भारतीय तंत्र परंपरा में मंत्र, साधना और अनुष्ठान: एक शांत और जिम्मेदार समझ

यह ब्लॉग भारतीय तंत्र परंपरा में मंत्र, साधना और अनुष्ठान को रहस्य या चमत्कार नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन और चेतना-विकास की सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में समझने का प्रयास करता है।
भारतीय तंत्र परंपरा
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आज हम चर्चा करेंगे कि अनुष्ठान कैसे होता है। शास्त्रीय नियमों के अलावा कुछ ऐसे नियम होते हैं जिनमें अनुष्ठान की सफलता निहित है। सदाचार, सात्विक, स्वभाव, सरलता, परंतु नियम की कठोरता, देवता के प्रति दृढ़ विश्वासी, संयम, आसन, नियम, प्राणायाम वस्त्र शुद्धि, शरीर शुद्धि व देवता के कुल का वर्णन, जिस देवता की साधना कर रहे हैं उनकी जानकारी होना। उस देवता से षडाष्टक योग न हो इतना विचार तो करना ही चाहिए। किसी भी अनुष्ठान के लिए, मुहूर्त, संकल्प, न्यास आदि की विस्तार पूर्वक जानकारी होनी चाहिए। देवता का विग्रह या चित्र उनका यंत्र अथवा दोनों, उनकी रुचिकर वस्तुएं तथा शाप विमोचन मंत्र, उत्कीलन गुरु का निर्देश आदि का भी ध्यान होना चाहिए।

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जिस देवता का अनुष्ठान हो उसका कवच और पुरुश्चरण विधि का भी ज्ञान होना चाहिए अब यह ज्ञान किससे और कहां से मिले इस पर भी ध्यान देना चाहिए पुस्तकों से या गुरु मुख विद्वानों का निर्देशन परम आवश्यक है। इसी में अनुष्ठान की सिद्धि और सफलता निहित है।

अगर हम सही नियम निभा सकें तो अनुष्ठान की सफलता भी उतनी प्रतिशत बढ़ जाती है। क्योंकि अनुष्ठान का अर्थ अनुशासनात्मक क्रिया विधि से किया गया मंत्र जप ही है।

भारतीय तंत्र परंपराः तंत्र रहस्य और साधना में सफलता असफलता के कारण

तंत्र अपने आपमें एक रहस्य का परिचायक है। भगवान शिव ने मनुष्य के कल्याण के लिए कुछ ऐसी विद्याओं का निर्माण किया जिनके माध्यम से मानव ही नहीं देवता और राक्षसों के द्वारा गुप्त विद्याओं के प्रयोग उनकी साधना के माध्यम से ईश्वर तत्व को भी प्रभावित किया जा सकता है। शास्त्रों में और श्री दुर्गा सप्तशती में आया है “अति गुह्यतरम् देवी देवानाम अपि दुर्लमम् रुद्रियामल तंत्र, आकाश भैरव कल्प, शक्ति तंत्र, दत्तात्रेय तंत्र, भैरव तंत्र, शाबर तंत्र, अघोर साधना आदि।

परंतु सभी तंत्रों के बारे में ना तो बताना संभव है ना ही जानना संभव है। कोई भी साधक अपने जीवन में रहस्यों के ऊपरी भाव को तो समझ पाता है परंतु कुछ रहस्यमय को जान पाना उस देव की कृपा के बिना संभव नहीं है। जब तक हम पूजा, साधना के नियमों को निजी आचरण एवं तंत्र विशेष के सिद्धांत के अनुसार जीवन में कठोरता के साथ दृढ संकल्प के साथ नहीं अपना पाते। जब हम उन निर्देशित नियमों को जीवन में अत्यंत सावधानी पूर्वक अपना करके साधना का मार्ग प्रारंभकरते हैं और उसके पुरुषचरण विधि को पूरा कर पाते हैं तब भी वर्ग सिद्धांत के अनुसार किस राशि के व्यक्ति को किस देवता की पूजा करनी चाहिए प्रथम दृष्टया इसको जानना अत्यंत आवश्यक है। पुलिंदिनी प्रयोग के माध्यम से हम जान सकते हैं कि हमें इस देवता की उपासना करनी चाहिए या नहीं अथवा किस देवता की करनी चाहिए यह प्रयोग विधि हम यहां दे रहे हैं।

