Labour day: मजदूर दिवस पर जानिए रामदेव सिंह की कहानी जिन्होंने इस कंपनी प्रबंधन की चूलें हिला दीं

पूरी दुनिया में 1 मई मजदूर दिवस (labour day) के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर एसए डांगे, ज्योतिर्मय बसु, एके गोपालन, सरीखे मजदूर नेताओं..

पूरी दुनिया में 1 मई मजदूर दिवस (labour day) के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर एसए डांगे, ज्योतिर्मय बसु, एके गोपालन, नंबूदरीपाद, एसएम बनर्जी, वीवी गिरी, एपी शर्मा, पीटर अलवारिस, दत्तोपंत ठेंगड़ी, दत्ता सामंत, उमरावमल पुरोहित, जॉर्ज फर्नांडिस और रामदेव सिंह सरीखे मजदूर नेताओं को भी याद करने की जरूरत है जिन्होंने मजदूरों की भलाई के लिए जीवन पर्यन्त संघर्ष किया और उन्हें सफलता भी मिली।

मजदूर दिवस (labour day)

कहते हैं, शिकागो में 4 मई 1886 में मजदूर आठ घंटे काम की मांग को ले कर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए गोलियां चला दी गईं। इसमें कई मजदूर मारे गए। इसके बाद पहली मई को शिकागो के शहीद मजदूरों की याद में मजदूर दिवस (labour day) मनाया जाने लगा। भारत में लेबर किसान पार्टी ऑफ हिन्दुमस्तान ने 1 मई 1923 को मद्रास में इसकी शुरुआत की थी। प्रथम मई को मद्रास के समुद्र तट पर आयोजित इस प्रथम मई दिवस (labour day) के समारोह के अध्यक्ष मजदूर नेता श्री चेट्टीयार थे। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर और संगठित रूप में इसका आयोजन 1928 में हुआ। उस समय से लेकर अब तक हमारे यहाँ मई दिवस (labour day) का आयोजन प्रतिवर्ष बहुत उत्साह के साथ होता रहा है।

रामदेव सिंह और मजदूर दिवस (labour day)

मजदूर दिवस (labour day) के मौके पर हिंडाल्को रेनूकूट के मजदूर नेता रामदेव सिंह की कहानी आपके सामने पेश हैं। हाल ही में 14 अप्रैल 2022 को 87 वर्ष की उम्र में रामदेव बाबू का निधन हो गया। मजदूरों का मसीहा कहे जाने वाले रामदेव बाबू की याद में 28 अप्रैल 2022 को एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया जिसमें क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों ने उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डाला। तब से वह फिर चर्चा में हैं।

रामदेव बाबू की राजनीतिक पारी इतिहास के पन्नों में आसानी से नहीं खोजी जा सकती है। वे पढ़े-लिखे नहीं थे और उन पर लिखा-पढ़ा भी नहीं गया था। वह लोक में जिंदा थे और उनकी बहादुरी की कहानियाँ मुँह जुबानी थी। रेनूकूट के लोगों में एक कहावत पॉपुलर है, ‘’ अदमिन में नउआ, पंछिन में कउआ आ नेतवन में रमदेउआ ‘’ ।

रामदेव सिंह ने मजदूर आन्दोलन में अपनी उग्र छवि और साहसिक प्रदर्शनों के कारण पहचान कायम की थी।

राम ही नहीं रामदेव को भी चौदह साल बनवास रहना पड़ा

“जब किसी तरह के जुल्म के खिलाफ, शोषण के खिलाफ, अत्याचार के खिलाफ सीना तान कर एक टोली खड़ी हो जाती थी और उस टोली में चाँद की तरह चमकता था एक चेहरा, वह चेहरा बाबू रामदेव सिंह का था। रामदेव जी की तरह अक्खड़, संकल्पशक्ति और इच्छाशक्ति वाले लोग दुर्लभ हैं। भारत में सोने की लंका का कोई महत्व नहीं है, यहाँ महत्व है चौदह साल वनवास रह कर लोक कल्याण करने वाले राम का। यहाँ महत्व है चौदह साल वनवास रहकर हिंडाल्को मैनेजमेंट के अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर और लड़कर मजदूरों का कल्याण करने वाले रामदेव का। बाबू रामदेव की सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब हम किसी तरह के जुल्म को सहने से इनकार कर दें। बाबू रामदेव की सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब हम शोषण के खिलाफ, दोहन के खिलाफ, अत्याचार के खिलाफ सीना तान कर खड़े हो जाएँ। रामदेव कभी झुके नहीं, रामदेव कभी रुके नहीं, अभाव और यातनाएँ रामदेव के कदम को रोक नहीं पाईं। किसी तरह का प्रलोभन रामदेव को डिगा नहीं पाया। शोषण और जुल्म के खिलाफ सीना तान कर वह आजन्म लड़ते रहे। कभी पराजय नहीं स्वीकार किया। मैं उस अपराजेय योद्धा बाबू रामदेव सिंह के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।”

उक्त बातें हिंडाल्को के मजदूर नेता रामदेव सिंह की श्रद्धांजलि सभा में देश के जानेमाने साहित्यकार व पत्रकार अजय शेखर ने कही जो स्वयं बाबू रामदेव सिंह के संघर्ष के साथी रहे।

रेनूकूट के पास तुर्रा पिपरी में आयोजित इस श्रद्धांजलि सभा को अनेक नेताओं, साहित्यकारों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों, अधिकारियों और बाबू रामदेव के संघर्ष के साथियों ने संबोधित किया।

