जब सूरत सिटी क्राइम ब्रांच और लखनऊ साइबर क्राइम पुलिस की जांचें सामने आईं, तो एक बात चुपचाप उभरकर आई। ये मामले अलग-अलग शहरों के थे, आरोपी अलग थे, लेकिन साइबर ठगी का पैटर्न लगभग एक जैसा था। यहीं से सवाल शुरू होता है —
अगर ठग बदल रहे हैं, जगह बदल रही है, देश भी बदल रहे हैं, तो फिर पैटर्न क्यों नहीं बदलता?
सूरत से लखनऊ तक साइबर ठगी का पैटर्न क्या
सूरत सिटी क्राइम ब्रांच के ऑपरेशन म्यूल हंट में सामने आया एक अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क, जिसमें:
- 44 म्यूल अकाउंट्स
- 6,040 शिकायतें देशभर से
- ₹750 करोड़ की पुष्टि हुई ठगी
- ₹2,000 करोड़ से अधिक की अनुमानित धोखाधड़ी
इसी तरह लखनऊ में पकड़े गए मामलों ने यह साफ कर दिया कि निवेश धोखाधड़ी न तो किसी एक राज्य तक सीमित है और न ही किसी एक गैंग तक।
एक ही स्क्रिप्ट, बार-बार क्यों काम कर जाती है?
जांच एजेंसियों के सामने जो तस्वीर आई, वह नई नहीं थी।
🏢 फर्जी कंपनियाँ और एनजीओ
शेल कंपनियाँ या एनजीओ बनाकर ऐसा माहौल तैयार किया जाता है कि सब कुछ वैध लगे। नाम अक्सर भरोसेमंद रखे जाते हैं।
💰 आसान कमाई का वादा
गारंटीड रिटर्न, पैसा डबल, जल्दी लोन — ये शब्द नए नहीं हैं, फिर भी हर बार असर करते हैं।
🏦 म्यूल अकाउंट्स
असल नाम छिपाने के लिए दूसरों के खातों का इस्तेमाल। पैसा चलता रहता है, पहचान धुंधली होती जाती है।
📲 तकनीक का इस्तेमाल
फर्जी ऐप, स्क्रीन मिररिंग और OTP — तकनीक यहाँ हथियार नहीं, रास्ता बन जाती है।
🌐 क्रिप्टो का सहारा
अंत में पैसा ऐसी जगह पहुँचा दिया जाता है, जहाँ उसे ट्रैक करना मुश्किल हो जाए।
आंकड़े क्या बताते हैं
- 6,040 शिकायतें सिर्फ एक नेटवर्क से जुड़ी
- 482 मामले गुजरात से
- हजारों लोग, जिन्होंने एक ही तरह के वादों पर भरोसा किया
ये आंकड़े यह नहीं बताते कि लोग कितने भोले हैं,
ये बताते हैं कि ठगी कितनी व्यवस्थित हो चुकी है।
सोचने वाली बात
अगर हर जांच में एक ही तरीका सामने आता है,
तो सवाल सिर्फ ठगों का नहीं रह जाता।
- क्या हम वादों को जांचे बिना स्वीकार कर लेते हैं?
- क्या “गारंटीड मुनाफा” अब भी सामान्य लगता है?
- क्या हम तकनीक को समझने से पहले उस पर भरोसा कर लेते हैं?
सतर्कता का सीधा संदेश
- कोई भी वैध संस्था आसान और पक्का मुनाफा नहीं देती
- OTP और ऐप एक्सेस, दोनों आपकी चाबी हैं
- शक होने पर देर न करें: 1930 या http://cybercrime.gov.in
सूरत से लखनऊ तक कहानी एक जैसी है।
ठगी हर बार नए नाम से आती है, लेकिन वही पुरानी आदतों पर टिकी रहती है।
शायद सवाल यह नहीं है कि ठग कैसे काम करते हैं,
सवाल यह है कि हम हर बार उसी जाल को पहचानने में देर क्यों कर देते हैं?