अथ पुलिंदिनी प्रयोग :

अस्य पुलिंदिनी मंत्रस्य शंकरो ऋषिः, जगती छंदः, देवी पुलिंदिनी देवता, ई बीजं, स्वाहा शक्तिा पुलिंदिनी प्रसादस्य सिद्धयर्थे विनियोगः।

शंकर ऋषये नमः शिरसे

जगती छंदसे नमः मुखे देवी पुलिंदिनी देवताय नमः हृदये ई बीजाय नमः गुह्ये स्वाहा शक्तये नमः पादयोः

अंगुष्ठाभ्यां नमः

हृदयाय नमः

तर्जनीभ्यां नमः

शिरसे स्वाहा

उं मध्यमाभ्यां नमः

शिखायै वौषट्

अनामिकाभ्यां नमः

कवचाय हु

ऑ. कनिष्ठिकाभ्यां नमः

नेत्रत्रयाय वौषट्

करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

अस्त्राय फट

ध्यान:

वहांपीड कचानिराम चिकुरा बिंबोज्ज्वलच्वंद्रिकाम् । गुंजाहार लतां शुजाल विहासद ग्रीवामधीरेक्षणाम् ।। माकंद दुम पल्लवारुणपयं मंदेन्दु बिवाननाम्। देवीं सर्वमयीं प्रसन्न हृदयां ध्यायेत्किरातामृताम् ।।
मंत्र:

ई ओं नमो भगवति श्रीं ह्रीं शारदा देवी क्रीं देहि देहि एह्यागच्छागच्छागन्तुकं हृदययस्थ कार्य सत्यं ब्रूहि सत्यं ब्रूहि पुलिंदिनि ई स्वाहा।

पंचाशत्रशत मंत्र जप से मंत्र सिद्ध होता है। तत्दशांश तर्पण हवन आदि शिष्टांग करने चाहिए।

कार्या कार्य जानने के लिए रात्रि में 108 जप करके सोने से अंबिका स्वप्न में बता देती है। वैसा ही आचारण करें। किसी प्रकार का भय न हो।

आप किस देवता को अपनी ओर देखने के लिए साधना के माध्यम से प्रभावित कर सकें इसके लिए वर्ग सिद्धांत द्वारा मूल्यांकन आवश्यक है। परंतु शास्त्र कहता है ‘कलौ चण्डी विनायको ‘कलयुग में गणपति और शक्ति आराधना विशेष फलदाई है। तंत्र के माध्यम से आप देवताओं के साथ एक विशेष परिस्थिति तक संपर्क साध सकते हैं। इसके लिए सबसे प्रथम आवश्यक है सही मार्ग दर्शन जो कि इस काल में सरल नहीं है। योग्य गुरु जिसका जीवन चरित्र अत्यंत श्रेष्ठ हो, योग्य स्थान जैसे कि योग्य गुरु आवश्यक है, वैसे ही योग्य शिष्य की भी आवश्यकता रहती है अधिकतर लोग तंत्र को सहजता से बहुत जल्दी देवता को अपनी कामनाओं को प्राप्त करने की साधना मानते हैं परंतु यह उतना ही कठिन है जितना एक तैरने वाले व्यक्ति के लिए गंगा की धारा में विपरीत दिशा में तैरना सफलता/असफलता के बीच में बहुत सारे बिंदु हैं। परंतु उन बिंदुओं की चर्चा करने से पूर्व कुछ ऐसी चर्चा करना चाहते हैं जैसे चिंतन के प्रारंभ में तंत्र और रहस्य तंत्र शब्द प्रयोग किया गया है। रहस्य का अर्थ है जो छिपा हुआ अथवा उस छुपे हुए को ढूंढ़ना जो सरल नहीं है इस रहस्य को जानने के लिए जीवन में कुछ ऐसे नियमों को अपनाने की आवश्यकता है जिससे निजी आत्मा का साक्षात्कार हो प्रथम द्रष्टा सूर्योदय से पूर्व ब्रह्ममुहूर्त में उठकर शुद्ध जल से स्नान कर भगवती वेद माता गायत्री और माता सरस्वती की उपासना और संध्योपासना अत्यंत आवश्यक है इसके लिए हम एक प्रयोग विधि यहां दे रहे हैं।

