सनातन धर्म की मूल भावना प्रेम, सहिष्णुता और समरसता में निहित है। यह धर्म कभी भी मनुष्यों के बीच द्वेष, बैर या भेदभाव को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि सभी को एक साथ मिलकर रहने और परस्पर सम्मान के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
जो दिखाई दे रहा वह सनातन् धर्म के विपरीत
आज समाज में जो वैमनस्य और कटुता दिखाई दे रही है, वह सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को श्रेष्ठ बनाना है, न कि उसे विभाजित करना। यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म के नाम पर घृणा फैलाता है, तो वह वास्तव में धर्म की मूल भावना को नहीं समझ पाया है।
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सनातन परंपरा हमेशा से “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना को आगे बढ़ाती आई है, जिसका अर्थ है कि पूरी दुनिया एक परिवार है। आज आवश्यकता इस बात की है कि लोग अपने अंदर झांकें और यह समझें कि वे अपने आचरण से समाज को जोड़ रहे हैं या तोड़ रहे हैं।
यदि हर व्यक्ति अपने व्यवहार में प्रेम, करुणा और सहिष्णुता को अपनाए, तो समाज में शांति और सौहार्द स्वतः स्थापित हो जाएगा। हमारे शास्त्र और परंपराएं हमें संयम, सेवा और त्याग की शिक्षा देती हैं। इन मूल्यों को अपनाकर ही हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।
आज के समय में जब छोटे-छोटे मुद्दों पर विवाद बढ़ जाते हैं, तब यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम अपने धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझें और उसी के अनुसार जीवन जिएं।
सनातन् का सार
सनातन धर्म का सार यही है कि सभी जीवों में ईश्वर का अंश है, इसलिए किसी के प्रति द्वेष रखना स्वयं ईश्वर के प्रति द्वेष रखने के समान है। हमें चाहिए कि हम प्रेम और भाईचारे की भावना को मजबूत करें और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करें।





