World Simplicity Day कोरोना ने सादगी को बना दिया जीवन का अभिन्न अंग

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नई दिल्ली,इंडिया विस्तार। World Simplicity Day 2020 आपदा के कारण जिंदगी की रफ्तार थमी तो ठहराव के दौर में इसे देखने का नजरिया भी बदलने लगा। क्या आपने गौर किया है कि सादा खानपान, रहनसहन जो पहले मुश्किल था, अब जाने-अनजाने में दिनचर्या का हिस्सा बनने लगा है। मुश्किल जिंदगी के बीच होने लगा है इसकी सादगी का भी एहसास।

हर साल 12 जुलाई को अमेरिका में ‘सादगी दिवस’ मनाया जाता है, जबकि भारतीय संस्कृति और समाज का यह सर्वोच्च मूल्य है। वे दिन खूब याद आ रहे हैं, जब सुबह से शाम तक काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाने की होड़ मची रहती थी। ‘समय नहीं है’ का जुमला हर किसी की जुबान पर था। दुनियाभर में जीवन में ‘स्लोडाउन’ पर बात हुई। यानी भागमभाग वाली दिनच र्या को थोड़ा धीमा करना सीख जाएं तो आसान हो सकती है जिंदगी। हम थोड़ा ठहरे, तब जाना कि इसकी जटिलताएं तो हमने ही पैदा की हैं, जिंदगी खुद में कितनी सरल और सादी है।
अमेरिका के मशहूर लेखक, कवि, पर्यावरणविद, इतिहासकार और दर्शनशास्त्री हेनरी डेविड थोरी के जन्मदिन (12 जुलाई, 1817) को ‘सिंप्लीसिटी डे’ यानी सादगी दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने दुनिया को ‘सादा जीवन’ जीने का संदेश दिया था और सभी समस्याओं का हल इसे बताया।

सरलता ही रखेगी एकाग्र : पिछली सदी के सत्तर के दशक में अमेरिका के मशहूर मनोवैज्ञानिकअब्राहम हेराल्ड मेसलो ने ‘मेसलो पिरामिड’ का सिद्धांत दिया। इस के तहत इंसान की मूलभूत जरूरतों का क्रम सजाया गया है। बताया गया कि इन जरूरतों को पूरा करने के क्रम में जीवन जटिलता की तरफ बढ़ता है। जैसे, सुरक्षा की आवश्यकता के तहत नौकरी की सुरक्षा, आमदनी की चिंता, सम्मान, शोहरत-इज्जत की जरूरत को इस सिद्धांत में रखा गया। ये वे आवश्यकताएं हैं, जो इंसान को चालाकियों और झूठ बोलने के लिए उकसाती हैं। आत्मबोध यानी खुद की शांति चाहिए। यह भी एक जरूरत है, जो इंसान पर रचनात्मक दबाव बनाए रखती है। पर कुछ लोग अपनी प्रतिभा और समझदारी के बल पर ऐसी जटिलताओं के बीच भी सादगी भरा जीवन चुन लेते हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी फ्रांस के एडवर्ड चाल्र्स मनोवैज्ञानिक, दर्शनशास्त्री होने के साथ लेखक भी हैं। यहां उनका एक कथन प्रासंगिक है, ‘जटिल होने के बाद आपके प्रयास भी आपको विचलित कर देंगे। वहीं, सरल रह सकेंगे तो आपका प्रयास भी केंद्रित रहेगा यानी एकाग्र रह सकेंगे।’ जरा सोचिए, परफेक्ट रहने की दौड़ और खुद पर दबाव डालते रहने की आदत ने जीवन को आसान बनाया या जटिल। आत्ममूल्यांकन करने का इससे अच्छा अवसर नहीं हो सकता।

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Alok Verma
a senior journalist with a 30 years experience of print, electronics and digital. worked with dainik jagran, news18india, R,bharat, zee news

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31-08-2026