असहयोग आंदोलन-राजेन्द्र बाबू ने तब वकालत का पेशा छोड़ दिया था

असहयोग आंदोलन की औपचारिक शुरूआत होने से पहले ही बिहार में असहयोग का माहौल बनने लगा था। सितंबर, 1920 में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में कलकत्ता के विशेष अधिवेशन में गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया। कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन 1920 में इसे पूर्ण स्वीकृति दी गई। बिहार में इससे पूर्व बिहार प्रान्तीय सम्मेलन के 12वें अधिवेशन (भागलपुर) में राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में असहयोग पर बल दिया गया।

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नवंबर, 1920 ई० में शाहाबाद में नशाबंदी आंदोलन शुरू किया गया। असहयोग आंदोलन के क्रम में राजेन्द्र प्रसाद, मजहरूल हक, ब्रजकिशोर प्रसाद, मुहम्मद शफी दाऊदी आदि नेताओं ने विधायिका के चुनाव से नाम वापस ले लिया। राजेन्द्र प्रसाद ने वकालत का पेशा छोड़ दिया। उनके भाई राय साहब महेंन्द्र प्रसाद ने राय साहब की उपाधि लौटा दी और मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा दे दिया।

असहयोग आंदोलन के समय शिक्षा के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय महाविद्यालय की स्थापना की गई। इसके प्राचार्य राजेन्द्र प्रसाद बने। राष्ट्रीय महाविद्यालय के प्रागंण में बिहार विद्यापीठ का उद्घाटन 6 फरवरी 1921 को गाँधी जी द्वारा किया गया। महजहरूल हक इसके कुलाधिपति और ब्रजकिशोर प्रसाद कुलपति बने। असहयोग आंदोलन के दौरान मजहरूल हक ने दीघा के पास मित्र खैरू मियाँ से दान में प्राप्त भूमि पर सदाकत आश्रम की स्थापना की। 30 सितंबर, 1921 ई० को महजरूल हक ने सदाकत आश्रम से ‘दि मदरलैण्ड’ नामक एक अखबार निकालना प्रारंभ किया जिसने राष्ट्रीय भावना का प्रचार-प्रसार किया। 22 दिसंबर, 1921 को युवराज प्रिंस ऑफ वेल्स का पटना आगमन हुआ। उस दिन पटना शहर में हड़ताल आयोजित की गई। 5 फरवरी 1922 ई० को चौरी-चौरा की घटना के बाद गाँधी जी द्वारा 12 फरवरी 1922 ई० को असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया गया। ब्रिटिश सरकार से असहयोग के लिए मौलाना सज्जाद द्वारा इमारत-ए-शरिया संस्था का गठन फुलवारी में किया गया था।

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23-09-2026