वरिष्ठ भाजपा नेता और रामदेव जी के सहयोगी रहे श्रीनारायण पाण्डेय ने बहुत भावुक होकर कहा कि “रामदेव जी से मेरा परिचय 1962 में 29 जून को हुआ था जब मैं रेनूकूट पधारा था। पश्चिम बंगाल के जेके नगर से रेनूकूट आकर के हिंडाल्को पॉट रूम जॉइन करने वाले रामदेव जी वहाँ मजदूरों की हालत को देखकर मैनेजमेंट पर हमेशा करारा प्रहार किया करते थे जिसके कारण उन्हें कई-कई बार टर्मिनेशन का सामना करना पड़ा था। बाबू रामदेव सिंह ने एक ट्रेड यूनियन ‘राष्ट्रीय श्रमिक संघ’ की स्थापना की, जो आज भी सक्रिय है। उस समय रेनूकूट के सड़क के दोनों किनारों पर एक भी झोपड़ी नहीं थी, एक भी दुकानदार नहीं था…सिर्फ बेहया के जंगल थे। रामदेव जी ने झोपड़ियाँ बनवाईं, दुकाने खुलवाईं और व्यापार मण्डल के अध्यक्ष बने। इसके लिये उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। उस वक्त सिक्योरिटी का एक इनचार्ज था, आर डी शर्मा जो कुत्ता-मार अफसर के नाम से कुख्यात था, वह जेल भेज देता था। रामदेव जी के सहयोगी नेता राकेश चतुर्वेदी, जो कालांतर में विधायक बने, जेल में बंद हो गए थे। रामदेव जी ने 11 बजे रात को, 1963 में पहली हड़ताल तीन दिन का करा दिया…फिर 1966 में हड़ताल हुई, 12 अगस्त को और 318 लोगों को निकाल दिया गया, जिसका नेतृत्व रामदेव सिंह कर रहे थे। रामदेव जी ने बिड़ला मैनेजमेंट के खिलाफ संघर्ष किया। वह सोशलिस्ट थे, जिद्दी और धुन के पक्के थे। वह विजयी हुए। 14 साल बेरोजगार रहने के बाद 1977 में राजनारायण जी ने रामदेव जी को पुनः हिंडाल्को जॉइन कराया। नौकरी करते हुए भी हिंडाल्को के प्रेसिडेंट अग्रवाल जी को रगड़ते रहते थे रामदेव बाबू। रामदेव बाबू किसी की भी गलत बात को सहते-सुनते नहीं थे।”

इस अवसर पर दो महत्वपूर्ण घोषणाएँ हुईं। पिपरी नगर पंचायत के चेयरमैन दिग्विजय सिंह ने शहर में बनने वाले पार्क का नाम रामदेव सिंह पार्क रखने की घोषणा की। रामदेव बाबू के पुत्र कवि मनोज भावुक ने घोषणा की कि हर साल बाबूजी की पुण्यतिथि 14 अप्रैल को मजदूरों की लड़ाई लड़ने वाले एक शख्सियत को रामदेव सिंह सम्मान से नवाजा जाएगा।

रामदेव सिंह के सहयोगी और उत्तरप्रदेश ट्रेड यूनियन कांग्रेस के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट लल्लन राय ने वीडियो संदेश द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि, “रामदेव सिंह जी मजदूरों के सर्वमान्य नेता थे और मजदूरों के ही नहीं, रेनूकूट में जो बहुमंजिली दुकाने हैं, जो चमकता बाजार है, वह कभी पथरीली जमीन हुआ करती थी। उस बाजार और दुकानों का अगर कोई माई-बाप था वो बाबू रामदेव सिंह थे। हिंडाल्को की मर्जी के खिलाफ रामदेव सिंह ने रेनूकूट के असहाय दुकानदारों को बसाया। तो यूं कहिए कि बाबू रामदेव सिंह जी मजदूरों के साथ-साथ, दुकानदारों और जनता के जननेता थे। 12 अगस्त 1966 को बाबू रामदेव सिंह की एक आवाज पर हिंडाल्को की चिमनी का धुआँ बंद हो गया था। पूरे प्लांट को बंद करना पड़ा था। इतना बड़ा जन समर्थन था, बाबू रामदेव सिंह के साथ।”

श्रद्धांजलि सभा में वनवासी सेवा आश्रम की संचालिका डॉ. शुभा प्रेम ने कहा कि तुर्रा पिपरी के वनवासी सेवा आश्रम के भी अभिन्न अंग रहे रामदेव बाबू।

रामदेव बाबू की श्रद्धांजलि सभा में अपना उद्गार व्यक्त करने वालों में मनमोहन मिश्रा, डीएफओ रेनूकूट, मुन्ना सिंह, अध्यक्ष, जागो भारत फाउंडेशन, राकेश पाण्डेय, भाजपा युवा नेता, पुराने साथी माहेश्वर द्विवेदी, आर डी राय, शिक्षक योगेंद्र सिंह, युवा नेता बीरबल सिंह, शहर के पत्रकार जलालूद्दीन, मानी मदान, एसपी पांडे, अधिवक्ता नंदलाल, संजय संत और कनौड़िया केमिकल्स के वीरेंद्र सिंह प्रमुख रहे। गजलकार धनंजय सिंह राकिम और भोजपुरी गीतकार राजनाथ सिंह राकेश ने काव्य पाठ किया तो भजन मंडली ने रामदेव बाबू की याद में अनेक भजन सुनाये। सभा का संचालन मनोज त्रिपाठी ने किया।

इस अवसर पर रामदेव बाबू के जीवन संघर्ष पर बने एक वृतचित्र को भी दिखाया गया।

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29-04-2026