भाषा प्रयोग :

अस्य श्री भारती मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छंदः देवी महावाणी, ही बीजम्, स्वाहा शक्ति, सर्वशब्दार्थ विज्ञानसिद्धयर्थे सारस्वताप्तये जपे विनियोगः।

न्यास:

ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि ।

गायत्री छदसे नमः मुखे।

महावाणी देवताये नमः हृदये।

ही बीजाय नमः गुहो। महा शक्तये नमः पादयोः ।

सं. अंगुष्ठाभ्यां नमः।

सां तर्जनीयम्यां नमः ।

सूं अनामिकाभ्यां नमः । सैं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। सौः करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः।

अंग न्यास :

सं हृदयाय नमः। सां शिरसे स्वाहा। सीं शिखायै वॉषट्। सूं कवचाय हूं। सैं नेत्रत्रयाय वॉषट्। सौ अस्त्रायफट् ।

ॐ सं सरस्वति स्वाहा।

नव नलिन निरुदा वल्लभा पद्मजस्य। द्युतिविहसित चंद्रोद्दाम कांतिप्रसन्ना।।

द्युतिविहसित चंद्रोद्दाम कांतिप्रसन्ना ।। विहरतु ममचित्ते सर्वबोधप्रदात्री।

पिबरतु सुकवित्वं सर्वलोके प्रसिद्धम् ।।

न्यास ध्यान पूर्वक सात हजार बार जप करें। उसके दशांश क्रम से तर्पण आहूति भोजनक उसके पश्चात् सौ बार नित्य जपें।

