एक फोन कॉल, आकर्षक निवेश प्रस्ताव या तकनीकी सहायता का संदेश साइबर ठगी की शुरुआत हो सकता है। लेकिन पीड़ित से पैसे मिलने के बाद रकम कहां जाती है? मोबाइल नंबर कौन उपलब्ध कराता है और ठगी की रकम एटीएम से कौन निकालता है? पश्चिम बंगाल पुलिस के ऑपरेशन साइबर प्रहार ने साइबर अपराध की इसी पूरी कड़ी को सामने रखा है।
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इस कार्रवाई में सामने आया पश्चिम बंगाल साइबर फ्रॉड रैकेट एक व्यक्ति या एक मोबाइल नंबर तक सीमित नहीं था। पुलिस ने फर्जी कॉल सेंटर, म्यूल बैंक अकाउंट, संदिग्ध सिम और नकदी निकालने वाले लोगों से जुड़े नेटवर्क पर कार्रवाई की। यह मामला बताता है कि किसी भी ऑनलाइन ठगी के पीछे कई स्तरों पर काम करने वाले लोग हो सकते हैं।
ऑपरेशन साइबर प्रहार में क्या सामने आया
पश्चिम बंगाल पुलिस के साइबर क्राइम विंग और स्टेट साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर यानी S4C ने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अभियान चलाया। शुरुआती सात दिनों में 69 एफआईआर दर्ज की गईं और 107 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 40 गिरफ्तारियां साइबर क्राइम विंग ने सीधे कीं।
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जांच में करीब ₹92.6 करोड़ के साइबर धोखाधड़ी से जुड़े लेनदेन की पहचान हुई। कोलकाता में तीन कथित अवैध कॉल सेंटरों पर छापे मारे गए। धोखाधड़ी नेटवर्क से जुड़े 400 से अधिक सिम कार्ड भी बंद कराए गए।
₹92.6 करोड़ को जब्त या फ्रीज की गई रकम समझना सही नहीं होगा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह उन लेनदेन की रकम है, जिनके साइबर धोखाधड़ी से जुड़े होने की जांच की गई।
फर्जी कॉल सेंटर से कैसे होती है ठगी
फर्जी कॉल सेंटर बाहर से किसी सामान्य कार्यालय जैसे दिखाई दे सकते हैं। वहां बैठे लोग बैंक, वित्तीय कंपनी, निवेश सलाहकार या टेक सपोर्ट कर्मचारी बनकर फोन करते हैं। उन्हें पहले से तैयार स्क्रिप्ट दी जाती है, जिससे हर कॉल पर लगभग एक जैसी कहानी सुनाई जा सके।
पीड़ित को बताया जा सकता है कि उसके बैंक खाते में समस्या है, कंप्यूटर में वायरस आ गया है या उसे किसी निवेश पर बड़ा लाभ मिल सकता है। भरोसा बनने के बाद मोबाइल में ऐप डाउनलोड कराने, स्क्रीन शेयर करने, ओटीपी बताने या रकम ट्रांसफर करने के लिए कहा जाता है।
यदि फोन करने वाले के पास पहले से नाम, पता या दूसरी निजी जानकारी हो तो उसकी बात असली लग सकती है। निजी जानकारी मालूम होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि कॉल बैंक या सरकारी विभाग से आया है।
म्यूल अकाउंट क्या है
साइबर ठगी की रकम सीधे अपराध के सरगना के खाते में नहीं भेजी जाती। इसके लिए दूसरे लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल होता है। इन्हें म्यूल अकाउंट कहा जाता है।
कुछ खाताधारक कमीशन के लालच में अपना खाता, एटीएम कार्ड, चेकबुक या इंटरनेट बैंकिंग ठगों को दे देते हैं। कई बार नौकरी या लोन दिलाने के नाम पर खुलवाए गए खाते भी इस्तेमाल किए जाते हैं। ठगी की रकम एक खाते से दूसरे खाते में भेजने के बाद एटीएम, पीओएस मशीन या अन्य माध्यमों से निकाल ली जाती है।
ऐसा करने वाला खाताधारक यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसने केवल अपना बैंक खाता उपलब्ध कराया था। साइबर अपराध की रकम रखने या आगे भेजने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
अवैध सिम नेटवर्क की क्या भूमिका होती है
साइबर अपराधियों को फोन कॉल, ओटीपी और फर्जी ऑनलाइन अकाउंट चलाने के लिए बड़ी संख्या में मोबाइल सिम चाहिए होते हैं। इसके लिए गलत पहचान, चोरी किए गए दस्तावेज या बिना जानकारी के किए गए ई-केवाईसी का इस्तेमाल हो सकता है।
ठग बार-बार नंबर बदलते हैं, ताकि शिकायत के बाद भी उनकी दूसरी गतिविधियां चलती रहें। ऑपरेशन साइबर प्रहार में 400 से अधिक सिम बंद कराया जाना बताता है कि मोबाइल कनेक्शन साइबर फ्रॉड नेटवर्क का अहम हिस्सा होते हैं।
अपने नाम पर चल रहे मोबाइल कनेक्शन की समय-समय पर जांच करनी चाहिए। कोई अनजान नंबर दिखाई दे तो दूरसंचार विभाग की संचार साथी सेवा के माध्यम से उसकी शिकायत की जा सकती है।
साइबर फ्रॉड से खुद को कैसे बचाएं
अनजान व्यक्ति के कहने पर स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस ऐप डाउनलोड न करें। कोई भी बैंक अधिकारी फोन पर ओटीपी, यूपीआई पिन, पासवर्ड या कार्ड का सीवीवी नहीं मांगता।
गारंटीड मुनाफा, बिना दस्तावेज का लोन और मुफ्त सेवा जैसे प्रस्तावों की स्वतंत्र रूप से जांच करें। बैंक या कंपनी से संपर्क करना हो तो उसका नंबर आधिकारिक वेबसाइट या ऐप से लें। फोन करने वाले द्वारा दिया गया नंबर इस्तेमाल न करें।
अपना बैंक खाता, सिम, एटीएम कार्ड या यूपीआई आईडी किसी दूसरे व्यक्ति को कमीशन के बदले देना भी खतरनाक है। इनका अपराध में इस्तेमाल होने पर खाताधारक जांच के दायरे में आ सकता है।
ठगी होने पर 1930 पर तुरंत शिकायत करें
ऑनलाइन वित्तीय ठगी होने के बाद तुरंत 1930 पर फोन करें। इसके साथ राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें। ट्रांजेक्शन नंबर, संदिग्ध मोबाइल नंबर, बैंक खाते, चैट और स्क्रीनशॉट सुरक्षित रखें।
जल्दी शिकायत होने पर रकम जिस खाते में पहुंची है, उसे रोकने की संभावना बढ़ सकती है। पुलिस कार्रवाई अपनी जगह जरूरी है, लेकिन सतर्क नागरिक साइबर अपराधियों के लिए सबसे बड़ी रुकावट बन सकते हैं।










