क्या Facebook, Instagram, YouTube या X पर डाली गई कोई पोस्ट अब सरकारी नोटिस मिलते ही तीन घंटे में हटा दी जाएगी? भारत में करीब 2.98 लाख URL कार्रवाई के लिए चिन्हित किए जाने के बाद यह सवाल अहम हो गया है।
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मार्च से जुलाई 2026 तक केंद्र और राज्य सरकारों की एजेंसियों ने लाखों वेब पेज, सोशल मीडिया पोस्ट, फोटो और वीडियो के URL प्लेटफॉर्म को भेजे। इनमें साइबर फ्रॉड, फर्जी निवेश योजनाओं, बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री और दूसरी गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े लिंक शामिल थे।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी व्यक्ति की शिकायत पर सोशल मीडिया कंपनी को तीन घंटे में पोस्ट हटानी ही होगी। नया नियम किन मामलों में लागू होता है और आम यूजर पर इसका क्या असर पड़ेगा, इसे समझना जरूरी है।
भारत में 2.98 लाख URL क्यों चिन्हित किए गए?
PIB Fact Check की ओर से साझा जानकारी के मुताबिक मार्च से जुलाई 2026 तक करीब 2.98 लाख URL हटाने या उन पर कार्रवाई के लिए संबंधित डिजिटल प्लेटफॉर्म को भेजे गए। इनमें लगभग 2.44 लाख URL राज्यों की एजेंसियों ने भेजे। यह कुल संख्या का करीब 82 प्रतिशत है।
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र यानी I4C ने लगभग 51 हजार URL चिन्हित किए। इनका संबंध साइबर अपराध, डिजिटल ढांचे से जुड़े खतरों और शेयर बाजार या निवेश के नाम पर चलाए जा रहे घोटालों से बताया गया।
यहां “चिन्हित” और “हटाए गए” का अंतर समझना जरूरी है। सरकारी आंकड़ा यह बताता है कि 2.98 लाख URL कार्रवाई के लिए भेजे गए थे। उपलब्ध जानकारी से यह साबित नहीं होता कि सभी URL संबंधित प्लेटफॉर्म से हटा दिए गए।
पीआईबी फैक्ट चेक ने भी इन आंकड़ों को उस दावे के जवाब में जारी किया था, जिसमें Meta द्वारा URL अपने आप ब्लॉक किए जाने की बात कही गई थी।
URL क्या होता है और इसे क्यों हटाया जाता है?
URL किसी वेब पेज, पोस्ट, फोटो, वीडियो या ऑनलाइन फाइल का इंटरनेट पता होता है। सोशल मीडिया पर मौजूद हर पोस्ट का भी अपना अलग लिंक हो सकता है। इसी लिंक के जरिये एजेंसियां प्लेटफॉर्म को बताती हैं कि किस सामग्री की समीक्षा या उस पर कार्रवाई की जरूरत है।
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साइबर ठग नकली ट्रेडिंग वेबसाइट, फर्जी निवेश ऐप, झूठे विज्ञापन और सोशल मीडिया प्रोफाइल के जरिये लोगों तक पहुंचते हैं। एक लिंक बंद होने के बाद वे मिलते-जुलते नाम से दूसरा लिंक बना सकते हैं। इस कारण पुलिस और साइबर एजेंसियों को केवल आरोपी का पता लगाने के साथ उसके डिजिटल नेटवर्क को भी रोकना पड़ता है।
बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री, महिलाओं के खिलाफ अपराध, ऑनलाइन सट्टेबाजी, फर्जी निवेश प्रचार और देश के महत्वपूर्ण डिजिटल ढांचे को नुकसान पहुंचाने वाले लिंक भी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।
सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का 3 घंटे का नियम क्या है?
केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में बदलाव किया था। इसके बाद गैरकानूनी सामग्री पर कार्रवाई के लिए सोशल मीडिया और दूसरे इंटरनेट प्लेटफॉर्म को मिलने वाला समय 36 घंटे से घटाकर तीन घंटे कर दिया गया।
यह समय सीमा हर सामान्य शिकायत पर लागू नहीं होती। तीन घंटे का समय तब गिना जाएगा, जब प्लेटफॉर्म को अदालत का आदेश या सरकार अथवा उसकी अधिकृत एजेंसी से निर्धारित प्रक्रिया के तहत वैध सूचना मिलेगी।
इसका मतलब है कि किसी यूजर द्वारा शिकायत बटन दबा देने भर से पोस्ट हटाने की तीन घंटे की कानूनी समय सीमा शुरू नहीं हो जाएगी। प्लेटफॉर्म की सामान्य शिकायत प्रक्रिया और अदालत या सरकारी एजेंसी से मिले आदेश की प्रक्रिया अलग है।
नियम के मुताबिक वैध आदेश मिलने पर प्लेटफॉर्म को संबंधित सामग्री हटानी होगी या उसकी पहुंच रोकनी होगी। ऐसा नहीं करने पर उसे यूजर द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए मिलने वाली कानूनी सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। तीन घंटे की समय सीमा 20 फरवरी 2026 से प्रभावी हुई थी।
Facebook, Instagram, YouTube और X पर क्या असर होगा?
