नकली जज और पुलिस के चक्कर में लोगों ने गंवाएं 2 हजार करोड़, आप कैसे बचेंगे

डिजिटल अरेस्ट स्कैम थमने का नाम नहीं ले रहा है। लोग करोड़ों गंवा रहे हैं। जानिए इस फ्रॉड का पूरा तरीका और इससे बचने का सबसे असरदार उपाय।
नकली पुलिस वीडियो कॉल के जरिए डिजिटल अरेस्ट स्कैम का चित्रण

क्या आप जानते हैं कि नकली जज और पुलिस के चक्कर में देश के लोगों ने साल 2024 में 2,000 करोड़ रुपये गंवा दिए। सरकार के तमाम जागरूकता के प्रयासों के बाद भी लोग डिजिटल अरेस्ट के झांसे में आकर करोड़ो रुपये गंवा रहे हैं। फिर क्या है डिजिटल अरेस्ट स्कैम से बचाव, आइए जानते हैं।

डिजिटल अरेस्ट स्कैम से बचाव का एकमात्र सुरक्षा कवच

डिजिटल अरेस्ट स्कैम से बचाव का एकमात्र सुरक्षा कवच आपकी सतर्कता और आपकी जिज्ञासा है। सतर्कता इस बात कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई चीज नहीं होती, इसलिए यह दिमाग में रखना जरुरी है कि कोई भी आपराधिक या न्यायिक सिस्टम आपको ऑनलाइन अरेस्ट नहीं कर सकता।

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जिज्ञासा इस बात की कि जिसका कॉल आपके पास आया है उसे स्वीकर करने से पहले तुरंत आधिकारिक सरकारी चैनलों के माध्यम से उसकी पुष्टि करें। डिजिटल स्कैमर डर और अलगाव को अपना हथियार बनाते हैं। अगर आपने समय रहते लोकल पुलिस या साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 की मदद ले ली तो उनकी ताकत खत्म हो जाती है।

क्यों नहीं जांच करते हैं लोग

किसी भी तर्क पर डर हावी होता है। स्कैमर्स घबराहट पैदा करते हैं। इसीलिए पीड़ित रुककर जांच करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। नकली वर्दी, मुहरें और कानूनी शब्दों का इस्तेमाल आज्ञा मानने पर मजबूर कर देता है।

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इसके अलावा स्कैमर्स पीड़ित को परिवार और दोस्तों को सूचित ना करने की चेतावनी दे देते हैं, झूठी समय सीमाएं जांच से पहले रकम गंवा देने के लिए मजबूर कर देती है। स्कैमर्स बुजुर्ग या नए इंटरनेट यूजर को टारगेट करते हैं जो हेल्पलाइन नंबर आदि से अनभिज्ञ होते हैं।

यही नहीं कॉलर आईडी/वीडियो पर भरोसा इसलिए होता है क्योंकि स्पूफ किए गए नंबर और पहले से तैयार किए गए वीडियो कॉल एकदम असली लगते हैं।

घोटाले का तरीका

  1. झटका: “आपकी पहचान अपराध से जुड़ी है।”
  2. अलगाव: “किसी को मत बताना, वरना जेल होगी।”
  3. नियंत्रण: पीड़ित को कई दिनों तक “डिजिटल अरेस्ट” में रखा जाता है।
  4. वसूली: पैसे “सुरक्षित खातों” में ट्रांसफर करवा लिए जाते हैं।

साइबर अपराध के इस चक्र को तोड़ने का तरीका

  • जांच को सामान्य बनाएं: इसे एक आदत बना लें, जैसे रात में अपना दरवाजा लॉक करना।
  • सार्वजनिक संदेश: “कोई भी पुलिस या जज आपको कभी भी कॉल पर गिरफ्तार नहीं करेगा। हमेशा जांच करें।”
  • पारिवारिक जागरूकता: खुली चर्चा को प्रोत्साहित करें—कोई भी कदम उठाने से पहले रिश्तेदारों को कॉल करें।
  • अधिकारी संपर्क: पोस्टर्स, ट्वीट्स और द्विभाषी परामर्शों के जरिए इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए: डिस्कनेक्ट, वेरिफाई, रिपोर्ट।

🔑 वेरिफिकेशन (जांच) घोटाले को क्यों और कैसे रोकता है?

  • घोटाले की तकनीक: अपराधी पुलिस/जज बनकर पीड़ितों को अकेलेपन और पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं।
  • मनोवैज्ञानिक जाल: पीड़ितों पर गोपनीयता और घबराहट बनाए रखने का दबाव डाला जाता है।
  • चक्र तोड़ना: निकटतम पुलिस स्टेशन को एक त्वरित कॉल या आधिकारिक पोर्टल की जांच करने से धोखाधड़ी का तुरंत पर्दाफाश हो जाता है। कोई भी वैध अधिकारी फोन/वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करता है।
    यह हैं बचाव के मुख्य कदम
  • कॉलर आईडी या वीडियो कॉल पर भरोसा न करें।
  • फोन काट दें और पुलिस स्टेशन या हेल्पलाइन (1930) के माध्यम से पुष्टि करें।
  • अनचाहे कॉल पर कभी भी आधार, पैन या बैंक विवरण साझा न करें।
  • परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से बुजुर्ग नागरिकों को शिक्षित करें।
  • एनसीआरपी (http://cybercrime.gov.in) पर तुरंत रिपोर्ट करें।
    ⚠️ जोखिम और खतरे के संकेत
  • आधार/फोन से जुड़े अपराधों का आरोप लगाने वाले अनचाहे कॉल।
  • गोपनीयता बनाए रखने की मांग।
  • तत्काल गिरफ्तारी या खातों को फ्रीज करने की धमकी।
  • “सुरक्षित खातों” में पैसा ट्रांसफर करने का अनुरोध।
  • यह है आपके काम की बात (Takeaway)
    यदि आपको ऐसा कोई कॉल आता है:
  1. तुरंत डिस्कनेक्ट करें।
  2. आधिकारिक पुलिस/न्यायिक संपर्कों से पुष्टि करें।
  3. एनसीआरपी (cybercrime.gov.in) पर रिपोर्ट करें या 1930 डायल करें।
  4. परिवार/दोस्तों को सूचित करें—स्कैमर्स अकेलेपन का फायदा उठाते हैं।
    संक्षेप में: डिजिटल अरेस्ट स्कैम के खिलाफ एकमात्र ढाल आधिकारिक चैनलों के माध्यम से वेरिफिकेशन (जांच) है। जब पीड़ित असली अधिकारियों से पुष्टि करते हैं, तो डर गायब हो जाता है और यह हॉलीवुड-शैली का घोटाला एक शक्तिहीन झांसा बन जाता है।

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inspector raman kumar
इंस्पेक्टर रमण कुमार सिंह,दिल्ली पुलिस में बतौर इंस्पेक्टर तैनात है । वे दिल्ली के कई पुलिस थानों के साथ साथ साइबर पुलिस स्टेशन के थानाध्यक्ष रहे है । वे साइबर जागरूकता के लिए साइबर सेफ व्हाट्सएप्प ग्रुप और बी द पुलिस नाम से फेसबुक पेज और फेसबुक ग्रुप के संचालक है ।

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29-06-2026