के अनुसार ₹50,000 से कम की साइबर वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ी फ्रीज की गई राशि को अब कोर्ट ऑर्डर के बिना पीड़ितों को लौटाया जा सकेगा। यह नीति साइबर अपराध मामलों के निपटान की प्रक्रिया को सरल और तेज बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
🔹 क्या है MHA की नई SOP?
नई SOP के तहत ऐसे साइबर फ्रॉड मामले, जिनमें धोखाधड़ी की राशि ₹50,000 से कम है, उनमें पीड़ितों को कोर्ट की लंबी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा। बैंक, पेमेंट एग्रीगेटर और संबंधित साइबर पोर्टल आपसी समन्वय से रिफंड प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे।
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🔹 बैंक अकाउंट फ्रीज पर 90 दिन की समयसीमा
SOP के अनुसार यदि किसी खाते में फ्रीज लगाया गया है, तो बैंक के पास उसे हटाने या रिव्यू करने के लिए अधिकतम 90 दिन का समय होगा। इससे अनावश्यक रूप से लंबे समय तक खातों के फ्रीज रहने की समस्या कम होने की उम्मीद है।
🔹 वर्तमान स्थिति: फ्रीज खातों का आंकड़ा क्यों अहम है?
राष्ट्रीय स्तर पर यह बताने वाला कोई सार्वजनिक समेकित डेटा उपलब्ध नहीं है कि बैंकों में कुल कितनी राशि फ्रीज पड़ी है। हालांकि, स्थानीय रिपोर्टों और केस स्टडीज़ से संकेत मिलता है कि हजारों खाते और करोड़ों रुपये विभिन्न साइबर मामलों में फ्रीज हैं। ऐसे में छोटे-मूल्य मामलों के लिए यह SOP व्यापक असर डाल सकती है।
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🔹 कानूनी और बैंकिंग जोखिम
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट्स ने कई मामलों में बैंकों की जवाबदेही तय की है। इसके बावजूद धोखाधड़ी की पहचान, फॉरेंसिक ट्रेल और तकनीकी जांच की जटिलता के कारण विवाद की संभावना बनी रहती है। यदि SOP का क्रियान्वयन स्पष्ट दिशानिर्देशों के बिना हुआ, तो गलत फ्रीजिंग और देरी की शिकायतें सामने आ सकती हैं।
🔹 नीति और व्यवहार के लिए अनुशंसित कदम
- नेशनल रजिस्टर: फ्रीज राशियों का समेकित और पारदर्शी डेटा।
- केस स्टेटस ट्रैकिंग: बैंक और साइबर पोर्टलों पर सार्वजनिक ट्रैकिंग सिस्टम।
- ऑटोमैटिक रिव्यू विंडो: छोटे-मूल्य मामलों में स्वचालित समीक्षा।
- फॉरेंसिक मानक: गलत पहचान रोकने के लिए मानकीकृत सत्यापन प्रक्रिया।
🔹 जोखिम और सावधानियाँ
- अधूरी जांच से निर्दोष खाताधारकों को नुकसान।
- राष्ट्रीय डेटा की कमी से नीति प्रभाव का सही आकलन कठिन।
- बैंकिंग और कानूनी प्रक्रियाओं के कारण संभावित विवाद।
Frequently Asked Question (FAQ)
Q1. MHA की नई SOP किन साइबर फ्रॉड मामलों पर लागू होगी?
उत्तर: यह SOP मुख्य रूप से ₹50,000 से कम की साइबर वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े मामलों पर लागू होगी, जहाँ पीड़ित की राशि बैंक या पेमेंट चैनल में फ्रीज की गई है।
Q2. क्या अब हर मामले में कोर्ट ऑर्डर की जरूरत नहीं होगी?
उत्तर: छोटे-मूल्य (₹50,000 से कम) के मामलों में SOP के तहत रिफंड कोर्ट ऑर्डर के बिना संभव हो सकता है, बशर्ते जांच और बैंकिंग सत्यापन में मामला सही पाया जाए।
Q3. बैंक अकाउंट कितने समय तक फ्रीज रह सकता है?
उत्तर: नई SOP के अनुसार बैंकों को किसी भी फ्रीज को हटाने या समीक्षा करने के लिए अधिकतम 90 दिन की समयसीमा का पालन करना होगा।
Q4. अगर बैंक 90 दिन में फ्रीज नहीं हटाता तो क्या होगा?
उत्तर: ऐसी स्थिति में पीड़ित साइबर पोर्टल, बैंक की ग्रिवांस सेल या संबंधित नियामक मंच पर शिकायत दर्ज कर सकता है। SOP का उद्देश्य देरी को कम करना है।
Q5. क्या गलत तरीके से फ्रीज हुए खातों को भी राहत मिलेगी?
उत्तर: SOP में सत्यापन और फॉरेंसिक जांच पर जोर दिया गया है, ताकि गलत पहचान के कारण निर्दोष खाताधारकों को नुकसान न हो।
Q6. क्या इस SOP से बड़े साइबर फ्रॉड मामलों पर भी असर पड़ेगा?
उत्तर: सीधे तौर पर नहीं। यह SOP मुख्य रूप से छोटे-मूल्य के मामलों पर केंद्रित है, लेकिन इससे सिस्टम में पारदर्शिता और प्रक्रिया सुधार की दिशा जरूर बनेगी।
निष्कर्ष
MHA की नई SOP छोटे-मूल्य साइबर फ्रॉड पीड़ितों के लिए राहत की दिशा में एक सकारात्मक और व्यावहारिक कदम है। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ तभी सुनिश्चित होगा जब फ्रीज डेटा में पारदर्शिता, समयबद्ध बैंकिंग प्रक्रिया और मजबूत फॉरेंसिक मानक लागू किए जाएँ। सही क्रियान्वयन के साथ यह नीति साइबर न्याय प्रणाली को अधिक भरोसेमंद बना सकती है। किसी तरह का साइबर फ्राड होने पर तुरंत 1930 पर कॉल करें या शिकायत करें http://cybercrime.gov.in/