Facebook, Instagram, YouTube और X जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पर हर दिन भारी संख्या में पोस्ट, वीडियो और विज्ञापन प्रकाशित होते हैं। तीन घंटे की समय सीमा के कारण इन कंपनियों को सरकारी और अदालती आदेशों की समीक्षा करने वाली टीमों को हर समय सक्रिय रखना होगा।
समय कम होने से गैरकानूनी लिंक जल्दी रोके जा सकते हैं। फर्जी निवेश विज्ञापन या बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री जितने अधिक समय तक ऑनलाइन रहती है, उसके उतने ज्यादा लोगों तक पहुंचने का खतरा रहता है।
दूसरी तरफ इतनी कम अवधि में हर पोस्ट का संदर्भ समझना आसान नहीं होगा। कंपनियां बड़ी संख्या में सामग्री की पहचान के लिए मशीन आधारित सिस्टम का इस्तेमाल करती हैं। इससे कभी-कभी वैध समाचार, टिप्पणी या जागरूकता के लिए प्रकाशित सामग्री भी गलती से रोकी जा सकती है।
सहयोग पोर्टल की क्या भूमिका है?
गृह मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले I4C ने सहयोग पोर्टल शुरू किया है। इसका उद्देश्य अधिकृत सरकारी एजेंसियों और इंटरनेट कंपनियों के बीच नोटिस भेजने की प्रक्रिया को तेज करना है।
पहले अलग-अलग एजेंसियां प्लेटफॉर्म को अपने स्तर पर नोटिस भेजती थीं। सहयोग पोर्टल इस प्रक्रिया को एक जगह लाता है। इसके माध्यम से अधिकृत एजेंसी संबंधित URL और कार्रवाई का कानूनी कारण दर्ज कर सकती है।
गृह मंत्रालय के मुताबिक सहयोग पोर्टल सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत गैरकानूनी ऑनलाइन सामग्री से जुड़े नोटिस भेजने की प्रक्रिया तेज करता है।
क्या तीन घंटे का नियम साइबर फ्रॉड रोक पाएगा?
तेजी से कार्रवाई साइबर फ्रॉड रोकने में मदद कर सकती है, लेकिन URL हटाना इसका पूरा समाधान नहीं है। ठग एक वेबसाइट या सोशल मीडिया अकाउंट बंद होने के बाद दूसरा लिंक बना लेते हैं। कई नेटवर्क भारत के बाहर से चलाए जाते हैं, जिससे उनकी पहचान और गिरफ्तारी में अधिक समय लगता है।
URL हटाने के साथ बैंक खाते, म्यूल अकाउंट, मोबाइल नंबर, डोमेन रजिस्ट्रेशन और विज्ञापन के भुगतान का पता लगाना भी जरूरी है। यदि केवल लिंक हटेगा और उसके पीछे काम करने वाला नेटवर्क सक्रिय रहेगा तो वही धोखाधड़ी नए नाम से फिर सामने आ सकती है।
राज्यों द्वारा 82 प्रतिशत URL चिन्हित किया जाना बताता है कि स्थानीय पुलिस और राज्य एजेंसियां ऑनलाइन अपराधों की पहचान में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। अब यह देखना होगा कि भेजे गए नोटिस में कितने URL हटाए गए, कितने अनुरोध अस्वीकार हुए और कितने मामलों में आरोपियों तक पहुंचा गया।
आम सोशल मीडिया यूजर को क्या ध्यान रखना चाहिए?
किसी संदिग्ध निवेश, ट्रेडिंग या कम समय में अधिक लाभ देने वाली पोस्ट पर भरोसा करने से पहले उसके URL और कंपनी की जांच करें। सोशल मीडिया विज्ञापन में दिखाई देने भर से कोई वेबसाइट या निवेश योजना वैध नहीं हो जाती।
यदि कोई लिंक बैंक विवरण, OTP, आधार की कॉपी या फोन में ऐप डाउनलोड करने को कहता है तो उस पर जानकारी साझा न करें। साइबर फ्रॉड होने पर तुरंत 1930 पर कॉल करें और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें। समय पर शिकायत करने से रकम को दूसरे खातों में जाने से रोकने की संभावना बढ़ सकती है।











