आरबीआई का मुआवजा ढांचाः क्या यह साइबर धोखाधड़ी से डर खत्म कर देगा ?

डिजिटल धोखाधड़ी बढ़ रही है। RBI का नया मुआवज़ा ढाँचा उपभोक्ताओं को ₹25,000 तक राहत देता है। लेकिन क्या यह सच में गेम-चेंजर है?
आरबीआई मुआवजा ढ़ांचा
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क्या आप भी डिजिटल पेमेंट करते हैं ? ऑनलाइन ट्रांजक्शन और उसके साथ होने वाले साइबर फ्राड की बाढ़ देखकर आपके मन में भी एक सवाल उठता होगा। सवाल ये कि अगर कल आपके खाते से पैसे उड़ जाएं तो बैंक जिम्मेवार होगा या आप ? आरबीआई मुआवज़ा ढाँचा इस सवाल का जवाब देता है।

क्या है आरबीआई मुआवज़ा ढाँचा

भारतीय रिजर्व बैंक मुआवजा ढांचा करोड़ो डिजिटल यूजर्स के मन में उम्मीद की किरण लेकर आया है। भारत का डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम तेज़ी से बढ़ा है। UPI, आधार-लिंक सेवाएँ और इंस्टेंट ट्रांज़ैक्शन अब रोज़मर्रा का हिस्सा हैं। लेकिन इसके साथ फ़िशिंग, OTP फ्रॉड और अनधिकृत लेन-देन भी बढ़े हैं।
अब तक पीड़ित अक्सर बैंक और नियमों के बीच फँस जाता था। यहीं पर RBI का यह ढाँचा एक स्पष्ट संदेश देता है: पूरी जिम्मेदारी अकेले ग्राहक की नहीं है।

आरबीआई मुआवजा ढांचा कि विशेषताएं

मुआवज़ा सीमा: छोटे डिजिटल धोखाधड़ी मामलों में प्रति घटना ₹25,000 तक या कुल हानि का 70%।

दायित्व का बँटवारा:

  • RBI: प्रमुख हिस्सा
  • बैंक: लगभग 15%
  • ग्राहक: लगभग 15%

दायरा: केवल ट्रांज़ैक्शन ही नहीं, मिस-सेलिंग और आक्रामक ऋण वसूली जैसे मुद्दे भी।

स्थिति: सार्वजनिक परामर्श के लिए मसौदा दिशानिर्देश।

इसके बाद क्या बदलेगा

आरबीआई मुआवजा ढ़ांचा से डिजिटल भुगतान का डर कम होगा। रिपोर्टिंग की आदत बढ़ेगी। इसी तरह बैंकों को अब “ग्राहक की गलती” कहकर बच निकलना मुश्किल होगा। फ्रॉड डिटेक्शन और कस्टमर एजुकेशन पर निवेश बढ़ेगा।

यही नहीं आरबीआई की उपभोक्ता अधिकारों का संरक्षक होने की भूमिका और मज़बूत। बेहतर प्रमाणीकरण, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और जागरूकता अभियानों की ज़रूरत बढ़ेगी।

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बड़ी बात क्या है

आरबीआई मुआवजा ढांचा सेफ़्टी नेट की तरह काम करेगा। ग्राहक जानेंगे कि थोड़ी जिम्मेदारी उनकी भी है, इसलिए सतर्कता बढ़ेगी। बैंक और रेगुलेटर को टेक्नोलॉजी में निवेश करना ही होगा। 2017 के पुराने ढाँचों से आगे बढ़कर आधुनिक साइबर फ्रॉड को कवर।

चुनौती क्या है

यह मान लेना कि मुआवज़ा मिलने से समस्या हल हो जाएगी। सारी समस्या का हल नहीं है। इसके साथ कुछ चुनौतियां भी हैं सबसे पहले तो है नैतिक जोखिम यानि लोग सोच सकते हैं कि नुकसान तो कवर हो जाएगा। इसी तरह क्लेम निपटान में देरी विश्वास तोड़ सकती है। रिपोर्टिंग समयसीमा न समझने पर मुआवज़ा अटक सकता है।

मजबूत संस्करण:
यह ढाँचा तभी सफल है जब इसे तेज़ रिपोर्टिंग, स्पष्ट पात्रता नियम और बड़े पैमाने पर डिजिटल साक्षरता से जोड़ा जाए। मुआवज़ा सुरक्षा है, इलाज नहीं।

निष्कर्ष

RBI की यह पहल केवल पैसे लौटाने की योजना नहीं है। यह डिजिटल भरोसे का ढाँचा है।
नियामक, बैंक और ग्राहक के बीच जिम्मेदारी बाँटकर यह बताता है कि साइबर सुरक्षा साझा दायित्व है।
सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नियम कितनी जल्दी ज़मीन पर उतरते हैं और लोग उन्हें कितना समझते हैं।

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10-02-2026