सोशल मीडिया पर होने वाली पोस्ट को लेकर आजकल काफी चर्चा है। सरकारी आदेश पर पोस्ट को डिलीट करना या अकाउंट को ब्लॉक करने को लेकर अगर आपके मन में भी सवाल है, तो पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट के एक फैसले से आप अपने अधिकारों को समझ सकते हैं।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2026 में Haryana 24 News Network Pvt. Ltd. बनाम Union of India मामले में इस सवाल पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने समाचार संस्था के फेसबुक पेज को ब्लॉक करने से जुड़ा आदेश रद्द कर दिया। अदालत के मुताबिक, प्रभावित पक्ष को टेकडाउन नोटिस की प्रति उपलब्ध कराना प्राकृतिक न्याय का जरूरी हिस्सा है। साथ ही, ऐसा निर्देश जारी करने वाले अधिकारी के पास वैधानिक अधिकार होना और तय प्रक्रिया का पालन करना भी आवश्यक है।
यह फैसला समाचार संस्थानों, डिजिटल पत्रकारों और सोशल मीडिया पर सामग्री प्रकाशित करने वाले लोगों के लिए अहम है।
और पढ़ेंः स्वदेशी सोशल मीडिया की जरुरत क्यों है आप भी जान लीजिए
हाई कोर्ट ने फेसबुक पेज बहाल करने का आदेश क्यों दिया?
यह मामला हरियाणा 24 न्यूज नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड के फेसबुक पेज को भारत में प्रतिबंधित किए जाने से जुड़ा था। हरियाणा पुलिस के एक पुलिस अधीक्षक ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(b) के तहत मेटा को पेज की पहुंच रोकने के लिए नोटिस भेजा था।
राज्य की ओर से कार्रवाई के समर्थन में कहा गया कि कंपनी के एक निदेशक पर जबरन वसूली के मामले में आरोप था और फेसबुक पेज का इस्तेमाल कथित रूप से पीड़ित को डराने के लिए किया जा रहा था।
अदालत ने इस मामले में नोटिस जारी करने वाले अधिकारी के अधिकार और कानूनी प्रक्रिया की जांच की। अदालत के अनुसार, संबंधित पुलिस अधीक्षक के पास इस प्रावधान के तहत ऐसा निर्देश जारी करने का आवश्यक अधिकार नहीं था। नियमों के मुताबिक, पुलिस की ओर से इस तरह का नोटिस कम से कम डीआईजी रैंक के विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी द्वारा जारी किया जाना चाहिए।
अदालत ने नोटिस की अनिवार्य समीक्षा प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। प्रभावित संस्था को आदेश की प्रति नहीं मिलने से उसके लिए कार्रवाई को चुनौती देना मुश्किल हो गया था।
और पढ़ेंः पार्सल स्कैम क्या है? सोशल मीडिया दोस्ती से कस्टम अधिकारी तक, ऐसे होती है ऑनलाइन ठगी
अदालत ने आदेश रद्द करते हुए फेसबुक पेज बहाल करने का निर्देश दिया। साथ ही, भविष्य में ऐसी कार्रवाई होने पर प्रभावित पक्ष को नोटिस की प्रति तुरंत उपलब्ध कराने को कहा।
सोशल मीडिया पोस्ट हटाने के लिए कौन से कानून हैं?
भारत में सरकार के निर्देश पर ऑनलाइन सामग्री हटाने या उसकी पहुंच रोकने के लिए अलग-अलग कानूनी प्रावधान हैं। इनमें दो प्रमुख व्यवस्थाएं शामिल हैं।
आईटी अधिनियम की धारा 69A
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A केंद्र सरकार को निर्धारित कानूनी आधारों पर ऑनलाइन सामग्री ब्लॉक करने का अधिकार देती है। इनमें भारत की संप्रभुता और अखंडता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे आधार शामिल हैं।
इसकी प्रक्रिया सूचना प्रौद्योगिकी (लोक अभिगम के लिए सूचना की ब्लॉकिंग की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम, 2009 के तहत तय की गई है।
इस व्यवस्था में ब्लॉकिंग आदेशों की गोपनीयता का प्रावधान है। इसके कारण प्रभावित व्यक्ति के लिए आदेश और कार्रवाई का आधार जानना हमेशा आसान नहीं होता। इससे पारदर्शिता और कानूनी उपायों तक पहुंच को लेकर सवाल उठते हैं।
धारा 79(3)(b) और आईटी नियम, 2021
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(b) और आईटी नियम, 2021 का नियम 3(1)(d) भी ऑनलाइन सामग्री हटाने या उसकी पहुंच रोकने से संबंधित हैं।
इन नियमों के तहत सरकारी निर्देश जारी करने वाले अधिकारियों के अधिकार, नोटिस में कारण बताने और कार्रवाई की समीक्षा करने से जुड़ी शर्तें निर्धारित हैं।
15 नवंबर 2025 से प्रभावी संशोधन के तहत नोटिस जारी करने के लिए वरिष्ठ स्तर के अधिकारी की अनुमति, लिखित और कारणयुक्त सूचना, संबंधित कानूनी प्रावधान तथा सामग्री के सटीक यूआरएल का उल्लेख और मासिक समीक्षा जैसे प्रावधान किए गए।
पुलिस की ओर से ऐसे नोटिस जारी करने के लिए कम से कम डीआईजी रैंक के विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी की शर्त रखी गई।
इस प्रावधान के तहत 2025 के संशोधित नियमों में मध्यस्थ मंच को संबंधित सामग्री हटाने या उसकी पहुंच निष्क्रिय करने के लिए सूचना मिलने के 36 घंटे तक की अधिकतम समयसीमा दी गई थी। इसे तीन घंटे की समयसीमा समझना सही नहीं होगा।
टेकडाउन नोटिस की प्रति मिलना क्यों जरूरी है?
