भारत में बुजुर्ग क्यों हो रहे हैं लापता? अकेलापन, परिवार और सामाजिक बदलाव की बड़ी चेतावनी

भारत में हर साल हजारों वरिष्ठ नागरिकों के लापता होने की घटनाएं सामने आती हैं। यह केवल अपराध का विषय नहीं बल्कि बदलते पारिवारिक ढांचे, अकेलेपन और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा गंभीर सवाल भी है।
पार्क की बेंच पर अकेले बैठे वरिष्ठ नागरिक, भारत में बुजुर्गों के अकेलेपन और गुमशुदगी पर सांकेतिक तस्वीर

देश में रोजाना राजनीति, चुनाव और विवाद सुर्खियां बनते हैं। इनके बीच कई ऐसे विषय हैं जो शायद खबरों की भीड़ में दब जाते हैं, लेकिन समाज के भविष्य से उनका सीधा संबंध होता है। वरिष्ठ नागरिकों के लापता होने की घटनाएं भी ऐसा ही एक मुद्दा हैं।

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कुछ वर्ष पहले राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों ने बताया था कि एक वर्ष में 13,236 वरिष्ठ नागरिक लापता हुए थे। यह आंकड़ा आज भले पुराना हो, लेकिन इससे जुड़ा सवाल आज भी पहले जितना ही गंभीर है। आखिर ऐसा क्या बदल रहा है कि जीवन का सबसे अनुभवी वर्ग अपने ही घरों और समाज से दूर होता जा रहा है?

यह सिर्फ गुमशुदगी नहीं, सामाजिक बदलाव का संकेत है

किसी वरिष्ठ नागरिक के लापता होने का अर्थ केवल एक पुलिस केस नहीं होता। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। मानसिक तनाव, भूलने की बीमारी, डिमेंशिया, अवसाद, पारिवारिक उपेक्षा, आर्थिक असुरक्षा और अकेलापन ऐसे कारण हैं जो किसी बुजुर्ग को घर छोड़ने तक के लिए मजबूर कर सकते हैं।

बड़े शहरों में तेजी से बदलती जीवनशैली ने संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवारों को बढ़ावा दिया है। रोजगार और शिक्षा के लिए बच्चों का दूसरे शहरों या देशों में बस जाना भी इस स्थिति को और कठिन बनाता है।

अकेलापन सबसे बड़ी चुनौती

वृद्धावस्था में आर्थिक सहायता महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है भावनात्मक सहारा।

कई सर्वेक्षण बताते रहे हैं कि बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक अपने जीवन में अकेलापन महसूस करते हैं। रिटायरमेंट के बाद सामाजिक दायरा सीमित हो जाता है और परिवार के सदस्यों के व्यस्त रहने से संवाद भी कम हो जाता है। यही स्थिति धीरे-धीरे अवसाद और मानसिक तनाव का रूप ले सकती है।

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जब कोई व्यक्ति खुद को परिवार या समाज के लिए गैरजरूरी समझने लगता है, तब उसके व्यवहार में बड़ा बदलाव आ सकता है।

क्या सिर्फ कानून काफी हैं?

सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और भरण-पोषण के लिए कई कानून और योजनाएं बनाई हैं। पुलिस भी समय-समय पर सीनियर सिटीजन रजिस्ट्रेशन, हेल्पलाइन और सुरक्षा कार्यक्रम चलाती है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून किसी बुजुर्ग के अकेलेपन को दूर कर सकते हैं?

इसका उत्तर शायद नहीं है।

भावनात्मक सुरक्षा किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि परिवार और समाज से मिलती है।

परिवार की भूमिका सबसे अहम

हर परिवार में बुजुर्ग केवल उम्रदराज सदस्य नहीं होते। वे अनुभव, परंपरा और सामाजिक मूल्यों के वाहक होते हैं।

यदि सप्ताह में कुछ घंटे उनके साथ बिताए जाएं, उनकी बातें सुनी जाएं और उन्हें परिवार के निर्णयों में शामिल किया जाए, तो अकेलेपन की भावना काफी हद तक कम हो सकती है।

बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ी जरूरत सम्मान और अपनापन है।

समाज क्या कर सकता है?

स्थानीय समुदाय, आरडब्ल्यूए, स्वयंसेवी संगठन और सामाजिक संस्थाएं वरिष्ठ नागरिकों के लिए नियमित कार्यक्रम चला सकती हैं।

डिजिटल साक्षरता, स्वास्थ्य शिविर, सामुदायिक बैठकें और पड़ोस स्तर पर संपर्क व्यवस्था ऐसे कदम हैं जो बुजुर्गों को सामाजिक रूप से सक्रिय बनाए रखते हैं।

हमें किस बात पर सोचना चाहिए?

आज जब हम स्मार्ट शहरों और आधुनिक जीवनशैली की बात करते हैं, तब यह भी देखना होगा कि कहीं उसी रफ्तार में हमारे बुजुर्ग पीछे तो नहीं छूट रहे।

हर लापता वरिष्ठ नागरिक की कहानी अलग होती है, लेकिन लगभग हर कहानी में एक साझा सवाल जरूर होता है कि क्या उन्हें पर्याप्त साथ और सम्मान मिला?

समाज की पहचान उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और सबसे अनुभवी लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

अगर हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां परिवार और रिश्तों की अहमियत समझें, तो इसकी शुरुआत अपने घर के बुजुर्गों से करनी होगी।

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Alok Verma
a senior journalist with a 30 years experience of print, electronics and digital. worked with dainik jagran, news18india, R,bharat, zee news

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01-10-2026