सूर्योदय पूर्व शुद्ध आसन, साफ वस्त्र, जिस प्रकार के देवता की साधना हो उसी प्रकार के वर चयन, राजसी, तामसी, सात्विक तत्पश्चात् ऊँ सोहम के जप अजपाजप द्वारा ब्रहा से संबंध जोड़ना, प्राणायाम, भैरव आज्ञा के साथ-साथ दिग्बंध जिसका सिद्धांत “आपाकरामंतु भूतानि पि सर्व तो दिशम.. आदि” इन सब सावधानियों के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक, वातावरण, अ भोजन आदि शारीरिक शुद्धियां भी आवश्यक हैं। शारीरिक शुद्धि में शौच आदि से निवृत हो वस्त्रों को धारण करें मानसिक शुद्धि में निरंतर देवता के बीज मंत्रों का निरंतर अभ्यास, वातावर सिंद्धांत है- एकांतवास, भूमिशयन, काम वासना का चिंतन ना होना/आसन पवित्र आसन मृग चर्म व्याघ्र चर्म हो परंतु इस समय इन सब चीजों की उपलब्धि संभव नहीं है तो कुश या का आसन विशेषतः भी अपनाया जा सकता है पर सबके लिए लाल रंग के ऊन के आसन सिद्धांत सर्वमान्य है। भोजन शुद्धि में विशेषतः देवान्न का भोजन करना जिसमें यव, चावल और कुएं का जन पीना अथवा पवित्र नदियों के जल का उपयोग करना। इन सब सावधानिय साथ-साथ अत्यंत सावधानीपूर्वक ब्रहाचर्य का पालन तथा सदाचरण जिसमें मिथ्या भाषण, चुगव करना और उस परम पिता परमेश्वर की एक मात्र सत्ता पर विश्वास रखना तथा अपने विच सदा कार्य की सफलता का चिंतन करना सर्वोपरि है। इन सबके साथ मंत्रशापोद्वार, मंत्र उत्कीलन अथवा ऐसे मंत्रों का जप करना जो कीलित नहीं हैं, उनमे मुख्यतः ॐ गं गणपतये ॐ नमो नारायणाय, ऐं ह्रीं श्रीं मात्रै नमः ॐ नमः शिवाय, रा रामाय नमः ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय आदि मंत्रों का जप निरंतर आवश्यक है। सभी प्रकार के अनुष्ठानों के प्रारंभ में साधना की सप के लिए गुरु आज्ञा और गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ भी करे तो विशेष सफलता मिलती है। मोहन, उच्चाटन, स्तम्मन, आकर्षण और विद्वेषण सभी षटकर्म भगवान शिव ने मनुष्य को विशेष परिस्थिति में लाभ देने के लिए बनाये हैं। प्रत्येक मनुष्य को अत्यंत विषम परिस्थितिय कार्यों का सहारा लेना चाहिए क्योंकि शास्त्र कहता है लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु, यश-के हाथ में हैं परंतु एक सिद्ध साधक जिनसे मेरी जीवन में इस विषय पर चर्चा हुई कि तंत्र के माध्यम से इन कार्यों को परिवर्तित भी किया जा सकता है। भगवती आद्य जगत जननी महिषासुर मर्दनी, चंड मुंड विनाशनी, सर्व कल्याणप्रद कल्याणदायिनी समस्त आदि नामों में रहस्य के साथ उनका फल भी प्रकट होता है। अगर हम इसे समझ पाण कल्याण संभव है। सर्व रूप गयी देवी सर्वम देवी मयम् जगत। अतोह्म विश्व रुपाम् परमेश्वरी यही जानकर यही समझकर उनकी अनुकम्पा से कुछ बिंदुओं पर चर्चा करन किया है। भगवती ललिताम्बा सबका कल्याण करें और हमारा मार्ग प्रशस्त करें। वैसे तो को ना जान पाना संभव है न बता पाना संभव है। जब तक वो जगत जननी जगति

शिव पार्वती इस रहस्य को जानने के लिए आप पर कृपा न करें उनकी कृपा हो तो फिर है यह वो स्वयं कहते हैं। किसी भी कार्य की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है कर्म होना जिससे उसके उद्देश्य और परिणाम दोनों श्रेष्ठ हों वही कर्म उचित माना गया सफलताओं और साधनाओं के मूल में व्यक्ति का उद्देश्य अर्थ प्राप्त करना है क्योंकि जिब सुख है इस मौतिकतावाद के समय में लक्ष्मी के बिना संभव नहीं है इसलिए माता लक्ष्मी प्रसन्न हों इसके लिए एक प्रयोग विधि यहां दे रहे हैं जिससे सभी लोग लाभ प्राप्त करेंगे यह प्रयोग है।

लक्ष्मी प्रयोग :

सौभाग्यवर्द्धक लक्ष्मी मंत्र आयुष्कर, अमोघ, वशीकरण व जप वर्धक अस्य लक्ष्मी मंत्र वृहती छन्दः, महालक्ष्मी देवता, श्रींबीजं, क्लीं शक्ति, सर्वसमृद्धये सर्वलोक वशीकरे विि

श्रां अंगुष्ठाभ्याम् नमः

। हृदयाय नमः

श्रीं तर्जनीभ्याम् नमः

। शिरसे नमः

श्रू मध्यमाभ्याम् नमः

। शिखायै वौषट्

मैं अनामिकाभ्याम् नमः

। कवचाय हूं

श्रऔं कनिष्ठिकाभ्याम् नमः

। नेत्रत्रयाय वौषट्

श्रः करतलकर पृष्ठाभ्याम् नमः

। अस्त्राय फट्

घ्यानम् :

या सा पद्मासनास्थ विपुल-कटि तटी पद्मपत्रायताक्षी, गंभीरावर्त नाभि स्तनभरनमित लक्षमीर्दिव्यैर्गजेन्द्रमंषिगण खचितैः स्नापिता हेमकुमै, र्नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृ युक्ता ।।