हाई कोर्ट के फैसले का अहम पहलू यह है कि प्रभावित व्यक्ति को यह पता होना चाहिए कि उसके पेज या पोस्ट के खिलाफ कार्रवाई क्यों की गई।
अगर किसी व्यक्ति को यह नहीं बताया जाता कि किस सामग्री पर आपत्ति है, तो उसके लिए अपनी बात रखना मुश्किल हो जाता है। वह यह भी नहीं समझ पाता कि कार्रवाई को चुनौती देने के लिए उसे कौन से तथ्य या दस्तावेज पेश करने चाहिए।
प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत कहता है कि किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाली कार्रवाई उचित प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। उसे कार्रवाई का आधार जानने और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
अदालत ने माना कि संबंधित आईटी नियमों में प्रभावित उपयोगकर्ता को सूचना देने का स्पष्ट प्रावधान नहीं होने के बावजूद नोटिस की प्रति उपलब्ध कराना प्राकृतिक न्याय का जरूरी हिस्सा है।
फेसबुक पेज या पोस्ट ब्लॉक हो जाए तो क्या करें?
अगर किसी सरकारी आदेश के कारण आपके सोशल मीडिया पेज या पोस्ट की पहुंच रोक दी जाती है, तो कुछ कदम उठाए जा सकते हैं।
प्लेटफॉर्म का संदेश सुरक्षित रखें। कार्रवाई से जुड़ा संदेश, स्क्रीनशॉट, तारीख और उपलब्ध संदर्भ संख्या अपने पास रखें।
आदेश की जानकारी मांगें। प्लेटफॉर्म के शिकायत अधिकारी या उपलब्ध शिकायत व्यवस्था के जरिए कार्रवाई का आधार, संबंधित पोस्ट और आदेश का विवरण मांगें।
मूल सामग्री का रिकॉर्ड रखें। संबंधित पोस्ट का यूआरएल, प्रकाशन की तारीख और उपलब्ध सामग्री की प्रति सुरक्षित रखें। इससे जरूरत पड़ने पर अपना पक्ष रखने में मदद मिल सकती है।
शिकायत करें और कानूनी सलाह लें। अगर आपको लगता है कि कार्रवाई गलत है या निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो उपलब्ध शिकायत व्यवस्था का इस्तेमाल करें। जरूरत पड़ने पर कानूनी विशेषज्ञ से सलाह लें।
ध्यान रहे कि हर सोशल मीडिया प्रतिबंध को इस फैसले के आधार पर अपने आप अवैध नहीं कहा जा सकता। कार्रवाई की वैधता उसके कानूनी आधार, तथ्यों और अपनाई गई प्रक्रिया पर निर्भर करती है।
सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और दूसरे मंचों पर सामग्री प्रकाशित करने वालों के लिए यह फैसला एक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। अगर सरकारी निर्देश के कारण किसी पेज या पोस्ट की पहुंच रोक दी जाती है, तो क्या प्रभावित व्यक्ति को यह जानने का अवसर मिलना चाहिए कि कार्रवाई क्यों हुई?
अदालत के फैसले से स्पष्ट होता है कि धारा 79(3)(b) और आईटी नियम, 2021 के तहत होने वाली कार्रवाई में अधिकारी के अधिकार और तय प्रक्रिया का पालन जरूरी है। प्रभावित व्यक्ति को आदेश की जानकारी देना भी प्राकृतिक न्याय से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू है।
हालांकि, इस फैसले को धारा 69A के तहत होने वाली हर ब्लॉकिंग कार्रवाई पर सीधे लागू मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों व्यवस्थाओं की कानूनी प्रक्रिया अलग है।
ऑनलाइन सामग्री पर कार्रवाई कानून के अनुसार होनी चाहिए। साथ ही, प्रभावित व्यक्ति को कार्रवाई का कारण जानने और उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने का अवसर भी मिलना चाहिए।




