अक्सर हाई प्रोफाइल मामले या अपराध के किसी सनसनीखेज वारदात के समय जमानत, अंतरिम जमानत और अग्रिम जमानत हमें सुनाई देता है। लेकिन इन तीनों में क्या अंतर है और इनके मतलब क्या होते हैं यह बात हममें से कईयों को पता ही नहीं होता। आपके मन में भी कई बार ये सवाल उठ खड़े होते होंगे। आज इस लेख में हम इन्हीं तीनों का मतलब और इनके बीच का अंतर आपको बताने वाले हैं। तो आइए जानते हैं।
जमानत का मतलब
किसी मामले में आरोपी को इस आशय के साथ रिहा किया जाता है कि जब अदालत उसकी उपस्थिति के लिए बुलाएगी या पेश होने के लिए निर्देश देगी तो वह अदालत में पेश होगा। यानि आप कह सकते हैं कि यह किसी आरोपी की सशर्त रिहाई है जिसमें जरूरत पड़ने पर अदालत में पेश होने का वादा किया जाता है। जब कोई एजेंसी किसी आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करती है तो वह दंड प्रक्रिया संहिता के तहत इसके लिए आवेदन कर सकता है।
अंतरिम जमानत एक छोटी अवधि के लिए मिली होती है। कोर्ट इस तरह की जमानत तब देता है जब नियमित बेल पर सुनवाई हो रही होती है। जब नियमित बेल का आवेदन किया जाता है तब कोर्ट केस डायरी, चार्जशीट आदि मांग सकती है इस प्रक्रिया में समय लगता है जिस दौरान आरोपी को हिरासत में रहना होता है या उसे अंतरिम बेल मिल सकती है।
जब किसी व्यक्ति को किसी मामले में गिरफ्तार होने की आशंका होती है तो वह अग्रिम जमानत का आवेदन कर सकता है। यदि किसी व्यक्ति को यह आशंका होती है कि उसे किसी ऐसे अपराध में फंसाया जा सकता है जो उसने किया ही ना हो तो वह अग्रिम जमानते के लिए आवेदन कर सकता है। कोर्ट कई बार व्यक्ति को राहत देते हुए अग्रिम जमानत भी देती है।
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