मंत्र: ॐ श्रीं क्लीं महालक्ष्मी महालक्ष्मी एह्योहिसर्वसोभाग्य देहि मे स्वाहा।

संख्या: 24 हजार। दशांश हवन, तर्पण भोजन, प्रतिदिन प्रातः 108 जप करने से होती है।

विभिन्न साधना अनुष्ठान मंत्र

श्री गणपति मंत्रा:

  1. ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लीं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।

(वशीकरण के लिए)

  1. ॐ ह्रीं ग्लौं गणपतये सर्वकार्यसिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा।

(कार्य सिद्धि के लिए)

  1. ॐ श्रीं ह्रीं सर्वकार्यविघ्नप्रशमनाय सर्वराजवश्यकराय सर्वस्त्री सर्वलोकवशीकरणाय ॐ ह्रीं क्रौं हूं फट् स्वाहा।

(आकर्षण के लिए)

  1. ॐ ग्लौं नवनीतगणपतये सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।

(संतान के लिए) 5. ॐ हस्तिमुखाय लम्बोदगय उच्छिष्टाय महात्मने ऊँ क्रौं ह्रीं क्लीं ग्लौंग स्वाहा।

(सर्व कार्य सिद्धि के लिए)

श्री मतंगिनी मन्त्रा :

  1. ॐ ऐं ॐ नमो भगवति शां शारि के सकलाकोविदे विद्यां बोधय बोधय स्वाह

(वाक् सिद्धि के लिए)

  1. ॐ नमो भगवत्यै वीं वीणायै मम साहित्यविद्यां प्रयच्छ स्वाहा।

(संगीत विद्या के लिए)

  1. ॐ नमो भगवते व्यं वेणवे मम साहित्यविद्यां प्रयच्छ स्वाहा।

(विशेष शिक्षा के लिए)

श्री गायत्री मंत्र:

ॐ भूर्भुस्सुवः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमही धियो यो नः प्रचोदयात् ।

(मोक्ष प्राप्ति के लिए)

श्री कार्तिकेय मन्त्राः

  1. ॐ ऐं क्ष क्ष कुमाराय नमः । (शत्रु विनाश के लिए)
  2. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सौः स्कन्दाय नमः।
  3. श्री मृत्युंजय मन्त्र :

ॐ हौं जूं सः।

(स्वास्थ्य लाभ के लिए)

श्री नीलकण्ठ मन्त्र :

ऊँ फ्रों न्त्रीं ठः।

(विष बाधा दूर करने के लिए)

श्री त्र्यम्बक मन्त्रः

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्य (आयु प्राप्ति के लिए)

श्री जातवेदो मन्त्र:
ॐ वैश्वानर जातवेदा इहावह लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय साधन (लक्ष्मी प्राप्ति के लिए)

श्री प्रत्यंगिरा मन्त्र :

  1. ॐ श्रीं ह्रीं ॐ नमः कृष्णवसने सहस्रसिंहिनि परसैन्यपरकर्मविध्वंसिनि परमन्त्रोत्सादिनि सर्वभूतदमनि सव छिन्धि क्षोभय क्षोभय परतन्त्राणि स्फोटय स्फोटय सर्वश्रृ३ला कराळवदने प्रत्यंगिरे ह्रीं नमः। (तंत्र बाधा दूर करने के लिए)
  2. ॐ ज्वलज्ज्वालाजिह्वे कराळदंष्ट्रे प्रत्यंगिरे क्षीं ह्रीं हुं फट् । (तंत्र के प्रभाव से बचने के लिए)

श्री ब्रह्मा मन्त्र :

तत्पुरुषाय विाहे महादेवाय धीमहि तत्रो रुद्रः प्रचोदयात् । अकाररुप (ब्रह्म ज्ञान एवं संतान के लिए)

श्री वटुकत्रयं :
:

