जीवन में क्रोध सबके भीतर होता है, पर मन प्रेम, स्नेह और आत्मीयता चाहता है। यहीं से अपेक्षा जन्म लेती है। जब अपेक्षा बढ़ती है, तो दुख भी बढ़ता है। इसलिए प्रसन्न रहना एक अभ्यास है, जो भीतर से आता है।
अपेक्षा और दुख का संबंध
क्यों बढ़ती है अपेक्षा?
अक्सर हम सोचते हैं कि कोई व्यक्ति हमारी मदद करेगा, हमारा साथ देगा, या हमारे लिए कुछ करेगा। यही सोच धीरे धीरे अपेक्षा में बदल जाती है। सदगुरु का स्पष्ट संदेश है कि किसी से अपेक्षा रखना दुख का कारण बनता है।
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विश्वास और निर्भरता में अंतर
विश्वास जीवन का आधार है, पर जब यही विश्वास निर्भरता बन जाता है, तब कष्ट शुरू होता है। उदाहरण सरल है-जब आप किसी होटल में भोजन करते हैं, तो उसकी रेसिपी नहीं पूछते। क्योंकि आपको भरोसा होता है कि वह फिर मिल जाएगा। वहां अपेक्षा नहीं होती, इसलिए निराशा भी नहीं होती।
समाधान क्या है?
ईश्वर से जुड़ाव
अपेक्षा मनुष्य से कम और ईश्वर से अधिक रखनी चाहिए। समर्पण, सरलता और सहजता के साथ जीवन जीने पर निराशा कम होती है।
प्रसन्नता का अभ्यास
- दूसरों से कम अपेक्षा रखें
- अपने कर्म पर ध्यान दें
- हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखें
जीवन का सार (काव्य रूप में)
आस विश्वास हर हाल में तुम्हीं हो
मेरे जीवन की खुशी उल्लास तुम्हीं हो
जिंदगी हर मोड़ पर हसीन नहीं होती
किसी के कहने से गमगीन नहीं होती
सब मिलता है जब हरि पर विश्वास रहे
अपने महादेव से ही बस आस रहे
वही अंदर बाहर हर क्षण में व्याप्त है
जियो जिंदगी अपने अंदाज में
फूल ही नहीं, कांटे भी होते हैं बाग में
शब्द संचयन: शुभेश शर्मन

