भगवान विष्णु यहां खुद ग्रहण करते हैं प्रसाद

भगवान विष्णु जहां खुद प्रसाद ग्रहण करें तो उस जगह की पवित्रता और महता आसानी से समझी जा सकती है। छत्तीसगढ़ के चमत्कारिक राजीव लोचन मंदिर के बारे में कहा जाता है कि भगवान विष्णु यहां खुद प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह मंदिर चतुर्थाकार में बनाया गया है। यह भगवान काले पत्थर की बनी विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति है, जिसके हाथों में शंक, चक्र, गदा और पदम है। ऐसी मान्यता है कि गज और ग्राह की लड़ाई के बाद भगवान विष्णु ने यहां के राजा रत्नाकर को दर्शन दिए, जिसके बाद उन्होंने इस मंदिर का निर्माण कराया।

इसलिए इस क्षेत्र को हरिहर क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। हरि मतलब राजीव लोचन जी और उनके पास ही एक और मंदिर है जिसे हर यानी राजराजेश्वर कहा जाता है। अभी जो मंदिर है यह करीब सातवीं सदी का है। प्राप्त शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण नलवंशी नरेश विलासतुंग ने कराया था।

भक्त राजिम तेलीन
राजीव लोचन मंदिर प्रांगण मे ही राजिम तेलीन का भी मंदिर है। माना जाता है कि राजिम तेलीन भगवान की असीम भक्त थी। बताया जाता है कि इस क्षेत्र का पुराना नाम पद्मावती पुरी भी है। बाद में राजिम तेलीन के नाम पर राजिम नाम से जाना जाने लगा। मंदिर के उत्तर दिशा में स्थित द्वार से बाहर निकलने के बाद आप साक्षी गोपाल का दर्शन कर सकते हैं। साथ ही मंदिर के चारों ओर नृसिंह अवतार, बद्री अवतार, वामनावतार, वराह अवतार यानी चार अवतारों का दर्शन कर सकते हैं।

मंदिर में निर्मित मूर्तियाँ और दीवारों पर उकेरी गई कलाकृतियाँ शानदार है। ये कलाकृतियाँ अत्यंत ही मनोरम और मनमोहक है। मंदिर देखने में सफेद दिखता है लेकिन वास्तव में यह सफेद नहीं है। मंदिर का अधिकांशतः हिस्सा पत्थर और ऊपर का हिस्सा ईट से बना है। चूने की पुताई की वजह से मंदिर सफेद दिखता है।

तीन दिव्य रुपों के दर्शन
राजीव लोचन मंदिर में भगवान के तीन रुपों के दर्शन होते हैं। सुबह में भगवान के बाल्य रुप, दोपहर में युवा अवस्था और रात में वृद्धावस्था के दर्शन होते हैं।

चावल-दाल व सब्जी का भोग और भोग
यहां भगवान को दाल चावल और सब्जी का भोग लगता है। सुबह में आरती और भोग के बाद मंदिर 12 बजे बंद कर दिया जाता है। कहा जाता है कि भगवान तब शयन करते हैं। इसके लिए उनका बिस्तर भी लगाया जाता है। जिसके बाद पुनः 2.30 में मंदिर खुलता है और आरती, भोग लगता है।

इसके बाद शाम में दो आरती होती है। आरती के बाद भगवान को भोग लगाया जाता है और फिर उनके शयन के लिए बिस्तर लगाया जाता है। शनिवार के दिन भगवान की विशेष पूजा की जाती है, उनका विशेष श्रृंगार भी किया जाता है। राजीव लोचन भगवान को तिल के तेल से लेपा जाता है, फिर श्रृंगार किया जाता है।

अद्भुत रहस्य
लोगों और वहाँ के पुजारियों को मानना है कि भगवान यहाँ साक्षात प्रकट होते हैं। उनके होने का अनुभव लोगों ने किया है। कहा जाता है कि कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान ने भोग को ग्रहण किया है। कई बार दाल चावल पर हाथ के निशान मिले हैं। साथ ही कई बार यह भी देखा गया है कि भगवान के बिस्तर पर तेल, तकिये आदि बिखरे पड़े रहते हैं। कई चैनलों ने इसकी पड़ताल भी की और अधिकतर पड़ताल में यह रहस्य सही पाया गया है।
कैसे पहुँचे

राजीव लोचन मंदिर रायपुर से करीब 45-50 किलोमीटर दूर है। वहां जाने के लिए आप अपनी स्वयं के वाहन से भी जा सकते हैं। अगर आप बस से जाना चाहें तो पचपेढ़ी से आपको बस मिल जाएगी। राजिम बस स्टैंड से थोड़ी दूर पर मंदिर स्थित है।

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20-10-2026