ॐ ह्रीं श्रीं हूं फट् ।

(क्षेत्र को तंत्र प्रभाव से बचाने के लिए)

श्री बगला मन्त्रः

ॐ जीं बगळामुखि सर्वदुष्टनां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिहां कीलय बुद्धि विन

(शत्रु को वश में करने के लिए)

श्री वाराही मन्त्रा :

ॐ वं वाराही स्वाहा।

(तंत्र बाधा दूर करने के लिए)

ॐ ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्तालि वार्तालि वाराहि वाराहि वराहमुखि रुन्धिनि नमः। जम्भे जम्भिनि नमः। मोहे मोहिनि नमः। स्तम्भे स्तम्भिनि सर्वेषां सर्ववाक्चित्तचक्षुर्मुखगतिजिह्वा स्तम्भनं कुरु कुरु शीघ्र वश्यं ऐं ग्ला फट्।

(शत्रु पर विजय व तंत्र बाधा दूर करने के लिए)

श्री वटुक मन्त्र :

ॐ ह्रीं वं वटुकाय आपदुद्धारणं कुरु कुरु वं वटुकाय ह्रीं ॐ स्वाहा।

(अर्थ लाभ तथा क्षेत्र रक्षण के लिए)

श्री शरभ मन्त्र:

ॐ नमो भगवते प्रलयकालाग्निरुद्राय दक्षाध्वरध्वंसकाय महाशरभाय ममा स्वाहा।

(देव प्रकोप से बचने के लिए)

श्री बीरमद्र मन्त्र:

ॐ क्लीं ग्रीं वीरभद्र जय जय नमः स्वाहा।

(शत्रु विध्वंश के लिए)
श्री भैरव मन्त्रा

  1. नमो भगवते उग्रभैरवाय सर्वविघ्नान्नाशय नाशय हुं फट् स्वाहा।

(साधना में विघ्न से बचने के लिए)

  1. ॐ ह्रीं क्लीं अघोरभैरवाय (देवदत्त) मोहय स्वाहा।

(वशीकरण के लिए)

  1. ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ॐ नमो भगवते स्वर्णाकर्षणभैरवाय प्राणताभीष्टपरिपू मह्यं हिरण्यं दापय दापय शीघ्रं दापय दापय श्रीं ह्रीं क्लीं स्वाहा।

(लक्ष्मी प्राप्ति के लिए)

श्री दक्षिणामूर्ति मन्त्रा :

  1. ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा।

(ज्ञान प्राप्ति के लिए)
)

  1. ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं श्रियं प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा।

(लक्ष्मी प्राप्ति के लिए)

  1. ॐ अः नमः शिवाय अः ऊँ।

(सर्व बाधा दूर करने के लिए)

  1. ॐ ज्ञां नमचिन्मयमूर्तये ज्ञानं देहि स्वाहा।

(विद्या प्राप्ति के लिए)

श्री भुवनेश्वरी मन्त्र :

श्रीं ह्रीं श्रीं नमः।

(सभी प्रकार के अनुष्ठानों की सफलता के लिए)

श्री सुदर्शन मन्त्र:

  1. श्रीं ह्रीं ॐ सुदर्शनचक्राय रिपुचित्तं भ्रामय भ्रामय स्वाहा।

(शत्रु को भ्रमित करने के लिए)

श्री कार्तवीर्य मन्त्र :

ॐ फ्रों छीं क्लीं ब्लूं आं ह्रीं क्रौं श्रीं हुं फट् स्वाहा। कार्तवीर्यार्जुनाय नमः।

(डूबा धन प्राप्ति के लिए)

श्री नृसिंह मन्त्र :

ॐ क्ष्रौं ई हं उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु

हं ईक्ष्ौं ॐ।

(राज्य लाभ व शत्रु विजय के लिए)

श्री राममन्त्र :

  1. ॐ रां रामाय नमः।

(इष्ट साधना के लिए)

  1. ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं नित्यशुद्धबुद्धाय रामाय परब्रह्मणे नमः।

(ब्रह्म ज्ञान के लिए)

