आलोक वर्मा
दिल्ली के डाबड़ी में रहने वाले मेरे एक परीचित की कहानी है ये नाम बताना उचित नहीं होगा। बड़ी मशक्क्त के बाद कई साल पहले उन्होंने दिल्ली के डाबड़ी में कुछ गज जमीन में बना घर लिया। दो बेटे थे जब घर लिया तो दोनों बेटे बहुत छोटे थे। घर में रहने जाने के दो चार दिन बाद ही उन्हें महसूस होने लगा कि उनसे गलती हो गई है। आसपास के कुछ लोग धौंस जमाने के लिए मेरे उस परीचित को ना केवल धमकाने लगे बल्कि उनका रहना दुश्वार होने लगा। मामला आगे बढ़ा और पुलिस तक पहुंच कर किसी तरह शांत भी हुआ। लेकिन बच्चे जैसे जैसे बड़े होते गए उनकी संगत बिगड़ती गई औऱ पढ़ाई की बजाय आसपास के दादा टाइप लड़कों को वे रोल माडल मानने लगे। बच्चों के मामले में मेरे उस परीचित के वश में कुछ नहीं था वो पुलिस के पास नहीं जा सकते थे ना ही घर बदलने की उनकी क्षमता थी। दिल्ली केी अनाधिकृत कालोनियों में रहने वाले सैकड़ो लोगों को मेरे उस परीचित के दुख का अहसास है। सिर्फ उन्हीं को नहीं बल्कि दिल्ली पुलिस को भी इस बात का अपसास होने लगा है।
दिल्ली पुलिस के स्पेशल सीपी दीपेन्द्र पाठक ने इंडिया विस्तार से खास बातचीत में साफ कहा कि दिल्ली की डेमोग्राफी को समझना और उसके मुताबिक पुलिसिंग करना भी जरूरी है। उनके मुताबिक वैसे तो दिल्ली पुलिस में कई तरह की सामुदायिक पुलिसिंग की योजनाएं सफलता से चल रही हैं मगर उपरोक्त समस्या को ध्यान में रख कर 8-9 महीने पहले से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में दिल्ली पुलिस में एक खास योजना चलाई जा रही है जिसका नाम संपर्क है।
दिल्ली पुलिस के जनसंपर्क अभियान के बारे में जानने से पहले आईए आपको दिल्ली की कुछ कड़वी सच्चाईयों से अवगत करा दें। पहले तो आप इस सरकारी आंकड़े को जानलिजिए कि स्कूली पढ़ाई बीच में हीं छोड़ने वाले बच्चों में 39 फीसदी लड़के औऱ 33 फीसदी लड़किया होती हैं। अब एक औऱ सच सुनिए स्कूली पढ़ाई बीच में ही छोड़ने वाले लड़कों में 15 फीसदी ही ऐसे लड़के होते हैं जो मैकेनिक कारपेंटर या कोई और काम करने लगते हैं बाकि के 85 फीसदी लड़के तुरंत पैसा कमाने की फिराक में आसानी से आपराध की राह पर चल पड़ते हैं। इनमें से दर्जनों शराब और ड्रग्स के भी शिकार होते हैं। .यानि कानून के लिए एक बहुत बड़ा तबका चुनौती और सिरदर्र बनकर खड़ा होता रहता है। लेकिन किसी को इस समस्या पर ध्यान नहीं जाता।
दिल्ली पुलिस के स्पेशल सीपी दीपेन्द्र पाठक के मुताबिक जनसंपर्क अभियान के तहत स्थानीय पुलिस अपने इलाके के गली गली में संपर्क करती है बिल्कुल सहजता से कहीं भी मीटिंग कर उस इलाके में रह रहे ऐसे लोगों को अपने साथ जोडती है जो कानून में .यकीन रखते हैं। ऐसे लोगों को पुलिस का सहज साथ सुरक्षा कवच प्रदान करता है और वैसे लोग स्वत ही दूर रहते हैं जिन्हें कानून में यकीन नहीं।
श्री पाठक के मुताबिक यही नहीं इलाके के अफसर नुक्कड़ नाटक आदि के जरिए भी लोगों में जागरूकता फैलाते हैं। इसके अलावा इलाके के कुछ स्मार्ट पुलिसकर्मी जिनमें सिपाही से डीसीपी स्तर तक का अफसर शामिल होता है स्कूली छात्रों खासकर 11-12वी के छात्रों से संपर्क करते हैं औऱ उन्हें पुलिसकर्मियों की दास्तान आदि सुनाकर कोशिश किया जाता है कि वो अपना रोल माडल ऐसा चुनें कि समाज को उसका लाभ हो।
बावजूद इसके दिल्ली में पहली बार अपराध करने वालों की संख्या खासकर नाबालिग और किशोंर आरोपियों की संख्या में दिन दूनी रात चौगूनी की बढ़ोतरी हो रही है। स्पेशल सीपी दीपेन्द्र पाठक भी इस बात को स्वीकारते हैं कि पुलिस के अलावा शिक्षा औऱ समाज कल्याण जैसे विभागों को भी इस दिशा में सोचना होगा वर्ना केवल राजधानी में ही ये समस्या विकराल रूप ले सकती है।