श्री सीतामन्त्र

ॐ श्रीं सीतायै स्वाहा।

(लक्ष्मी प्राप्ति के लिए)

श्री गोपाल मन्त्र :

  1. ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।

(संतान के लिए)

  1. ॐ अन्नरूप रसरूप नमो नमः। अन्नाधिपतये ममान्नं प्रयच्छ स्वाहा।

(सभी रसों की प्राप्ति के लिए)

  1. ॐ क्लीं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण श

(पुत्र प्राप्ति के लिए)

  1. ॐ क्लीं कृष्ण क्लीं।

(संतान प्राप्ति के लिए)

श्री धन्वन्तरि मन्त्र:

ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वामयविनाशनाय स्वाहा।

(औषधि लाभ के लिए
श्री कुबेर मन्त्र :

ॐ श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः।

(धन प्राप्ति के लिए)

श्री इन्द्राक्षीमन्त्रः

ॐ श्रीं छां ऐं क्लीं सौः ॐ नमो भगवति इन्द्राक्षि भूतभविष्यद्वर्तमानव अमुकं में कार्य कथय सौः क्लीं ऐं छां श्रीं ॐ स्वाहा।

(अंर्तज्ञान एवं ज्योतिष ज्ञान के लिए)

श्री दत्तात्रेय मन्त्र :

ॐ ह्रीं द्रा दत्तात्रेयाय नमः द्रां ह्रीं ॐ।

(तंत्र सफलता के लिए)
श्री नारायण मन्त्र :

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय । (भगवत कृपा के लिए)

ॐ नमो नारायणाय । (भगवत कृपा के लिए)

श्री दुर्गा मन्त्र :

  1. ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं क्ष्ौं दुं ज्वल ज्वल शूलिनि दुष्टग्रह हुं फट् स्वा (ग्रह दोष निवारण के लिए)
  2. ॐ ह्रीं दुं दुर्गा देवी शरणमहं प्रपद्ये दुं ह्रीं ॐ। (शरणागति के लिए)

श्री कालीमन्त्र:

ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हु हु हु ह्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके ह्रीं ह्रीं ह्रीं हु हु हु क्रीं (शत्रु नाश व संकट निवारण के लिए)

श्री चण्डीमन्त्र :

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै। (सर्वकार्य सिद्धि के लिए)
श्री लक्ष्मीमन्त्र :

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्मि एह्येहि सर्वसौभाग्यं देहि मे स्वाहा।

(सौभाग्य प्राप्ति के लिए)

श्री वागीशा मन्त्रः

ॐ सं सरस्वति स्वाहा।

(शिक्षा प्राप्ति व परीक्षा में सफलता के लिए)

आचार्य शुभेश शर्मन

श्री जनकल्याण ज्योतिष कार्यालय,

2663, (दूसरा तल) फ्लैट नं. 13, गली आर्य समाज, सीता राम बाजार, दिल्ली-110 श्री शिव शक्ति संस्थान विराट नगर, जयपुर, राजस्थान

मो. 9811112469

Disclaimer

यह लेख एक सांस्कृतिक, दार्शनिक और सूचनात्मक प्रस्तुति के रूप में प्रकाशित किया गया है। इसमें उल्लिखित मंत्र, साधना, अनुष्ठान अथवा तांत्रिक अवधारणाएँ किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत प्रयोग, चिकित्सीय उपचार, मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप या समस्या-निवारण के प्रत्यक्ष निर्देश के रूप में प्रस्तुत नहीं की गई हैं। पाठकों से आग्रह है कि वे किसी भी आध्यात्मिक, साधनात्मक या तांत्रिक अभ्यास को अपनाने से पूर्व योग्य गुरु, विद्वान अथवा विशेषज्ञ से उचित मार्गदर्शन अवश्य लें। इस लेख का उद्देश्य केवल जानकारी और वैचारिक समझ प्रदान करना है, न कि किसी प्रकार के दावे, समाधान या परिणाम का आश्वासन देना।


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